हिंदी में लिखिये ना बड़े भैया

पूजनीय  बड़े भैया,
प्रणाम,

 

आज फिर से एक बार आपको खत लिख रहे हैं।   हम सुने  कि आपहूं अपना बिलाग शुरू किये हैं। हमका बड़ी खुशी हुई।

हम आपकी आज तक ऐको फिलम नहीं छोड़े हैं। टेलीबिजन पर सारे इंटरब्यू देखे हैं। पर सब हिंदी में। आप हमार उत्तर परदेस में जन्मे। हिंदी के संस्कार मिले। हिंदी में सारी जिंदगी काम किया। "कौन बनेगा करोड़पति" में जब आप हिंदी बोलते तो हम जैसन कितने ही हिंदी बोलने वालों का सीना फूल जाता।

ईश्बर की किरपा से पिछले दुई साल से हमऊं बिलाग पढ़त हैं। हिंदी में लिखे बिलाग ही पढ़त हैं। ऊ का है ना के हमका अंग्रेजी बांचनी तो आती नाही। आप भी यदि हिंदी में लिखें तो हम जैइसे कितने ही लोग पढ़ पायेंगे। हम देखे हैं कि आप बाबूजी की दुई लाईन हिंदी में लिखे हैं।

AB

काहे नहीं पूरा बिलाग ही हिंदी में लिखते?

रामखिलावन
गंगा किनारे के एक गांव से

 

 

 

इसे भी पढ़ें
पुनर्जन्म हो यदि मेरा !

छोरा गंगा किनारे वाला


मोबाईल से पोस्ट ठेलने में मिली अधूरी सफलता

आज जब दिल्ली में ओलंपिक की मशाल का जलूस निकल रहा था तो  चालिस मिनट तक ट्रैफिक में एक ही जगह जाम होते हुये मोबाईल से एक पोस्ट ठलने की कोशिश की। अफसोस, पूराने वर्डप्रैस पर जहां आराम से मोबाईल से पोस्ट हो गयी थी, नये वर्डप्रैस पर केवल शीर्षक ही नजर आया पोस्ट का मजमून गायब था। :(

 

खैर फिर से कोशिश करेंगे।

अगले ओलंपिक से पहले :)


मोबाइल से पोस्ट ठेलने का बेहतरीन मौका।


कैसे बढ़ती शेयर मार्किट कर रही है गरीब के आटा और दाल महंगे

How rising stock markets effecting poor

नोट: शेयर मार्किट, निवेश और बीमा के बारे में आसान हिंदी में जानकारी के लिये यहां क्लिक करें

यह लेख मैंने पिछले साल दो जून को लिखा था। आज जब सब तरफ महंगाई(Inflation)  का इतना शोर है, यह लेख एक बार फिर पेश कर रहा हूं:

 

एक ओर जहां शेयर बाजार (Stock Markets)  के जानकार यहां निवेश (Invest)  करके मालामाल हो रहे हैं वहीं बेचारा आम आदमी जिसका इस शेयर बाजार से कुछ लेना देना नहीं है और जो कि अपनी दो जून की रोटी मुशकिलों से जुगाड़ पाता है उस पर इस सब का उल्टा असर हो रहा है और उस गरीब को अपने रोज के आटा दाल के लिये अधिक कीमतें देनी पड़ रही हैं। इस सब की वजह यह है कि अर्थव्यवस्था (Economy)  में बढ़ते मुद्रा विस्तार (Inflation)  का प्रबंधन सरकार ठीक से नहीं कर पा रही है और साथ ही सराकार तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में किसानों को (जो की देश की आबादी का साठ प्रतिशत हैं) शामिल नहीं कर पायी है। कृषि के विकास की निचली दर का सीधा असर खाद्य पदार्थों की पूर्ती पर पड़ा है जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। गरीब अपनी आय का आधा खर्च अपने खान पान पर करता है जबकी अमीर अपनी आय का दस प्रतिशत से भी कम अपने खान पान पर खर्च करता है, इससे आप समझ सकते हैं कि बढ़ती महंगाई किस पर ज्यादा असर दिखाती है।

यह सब कैसे होता है इसे समझने के लिये आईये देसी तथा विदेशी निवेश (Investment) , मुद्रा के विस्तार (Inflation) , ब्याज की दर (Rate of Interest)   और मंहगाई के आपस में रिश्ते को जरा आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं। जब अर्थव्यवस्था (Economy)  का विकास (Growth)  तेजी से होता है तो अर्थव्यवस्था में मुद्रा का विस्तार भी होने लगता है क्योंकि अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है उद्योगों (Industry) , graph120.pngसेवाओं (Services), नौकरियों (Jobs)  और उत्पादों (Products)  में विस्तार से। इस विस्तार से लोगों को अधिक धन मिलता है जो कि मांग (Demand) को बढ़ाता है और फिर पूर्ती (Supply) बढ़ाने के लिये और विस्तार होता है। इस विस्तार में सहयोगी होते है निवेश (Investments) और ऋण (Loans)। यहां ध्यान दें कि यह निवेश और ऋण देसी और विदेशी दोनो तरह के हो सकते हैं। इस सब के कारण अर्थव्यवस्था में जयादा लिक्विडिटी (Liquidity तरलता) आ जाती है यानी मुद्रा का विस्तार अर्थात मुद्रास्फीति।

लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा अर्थात ज्यादा उत्पादों और सेवाओं की मांग। अब जब इस मांग के बराबर पूर्ती नहीं हो पाती है और बाकी सारे घटक नहीं बदलते हैं तो मंहगाई बढ़ती है। इस महंगाई की बढ़ती दर को रोकने के लिये हाल ही में सरकार नें CRR की दरें बढ़ाईं। CRR यानी कैश रिजर्व रेशो, बैंकों को प्राप्त जमाओं का वह हिस्सा होता है जिसे बैंक, रिजर्व बैंक के पास रखते हैं। मान लीजिये यदि CRR की दर 7 % है और बैंको के पास 100 रुपये जमा हैं तो वे केवल 93 रु का ऋण ही दे पायेंगे। इस प्रकार सरकार मुद्रा के प्रसार में कमी करके अर्थव्यवस्था में मांग की कमी करती है। जब बैंकों के पास ऋण देने के लिये कम पैसा होगा तो बैंक ऋण पर ब्याज की दरें बढा देंगे और साथ ही बचत पर भी ब्याज की दरें बढ़ा देंगे। (जैसा की अभी हाल ही में दो बार हुआ।) इससे मंहगाई पर तो तत्कालीन असर हो जाता है मगर दीर्ध अवधी में मंहगे ऋणों के कारण उद्योगों के विस्तार पर असर पड़ता है जो कि अर्थव्यवस्था की तेजी को धीमा कर देता है।

इसके अलावा विदेशों से अप्रवासियों तथा विदेशी संस्थानों द्वारा तेजी से बढ़ते निवेश का प्रबंधन भी रिजर्व बैंक को करना होता है क्योंकि अर्थव्यवस्था की तेजी के कारण इन विदेशी निवेशों में बेतहाशा वृद्धी हुई है। विदेशी निवेश अपने साथ विदेशी मुद्रा ले कर आते हैं। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा को रुपयों के बदले खरीदता है जिससे और अधिक मुद्रा का विस्तार होता है। पिछले दो बार में CRR की बढ़ोत्तरी से जो मुद्रा के विस्तार में कमी की गयी उसका असर विदेशों से आते निवेश तथा ऋणों ने समाप्त कर दिया। जहां 0.5% की CRR दर में वृद्धी ने अर्थव्यवस्था से14000 करोड़ रु की मुद्रा को कम किया वहीं इस वर्ष के पहले चार महीनों में अर्थव्यवस्था में लगभग 46000 करोड़ रुपये विदेशी मुद्रा के रूप में आ गये। इसका असर यह हुआ कि रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा की खरीद में कमी कर दी जिससे रुपया मजबूत होने लगा। रुपये की कम समय में इतनी मजबूती निर्यातकों के लिये तो मारक होती ही है, सस्ते आयात घरेलू उद्योगों पर भी बुरा असर डालते हैं।

आप यह जान कर हैरान न हों कि अब अर्थशास्त्र के ज्ञाता भी इस अर्थव्यवस्था की इस तेजी से डरने लगे हैं। जहां चीन कई वर्षों से लगातार 10% से अधिक की विकास दर होने पर भी मुद्रास्फीती को 2-2.5% के आसपास रखने में कामयाब रहा है वहीं खराब मुद्रा प्रबंधन के कारण हम 9.4% के विकास पर ही हांफने लगे हैं।


आपका चिट्ठा इंटरनेट एक्सप्लोरर 6 में कैसा दिखता है?

आपको लग रहा होगा कि ऐसा अजीब सवाल मैं क्यों पूछ रहा हूं। मगर इसका कारण है। क्या आपने कभी जांचा है कि आपका चिट्ठा इंटरनेट एक्सप्लोरर -6 पर कैसा दिखता है?

जब चिट्ठाकारी शुरू की थी तो मैं इंटरनेट एक्सप्लोरर -6 प्रयोग किया करता था। मगर बाद में फायरफॉक्स शुरू किर लिया। इंटरनेट एक्सप्लोरर - 7  के आने के बाद इसके साथ ही चिपके रहे । साथ ही फायरफॉक्स  भी रखा मगर प्रयोग नहीं किया।

 

पिछले कुछ  दिनों से मेरा कंप्यूटर परेशान कर रहा था उसे फार्मेट करना पड़ा। इस दौरान अपने चिट्ठे इंटरनेट एक्सप्लोरर -6 पर देखने का मौका मिला। इससे पता चला कि मेरे चिट्ठे इंटरनेट एक्सप्लोरर -6 पर सही नहीं दिखते । खास कर ब्लॉस्पॉट पर वे चिट्ठे जिनका टैंपलेट बदला गया है।

 

अधिकतर चिट्ठाकार  फायरफॉक्स  या इंटरनेट एक्सप्लोरर - 7 ही प्रयोग करते हैं। मगर सर्च इंजनों से आने वाले पाठकों में 75% के लगभग इंटरनेट एक्सप्लोरर -6 का ही प्रयोग करते हैं (आपने यदि स्टैटकाउंटर लगा रखा है तो आप इसे आसानी से पता कर सकते हैं कि आपके पाठक कौन सा ब्राउजर प्रयोग करते हैं)।

 

तो जब भी आप अपने चिट्ठे का टैंपलेट बदलें यह जरूर जांच लें कि नया टैंपलेट क्या सभी ब्राउजरों पर सही दिखता है, खास कर वे चिट्ठाकार जो एडसेंस का प्रयोग करते हैं क्योंकि हो सकता है कि आपकी एडसेंस यूनिट जिस स्थान पर आपको नजर आती है, आपके पाठकों को किसी और स्थान पर दिख रही हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी साईडबार साईड पर नहीं पोस्ट के नीचे नजर आ रही हो।

 


 


हिंदी टूलबार पिटारा को Cnet पर संपादकीय रिव्यू में मिले पांच सितारे

pitara cnet review

 

आप सब के प्रिय हिंदी टूलबार पिटारा को Cnet के download.com पर संपादकीय रिव्यू में पांच सितारे मिले हैं। इस साइट पर किसी भी उत्पाद को दी जाने वाली यह सबसे बड़ी रेटिंग है।

यह टूलबार पिछले साल जून में इस साइट पर लिस्ट हुआ था। तभी से पिटारा इस साइट पर पॉपुलर की श्रेणी में लगातार बना रहा। इसका रिव्यू आज ही प्रकाशित हुआ। रिव्यू में लिखा है:

 

Like a host of toolbars hitting the market, this one is designed to fill a very specific niche.

Hindi Toolbar Pitara focuses on Hindi speakers and readers. This free toolbar installs to Internet Explorer, and the interface is cluttered with the obligatory search field and a variety of buttons. All text associated with the toolbar is written in Hindi. Of particular interest is a tuner for Internet radio stations broadcasting in Hindi, plus links to popular sites on popular culture topics, such as Bollywood and Indian music.

The toolbar performed well in our tests, responding quickly to clicked links. Our only complaint is the cluttered design of the toolbar itself. Anyone interested in Indian culture and Hindi-oriented sites and radio will find this Internet Explorer add-on very handy.

 

इस टूलबार को पसंद करने के लिये आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद।