गरीब के सपने और सरकार की तोता रटंत

दिल्ली में ऑटो पर बैठना हो तो यह मान कर चलना पड़ेगा कि अधिकतर ये लोग फालतू पैसे मांगते हैं और कई बार बद्तमीजी भी करते हैं। मगर उस दिन जो अनुभव मेरे साथ हुआ

कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”-२

अमित जी ने मेरी पिछली पोस्ट “कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू” के जवाब में एक किस्सा दिया है कि किस प्रकार महिलाओं को बस में सीट देने के बाद आभार तक व्यक्त

कृष्णा टु सुदामा “थैंक्यू बड्डी, वैरी टेस्टी सत्तू”

रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका ने मुंबई को अशिष्ट नागरिको का शहर बताया है। अपने चिट्ठाकारों ने इतना कुछ लिख दिया इस विषय पर कि पिछली अनुगूंज पर भी इतना नहीं लिखा। मेरा मानना यह है कि

बालमन पर इमरजेंसी का डर

आज नीरज भाई ने लिखा तो मुझे भी आपतकाल का एक किस्सा याद आ गया। मैं दस साल का था, छठी कक्षा में पढ़ता था। इतनी राजनैतिक या सामाजिक समझ तो नहीं आई थी मगर

संवेदनशील बच्चे

बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। उनकी आवश्यकताएं भौतिक तो होती ही हैं, भावनात्मक ज्यादा होती हैं। भावनात्मक इस लिये क्योंकि आजकी भागती दौड़ती दुनिया में हर पिता का ज्यादा जोर अपने बच्चों की भौतिक आवशकताओं

अपने प्यारे पापा को कविता

अपने प्यारे पापा को कविता.  कल फ़ादर डे पर यूं ही एक कविता लिखने की कोशिश की है.  वैसे तो मैं कवि नहीं हूँ और कविता लिखने की कुछ समझ भी नहीं है फिर भी

आपके ब्लाग पर मेरा फ़ोटो तो नहीं?

समीर भाई ने अपनी पोस्ट अपना ब्लाग बेचो, भाई……… में छाया जी को लिखा कि “जरा फ़ोटू वगेरह लगाओ और वो भी नाम भी साथ मे.कैसी भी फोटो हो, लगा दो” तो हमें भी जोश

अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

नेता बनने का मुझे भी शॊंक चढ़ रहा था। मैने शुद्ध गाँधीवादी तरीका अपनाया देश और समाज की सेवा करने का। मैंने सोचा अपनी गली से ही शुरू करना चहिए। गली का सफ़ाई कर्मचारी तो