केवल व्यस्कों के लिये संसद

केवल व्यस्कों के लिये संसद आपको याद है दूरदर्शन का वो जमाना जब चित्रहार में हीरो और हिरोईन नजदीक आते (नहीं नहीं आने को होते) तो अचानक स्क्रीन पर कभी पंछी उड़ते नजर आने लगते,

क्या इतनी सिंपल सी बात गोवरंमेंट को समझ नहीं आती?

मेरी आठवीं में पढ़ने वाली बेटी ने आज पढ़ते पढ़ते अचानक पूछ लिया: “पापा, एक छोटा सा फ्लैट बनाने में कितनी लागत आयेगी?” “यही कोई दॊ लाख रुपये, क्यों?” “क्या गोवरंमेंट के पास इतने पैसे

साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान

“तो क्या तुम अपनी मां किसी दूसरे को दे दोगे?” मेरी आंखें गुस्से से लाल हो गईं और चेहरा तमतमाने लगा। उन्नीस साल का था मैं। नयी नयी नौकरी और दूसरा तीसरा दिन। कायदे से

पाकिस्तान के हीरो

यश साहब ने अपनी फ़िल्म वीरजारा में एक गीत रखा साहब “जैसा देश है तेरा वैसा देश है मेरा” अब अपना भारत जैसा भी है पाकिस्तान जैसा तो कतई नहीं है। पिछले दिनों हमारे चिट्ठा

महानगर हिंदी चिट्ठाकार मिलन

भई दो महानगरों के चिट्ठाकार मिलेंगे तो उसे महानगर चिट्ठाकार मिलन ही कहा जायेगा ना? तो मुम्बई से आये शशि सिंह जो “मान ना मान मैं तेरा मेहमान” कह कर आये और दिल्ली वालों के

लगे रहो मुन्ना भाई

हैल्लो सरकिट अरे मुन्ना भाई, भोत दिन बाद फोन किया भाई? अरे तेरे कु एक भोत मजेदार बात बताने के वास्ते फोन किया। चिंकी के बाप से फिर कोई लफ्ड़ा हुआ क्या? अरे नईं अपुन

एनडीटीवी पर हम

जी नहीं जनाब हम अपने उस इंटरव्यू की बात नहीं कर रहा हूं जो १०-१२ दिन पहले एनडीटीवी ने सुबह सुबह के समाचारों में दिखाया रहा। हम बात कर रहा हूं एनडीटीवी पर हमार बिलाग