बदलाव की हवायें हिंदी की ओर

बदलाव की हवायें किस तरह इंडिया और भारत को एक दूसरे के करीब ला रही हैं इसका एक उदाहरण देखने को मिला है।

इकॉनॉमिक्स टाइम्स हर साल अपने अखबार के साथ बांटने के लिये एक पत्रिका निकालता है ET500  जिसमें उस साल की 500 टॉप कंपनियों से परिचय करवाया जाता है और आर्थिक बदलावों की झांकी भी पेश की जाती है। इस साल के अंक में जो कि कल यानि 30 अक्टूबर को वितरित किया जायेगा इस पत्रिका की थीम है Winds of Change यानि बदलाव की हवायें।

कैसा बदलाव आ रहा है यह आपको यहां इस पत्रिका का कवर देख कर ही पता चल जायेगा


नीली रेखाओं और लाल चेहरों वाला शहर

आप लोग सोचते होंगे कि दिल्ली के लोग कैसे इतने खौफ में जीते होंगे। एक तरफ लाल चेहरे वाले बंदरों का आतंक और दूसरी तरफ नीली रेखाओं वाली बसों का आंतंक।

मगर दिल्ली के लोग बहुत ही व्यावाहारिक हैं। हर हालात में अपने को ढाल लेते हैं। सीख जाते हैं।

दिल्ली के केंद्र में एक हरा भरा क्षेत्र है जिसे रिज एरिया कहा जाता है। यह रिज एरिया दक्षिण में धौला कूंआं से लेकर पश्चिम में नारायणा और केन्द्र में क्नॉट प्लेस के पास तक फैला है। इस रिज एरिया में बंदरों की आबादी बहुत हो गयी है जिससे बंदर आस पास की कालोनियों में घुस जाते हैं।  यह ढीठ  बंदर बेधड़क घरों में धुस जाते हैं और फ्रिज खोल कर उस  में से उठा कर मजे से सामान खाने लगते हैं। दिल्ली के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में भी इनका बहुत आतंक है। कोई यदि फल ले कर मरीज को देखने यहां आये तो ये बंदर हाथ में पकड़ा फलों का थैला ही छीन लेते हैं और दूर भाग जाते हैं। जो लोग समझदार हैं वे पहले ही एक फल थैले से निकाल इनकी और उछाल देते हैं। फिर सारे  बंदर उस एक फल के पीछे भागते हैं और आप अपने बाकी फलों के साथ अस्पताल के अंदर खिसक सकते हैं। ऐसे लोगों को यहां प्रैक्टिकल यानि व्यावहारिक कहा जाता है। यह व्यावहारिकता यहां के हवा पानी में है।  बच्चा पैदा होते ही इसे सीख जाता है।

आपको हैरानी नहीं होगी यदि दूसरी कक्षा का बच्चा घर आ कर मां से बोले "मम्मी मम्मी! क्लास में जो क्यूट सी नयी लड़की आयी है ना निशा, मैंने उससे कहा कि अगर तू मुझे अपने पास की सीट पर बैठने दे तो मैं अपने टिफिन से आधी मैगी खाने के दे सकता हूं और वो मान गयी।" मां  अपने बच्चे की इस व्यवहार कुशलता पर फूल कर कुप्पा हो जायेगी कि देखो मेरा बच्चा कितना प्रैक्टिकल है। बड़ा होकर बहुत सफल होगा। 

आप यदि छोटे छोटे शहरों से, खाली बोर दोपहरों से, झोला उठा कर यहां चले आये हैं या आने की सोच रहे हैं तो अपना झोला, थैला, बैग आदि अच्छी तरह चैक कर लें कि कहीं उसमें आप अपना कोई सिद्धांत विद्धांत साथ में न ले आयें। ये सिद्धांत यहां कई बार बहुत आढ़े आते हैं। सिद्धांत व्गैरह की बात करने वालों को यहां अव्यवहारिक माना जाता है।

अब जरा नीली रेखा वाली बसों यानि कि ब्लूलाईन की बात कर ली जाये। सारे मंत्री, मुख्यमंत्री और जनता कोशिश करके हार गये मगर कोइ इनका बाल भी बांका नहीं कर पाया तो इसके पीछे इन बस मालिकों की व्यवहारिकता ही है। आप सोचते होंगे कि यह बस वाले यदि इस तरह से बसे चलाते हैं तो ट्रैफिक वाले तो लगातार ही इनके पीछे पड़े रह्ते होंगे और ट्रैफिक वालों से ये लोग खौफ खाते होंगे। मगर यह बस वाले बहुत ही प्रैक्टिकल हैं। इसी तरह से ट्रैफिक वाले भी बहुत प्रैक्टिकल हैं। हर बस के रूट पर जितनी भी लाल बत्तियां होंगी उन सब पर प्रति माह सौ रुपया। हिसाब लगाइये। दिल्ली में लगभग छः हजार बसें हैं और हजारों लाल बत्तियां। प्रति बस, प्रति लालबत्ती, प्रति माह सौ रुपये के हिसाब से कितने करोड़ हुए।  इतनी टर्नओवर के सामने तो अंबानी का रिलांयस फ्रैश भी शरमा जाये। देश की बढ़ती मुद्रास्फीति में इस मुद्रा विनिमय का कितना योगदान है इसका अंदाजा अपने वित्त मंत्री जी को भी नहीं होगा। ये लोग हर चौराहे पर माह के पहले दस दिन मुस्तैद मिलते हैं उगाही के लिये। छः तारीख से ही जिसके पैसे न आयें उन्हे इशारे करने लगते हैं। दस तारीख तक पैसे न मिलें तो बस जब्त। अब बेचारा जो ड्राइवर नया नया आया होता है वो इन इशारों को समझ नहीं पाता और बस जब्त करवा बैठता है।

अब अपने नीली पगड़ी वाले मन्नू भाई यहां की राजनीति में 'एक्सिडेंटली' आ गये हैं। लाल बत्ती पर बैठे लोगों के इशारों को समझ नहीं पा रहे। दस तारीख आने को है, लगता है अपनी बस जब्त करवायेंगे।


क्या आप गूगल समूह 'चिट्ठाकार' के सदस्य हैं?



मेरे बहुत से साथियों को मेरे इस प्रश्न से हैरानी हो सकती है। कौन चिट्ठाकार होगा जो इस समूह का सदस्य नहीं होगा? मगर सच्चाई यही है कि अधिकतर चिट्ठाकार इस समूह के सदस्य नहीं हैं। आज यदि हिंदी चिट्ठों की संख्या 1100  को पार कर रही है तो चिट्ठाकर समूह पर सदस्यों की संख्या आज की तारीख में केवल 384 ही  नजर आ रही है। यानि अधिकतर चिट्ठाकार इस समूह के सदस्य नहीं हैं।

तो जो लोग इस समूह के सदस्य नहीं हैं उन्हें बता दें कि यह समूह है हिंदी चिट्ठाकारों का जहां आप हिंदी चिट्ठाकारी और हिंदी कंप्यूटिंग पर चर्चा कर सकते हैं अथवा कोई भी समस्या या विचार रख सकते हैं। आपको तुरंत किसी न किसी  सदस्य से जवाब मिलेगा और हर संभव सहायता भी की जायेगी। इस समूह पर  हिंदी कंप्यूटिंग से संबंधित नयी नयी सूचनायें भी प्रेषित की जाती हैं।

चिट्ठाकार समूह पर जाने के लिये यहां क्लिक करें।

अब आपको बतायें एक काम की बात। चिट्ठाकार समूह के संदेशों की फीड हिंदी टूलबार पिटारा में उपलब्ध करा दी गयी है। आप चाहे इस समूह के सदस्य हों अथवा नहीं किंतु आप इस समूह पर आने वाले नये संदेश तुरंत इस फीड पर देख पायेंगे। इसकी घोषणा अलग से हिंदी टूलबार के चिट्ठे पर की जायेगी।


किसी भी साईट का लिप्यांतर होगा एक क्लिक से

भोमियो ने जब उर्दू से देवनागरी में लिप्यांतर की सुविधा शुरू की तो उन दिनों मैंने ढेरों उर्दू के पाकिस्तानी चिट्ठे देवनागरी में पढ़े। यकीन मानिये यह एक अलग तरीके का अनुभव था। कम पढ़े लिखे युवकों और युवतियों के पंजाबी और उर्दू की मिलीजुली भाषा में लिखे मासूम चिट्ठे। ज्यादातर पर ग़जलें और शेर। एक चिट्ठा मैं नहीं भूलता जिसमें एक युवक ने अपने दादा के बारे में लिखा जिनका घर यहां दिल्ली में था। बहुत ही मजेदार चिट्ठा था वह। बात पुरानी हो चुकी है इसी लिये उन चिट्ठों के लिंक तो नहीं दे पाऊंगा मगर फिलहाल कुछ उर्दू चिट्ठे आप यहां पढ़ सकते हैं

उन्हीं दिनों मैंने आईना पर सहादत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह प्रकाशित की थी। यह कहानी भी मैंने उर्दू की एक साईट से भोमियो द्वारा लिप्यांतर करके प्राकाशित की थी। आईना पर मंटो, अमृता प्रीतम, शिव कुमार बटालवी और गुलजार की रचनायें पढ़ने के लिये ढेरों पाठक आते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि ये पाठक इन रचनाओं को कई अलग अलग लिपियों में पढ़ते हैं।

मेरा बहुत पुराना एक सपना था कि इस तरह का लिप्यांतर हिंदी टूलबार में भी उपलब्ध करवाया जाये। अब वह सपना सच हो गया है।

हिंदी टूलबार पिटारा में भोमियो बटन लगा दिये गये हैं। अब अगर आप किसी साईट की लिपि बदल कर पढ़ना चाहते हैं तो बस इच्छित लिपि के बटन पर क्लिक करें और साईट की लिपि बदल जायेगी। इसके लिये अब जरूरी नहीं कि वांछित साईट पर भोमियो का कोड लगा हो और न ही अब आपको भोमियो की साईट पर जा कर इच्छित साईट का URL लिखने की जरूरत होगी।

इस सुविधा की घोषणा हिंदी टूलबार पिटारा के चिट्ठे पर अलग से विस्तार से की जायेगी।


ट्रांसलिट्रेशन का फायदा

Benefits of Indic Transliteration

मैंने कल ही देखा कि भारत में लोग सबसे ज्यादा क्या सर्च (Search) कर रहे हैं अब गूगल (Google)  यह भी बता रहा है।

आजकल सबसे ज्यादा सर्च (Search) होने वाले शब्दों में क्रिकेट और इससे संबधित शब्द ही हैं।

अब इस सर्च साईट पर crcketscorecard का नतीजा देखिये। मेरी एक ही प्रविष्टी हिंदी, कन्नड़ और गुजराती तीन भाषाओं में नजर आ रही है।

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चिट्ठों को रोमन में पढ़ने के लिये चिट्ठाजगत की साईट पर जाने की जरुरत नहीं

एक बार शायद श्रीश शर्मा ने कहा था कि चिट्ठाजगत की टीम का दिमाग बहुत ही उर्वर है और ये लोग ऐसे ऐसे आइडिया खोज कर लाते हैं जिसके बारे में कोई दूसरा सोच भी नहीं सकता।

अब चिट्ठाजगत पर हमें  मिला है अपने चिट्ठे के लिये RSS फीड रोमन में। यानि कि अब आप अपने चिट्ठे पर एक बटन लगायें रोमन फीड सब्सक्राईब करने का और आपके पाठक आपके चिट्ठे की रोमन फीड के ग्राहक बन सकते हैं। फिर उसके बाद पाठक चाहें गूगल रीडर या किसी भी अन्य फीड रीडर पर इस रोमन फीड को  पढ़ सकेंगे। यानि चिट्ठाजगत की साईट पर जाने से मुक्ति। इसके लिये बस आपको चिट्ठाजगत के इस पृष्ठ पर जाना है और अपने चिट्ठे का लिंक देना है। चिट्ठाजगत आपके लिये एक कोड बना देगा, बस इस कोड को अपने साईडबार में लगाइये बिल्कुल जैसे मैंने लगाया है। ऐसी सुविधा देने के लिये चिट्ठाजगत का बहुत बहुत धन्यवाद।


आप को पाठक और डॉलर दोनो मिल सकते हैं इससे

Earning on Hindi Blogs, Hindi SEO

क्या जमाना आ गया है। डॉलर का मुकाबला प्याज से होने लगा है। वैसे भी अब एक  किलो प्याज की कीमत एक डॉलर के बराबर पहुंच रही है। अब यह प्याज की उन्नति है या डॉलर की अवनति  यह तो आप ही फैसला कीजिये। खुशी की बात है कि हमारे चिट्ठाकार अब एडसेंस की आय से घर के लिये प्याज खरीदने की बात कर रहे हैं।

रवि जी ने अपने लेखों में फीड(Feed)  के बारे में समझाया और फिर ट्रांसलिट्रेशन के बारे में भी। भोमियो का ट्रांसलिट्रेसन वाकई कमाल की चीज है तथा इस के बारे में कई चिट्ठाकार पहले भी लिख चुके हैं।

हिंदी चिट्ठाकार(Hindi Bloggers)  अपने चिट्ठों(Blogs)  से प्याज तो क्या प्याज का छिलका भी नहीं कमा पाते तो उसका कारण है। इस बारे में मैंने पहले भी लिखा है कि अधिकतर चिट्ठाकार(Bloggers) केवल चिट्ठाकारिता(Blogging)  में चल रही बहसों और चिट्ठाकारों के बारे में ही लिखते हैं। न भी लिखें तो भी दिमाग में कहीं पाठक के रूप में चिट्ठाकार ही होते हैं। होता भी यही है कि आपने कोई नयी पोस्ट की तो एग्रिगेटरों से दो सौ - ढाई सौ पेजलोड्स हो गये और अगले दिन से घटते घटते पचास साठ रह गये फिर आपने पोस्ट लिखी तो पाठक आये और फिर खत्म। एक किलो प्याज के लिये पूरा एक महीने का इंतजार।

रवि जी के चिट्ठे की फीड के एक सौ पचास से भी अधिक ग्राहक हैं। अपने श्रीश शर्मा यानि कि ईपंडित की फीड के भी पचहतर ग्राहक हैं। मजेदार समाचार की फीड के पचास ग्राहक हैं। अब जब भी इन चिट्ठों पर कुछ भी लिखा जाता है वह यह सोच कर ही लिखा जाता है कि हम जो लिखने वाले हैं वह जिन लोगों ने इस फीड को सब्सक्राइब कर रखा है  उनके लिये यह लेख  कितने महत्व का है। हो सकता है कि वे लोग हिंदी चिट्ठा (Hindi Blog) संसार के बारे में इतना न जानते हों। इनमें से अधिकतर फीड ग्राहक इन फीड्स को अपने किसी फीड रीडर पर ही पढ़ते हैं या इसे इमेल से प्राप्त करते हैं। वे इन्हे इन चिट्ठों पर आकर नहीं पढ़ते।

तो क्या इन चिट्ठाकारों का घाटा है कि पाठक तो हमारे चिट्ठे पर आया ही नहीं? उसने हमारी ऐड पर तो क्लिक किया ही नहीं? नहीं। इन चिट्ठाकारों ने अपने इन ग्राहकों को अपना नियमित पाठक बना लिया है। अन्यथा ये लोग एक बार इन चिट्ठों पर आये थे तो हो सकता है वापिस जा कर कभी भी न आते। जब ये लोग इन चिट्ठों पर आये तो इन्हें यहां की सामग्री अपने पढ़ने लायक लगी तो इन्होंने इन चिट्ठों का ग्राहक बनना स्वीकार किया। अब यह ग्राहक हो सकता है कि यदा कदा इन चिट्ठों पर भी आये। यदि वह पाठक इन चिट्ठों का ग्राहक न बनता तो शायद ही कभी वापिस आता। इस तरह से देखा जाये तो अपने फीड को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना घाटे का नहीं फायदे का सौदा ही हो सकता है।जब हम फीडबर्नर को अपने चिट्ठे की फीड देते हैं तो हमारे लिये फीडबर्नर ग्राहक बनाता है। मैं कितने ही चिट्ठे गूगल रीडर पर पढ़ता हूं। इसका मतलब यह हो गया कि गूगल रीडर ने या फीडबर्नर ने चिट्ठाकार के कापीराइट का हक मार लिया? कुछ लोग तो आपकी फीड को ऑफलाइन डाउनलोड करके पढ़ते हैं।

गूगल रीडर पर पढ़ते हैं चिट्ठे

अब ट्रांसलिटरेशन की बात। हम लोगों ने अपने चिट्ठों पर भोमियो का कोड लगा रखा है। बहुत अच्छी चीज है। इसे सभी चिट्ठाकारों ने हाथों हाथ लिया। इससे हमें वे पाठक भी मिले जो अन्यथा नहीं मिलते। रवि जी ने मेरे पंजाबी चिट्ठे का भी उदाहरण दिया।

अब यदि चिट्ठाजगत हमारे लेख को रोमन में बदल कर अपने ही साइट पर दिखा रहा है तो इससे हमारे नैचरल पाठक तो कम नहीं कर रहा। वो हमारी फीड को अधिक लोगों तक पहुंचा रहा है जो कि अन्यथा न तो चिट्ठाजगत पर आते और न ही हमारे चिट्ठे पर। चिट्ठाजगत फीड्बर्नर की तरह हमारे लिये नये पाठक क्रियेट कर रहा है। अब यह नया पाठक जब यह जान लेगा कि इसी तरह की ट्रांसलिटरेशन सुविधा भोमियो के जरिये हमारे अपने चिट्ठे पर भी उपलब्ध है तो वहां भी आयेगा ही। और यदि वह पाठक देवनागरी पढ़ सकता होगा तो जरूर हमारे ही चिट्ठे पर आयेगा क्योंकि  रोमन पढ़ना सुविधाजनक नहीं होता।

एक बात और। हमारे देश में जितने इंटरनेट कनेक्शन हैं उससे कई कई गुणा ज्यादा ऐसे मोबाइल फोन हैं जिन पर इंटेरनेट चलता है। मोबाइल की शक्ति को गूगल भी पहचान रहा है। अधिकतर मोबाइल फोन्स पर देवनागरी नहीं पढ़ी जा सकती। हालांकि मेरे नये मोबाइल में देवनागरी पढ़ी जा सकती है मगर उन करोड़ों माबाइल धारकों के बारें सोचिये जिनके मोबाइल पर देवानागरी नहीं पढ़ी जा सकती। ये करोड़ों मोबाइल धारक बड़े शहरों में शाम को जब बस या ट्रेन से घर जाते हैं तो अपने मोबाइल पर ही रास्ते का लंबा समय बिताते हैं। उसी तरह छोटे शहरों में भी शाम को लोग घर आते हैं और बिजली न होने पर मोबाइल पर ही समय बिताते हैं। रोमन एग्रिगेटर इन लोगों को भी अपनी और खींच सकता है। चिट्ठाजगत इससे भी एक कदम आगे जा कर आपके चिट्ठे के लिये रोमन फीड भी बना सकता है। अब सोचिये उन करोड़ों  गैर हिंदी भाषियों के बारे में जो कि हिंदी को समझते हैं पर पढ़ नहीं सकते अब वे भी हमारे चिट्ठों की फीड के ग्राहक बन सकेंगे।

फीड में विज्ञापन

मैं तो यही सुझाव दूंगा कि अपनी फीड को बंद करने के बजाये अधिक से अधिक फीड ग्राहक बनायें और अपने पाठकों की संख्या में वृद्धि  करने की कोशिश करें। ब्लॉगर आपको फीड में विज्ञापन डालने की सुविधा भी देता है और यकीन मानिये सप्ताह में एक दो प्याज इससे भी मिलते हैं। हिंदी चिट्ठों और पाठकों की संख्या में यदि इसी तरह वृद्धि होती रही तो जल्द ही आपको प्याज के साथ खाने को मुर्गा और पीने को विस्की भी मिलेगी।