कोई भी फीड पढ़ें पिटारा पर

वर्ष 2007 पिटारा टूलबार की सफलता का साल रहा। वर्ष के अंत तक यह टूलबार 3500 से ज्यादा बार डाउनलोड हो चुका है। हम चाहते हैं कि पिटारा के प्रयोगकर्ताओं तक अधिक से अधिक उपयोगी टूल पहुंच सकें।इसी कड़ी में अब हमने पिटारा टूलबार में यह सुविधा दी है कि आप अपनी पसंद की कोई भी फीड पिटारा में जोड़ पायेंगे।

इस बारे में विस्तार से यहां पढ़ें।


ब्लॉगवाणी हिंदी टूलबार पिटारा से हटा

ब्लॉगवाणी ने हमें अनुरोध करके ब्लॉगवाणी का लिंक और फीड हिंदी टूलबार पिटारा से हटाने का अनुरोध किया है।  उनका आग्रह मानते हुए हमने अपने टूलबार से ब्लॉगवाणी का लिंक और फीड हटा दिये हैं।



इस कारण से पिटारा के प्रयोगकर्ताओं को होने वाली असुविधा के लिये हमें खेद है।


एक भला काम करें-अपने चिट्ठे पर एक लिंक लगायें



Esha - एक संस्था है जो कि नेत्रहीनों के लिये काम कर रही है। यह संस्था कई तरीकों से नेत्रहीनों की सहायता कर रही है। यहां विजिटिंग कार्ड्स पर ब्रेल में नाम लिख नेत्रहीनों को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी किया जा रहा है। इन्होंने अब अपनी साइट बनायी है www.braillecards.org । संस्था के पास अपनी साईट को प्रचारित करने के लिये संसाधन नहीं हैं। आप सभी से अनुरोध है कि इस साईट का लिंक अपने अपने चिट्ठे पर लगायें। हो सके तो इस साईट के बारे में पोस्ट भी लिखें। जरूरत है कि इस तरह की साईट्स के बारे में लोग अधिक से अधिक जानें।


सत्या, हत्या और साहित्या !!!

"मुन्नाभाई, अपुन सत्या सुना, हत्या सुना पर ये साहित्या क्या होता है?"

"अरे सरकिट, साहित्या नहीं साहित्य, लिट्रेचर।"

"लिट्रेचर?"

"सरकिट तुम लाइब्रेरी में अलमारियों में भरी किताबें देखीं हैं ना उसी को साहित्य कहते हैं।"

"और भाई वो जो लाइब्रेरी में बड़े बड़े मामू लोगों के फोटो लगे रहते हैं वो कौन हैं?"

"सरकिट, वो मामू लोग नहीं हैं, उनको साहित्यकार कहते हैं जैसे कि टालस्टॉय, शेक्सपियर, तुलसीदास, कबीर, ग़ालिब। इस सब का फोटू लायब्रेरी में लगा रहता है।"

"भाई, तुम भी तो ब्लॉग लिखता है, क्या तुमारा फोटू भी इनके साथ लायब्रेरी मे लगेगा?"

"सरकिट, अपना मुंह इदर कर जरा, बास तो नहीं आ रहा, तुम सुबह सुबह पियेला है क्या? कैसी बहकी बहकी बातें करेला है?"

"नहीं भाई, अपुन पियेला नई हैं, अपुन आज सुबह सुबह एक सपना देखा। सपने में ना भाई, एक भोत बड़े हॉल में एक फंक्शन हो रेला था। साहित्या-कादमी का। उसमें सब बड़े बड़े चिरकुट ब्लॉगर बैठे थे। और भाई वो अपुन की चंपा है ना उसको उदर अवार्ड मिल रेला था। भाई उसको शॉल दिया, बड़ा सा चैक दिया। चंपा ने कैंडिल से लैंप जलाया। भाई क्या मस्त लगरेली थी कसम से।"

"अरे सरकिट, ये चिरकुट वर्ड तुम कहां से सीखा? तेरी तो लैंग्वेज की वाट लग रही है।"

"भाई, मैं रात देर तक हिंदी के ब्लॉग पढ़ता रहा, फिर पढ़्ते पढ़्ते ही सो गया। उसी का असर हो गया।"

"अरे सरकिट, अपुन को लगता है कि ज्यादा ब्लॉग पढ़ने से तुम्हारे दिमाग में कोई कैमिकल लोचा हो गया है। भाई, अपुन अईसैच अच्छे हैं, तुम ज्यादा ब्लॉग विलॉग नईं पढ़ना।"

"पर भाई, वो चंपा का बिलोग?"

"सरकिट, चंपा जब अगला पोस्ट लिखेगी तो अपुन तेरे को बता देगा मगर बाकी हिंदी ब्लॉग्स से तुम दूर ही रहना। तेरी सेहत के लिये लगता है यहीच ठीक रहेगा।"


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पारसी थियेटर, मुग़ले आज़म और माचिस की तीलियां

 कुछ दिनों से टीवी पर खूब फिल्में देखी जा रही हैं। हर शाम समाचार चैनलों या इंटरनेट पर समय बिताने के बजाय कुछ अच्छी फिल्में देखने की कोशिश कर रहा हूं।

परसों टीवी पर मुग़लेआज़म देखी। नयी तकनीक से इसे पूरी तरह रंगीन और डिजिटल सर्रांउंड साउंड में बना दिया गया है। फिल्म के भव्य सैट रंगीन होने के बाद और भी भव्य और शानदार दिख रहे हैं। हैरान हो देखता रहा कि श्वेत श्याम रंगों में फिल्मायी गयी फिल्म में कैसे रंग भर कर गहनों, कपड़ों और फूलों की बारीक खूबसूरती को उभारा गया है। आपने यदि यह फिल्म रंगों में न देखी हो तो जरूर देखें।

फिल्म की खास संवाद अदायगी के बारे में बच्चों को बताता रहा कि जिस तरह के लंबे लंबे डायलॉग ड्रामाई अंदाज़ से बोले जा रहे हैं यह पारसी ड्रामों से आया हैं। बच्चों को बता रहा था सोहराब मोदी के बारे में   कि कैसे वो  अपनी जानदार आवाज में पारसी थियेटर के अंदाज़ में संवाद बोला करते थे। फिल्म में जब विज्ञापन आते तो आदत अनुसार रिमोट का बटन दबता और समाचार चैनल लग जाता। वहां हम सोहराब मोदी के पारसी थियेटर की बात कर रहे थे और यहां सोनिया और मोदी की नौटंकी चल रही थी। मौत के सौदागर जैसे डायलॉग चल रहे थे। स्टूडियो में बैठे दोनो तरफ के नेता खूब नफरतें उगल रहे थे और एंकर बीच बीच में  माचिस की तीलियां छोड़ रहे थे।

कल शाम जब काम से वापिस आ रहा था तो एफएम गोल्ड पर क्रिकेट मैच के बाद ’माचिस’ का गीत बज रहा था।

दिल दर्द का टुकड़ा है पत्थर की डली सी है

इक अंधा कुआं है या  बंद गली सी है

इक छोटा सा लम्हा है जो खत्म नहीं होता

मैं लाख बुझाता हूं ये भस्म नहीं होता.....



नफरतें फैला कर राजनीति करने वालों पर गुलजार साहब की बहुत अच्छी टिप्पणी है माचिस।  गीत दिमाग में अटक सा गया।  घर पहुंचा तो बिजली गुल थी। मैं बाजार की और निकल गया। वापसी पर कदम अपने आप एक सीडी की दुकान में घुस गये। सामने एक दो अंग्रेजी फिल्मों के बीच अनारा पर बनी फिल्म की सीडी पड़ी थी। कवर पर बड़ा सा मोबाइल बना था जिसमें एम एम एस चलता दिखाया था।

मैं कुछ सीडियां छांटने लगा। एक के बाद एक सीडी पर गोविंदा, मिथुन, या संजय दत्त कोइ न कोइ बंदूक लिये खड़े थे। दुकानदार लड़का जो कि थोड़ा पिये हुए भी था बोला ’आपको किस टाइप की फिल्म चाहिए?’ उम्मीद तो नहीं थी कि वहां आंधी, मासूम या मौसम जैसी कोइ फिल्म मिल जायेगी फिर भी बोल दिया ’कोइ गुलजार टाइप।’

’वो कौन है?’ लड़का हैरान था। सामने सीडी पर अनारा जोर से हंसने लगी।

मुझे एक बंडल में माचिस की सीडी मिल गयी। वो भी शायद वहां इस लिये थी क्योंकि कवर पर चंद्रचूड़ सिंह  के हाथ में बंदूक थी। दिमाग में पहले ही शाम से ’छोड़ आये हम वो गलियां...’ बज रहा था। घर आ कर देखने लगा। पहली सीडी खत्म हुइ तो दूसरी के चलने तक हाथ फिर रिमोट पर गया और NDTV  लग गया। एक कार्यक्र्म समाप्त करते हुए प्रणव अंग्रेजी में बता रहे थे कि मोदी अपनी सभाओं में किसी मोहन लाल का बार बार नाम लेते हैं। कोई जा कर उन्हें बताये कि वो मोहन लाल नहीं मोहन दास है। उसके बाद जो क्लिप चली उसमें मोदी ने जो गुजराती में कहा वह तो समझ नहीं आया पर जो नाम मोदी ने लिया वो था ’ मोहन लाल करमचंद गांधी।’


पिटारा टूलबार में जुड़े कुछ मजेदार और काम के टूल

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कुछ मजेदार और काम के टूल - 2

  यह पोस्ट सूचना के लिये है।