क्या आपको भी चिट्ठाकारी का नशा हो गया है ?

1. जब आप अपने नाम की जगह दूसरों को अपने चिट्ठे का नाम बताने लगें और पते के स्थान पर URL बताने लगें।



2. जब आप सुबह सुबह उठते ही कंप्यूटर ऑन करके बैठ जायें या शौचालय में भी अपना लैपटॉप साथ ले जायें।



3. जब रु 25000/- प्रतिमाह की तन्ख्वाह से ज्यादा महत्वपूर्ण रोज के $0.08 लगने लगें।



4. जब खुद की साधुवादिता पर ही आपको हीन भावना होने लगे।



यहां भी देखें

कुछ मजेदार कार्टून


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शिव कुमार बटालवी के कुछ गीत



शिव कुमार बटलवी के बारे में मैंने पहले भी लिखा था और उनके कुछ गीत प्रस्तुत किये थे।

आज उनके जन्मदिन पर फिर से उनके बारे में बता रहा हूं और कुछ और गीत पेश कर रहा हूं।

बिरह का सुलतान - शिव कुमार बटालवी (ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ)



शिव कुमार बटालवी पंजाबी के ऐसे आधुनिक कवि हैं जिनके गीतों में पंजाब के लोकगीतों का आनंद भी हैं।
शिव का जन्म 23 जुलाई 1936 को शकरगढ़, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार बटाला में आ गया। ढेरों गीत और कवितायें लिखने वाले शिव कुमार बटालवी को 1965 में अपने काव्य नाटक “लूणा ” के लिये साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। शिव के गीतों में प्यार है, दर्द है, सब से बड़ी बात है कि उन्होंने पंजाबी को अपने गीतों से समृद्ध किया। उन्हे बिरह का सुल्तान कहा जाता है। पंजाबी अपने इस कवि से बहुत प्यार करते हैं। पंजाब में कवितायें लोक गीत बन जाती है और कवि पढ़े चाहे जायें या नहीं मगर सुने बहुत जाते हैं। जैसे वारिस शाह की ‘हीर’ गायी और सुनी जाती है। शिव के गीत भी पंजाब में बहुत लोकप्रिय है, इस का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके गीतों को लगभग सभी पंजाबी गायकों ने तो गाया ही, महेन्द्र कपूर और नुसरत फतह अली खान साहब ने भी गाया। जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह द्वारा गाये शिव के गीतों की एलबम मेरी सबसे प्रिय एलबम है। (आप इनके गाये शिव के गीतों को सुनने के लिये इन लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं)


मिर्चां दे पत्तर

पुनियां दे चन्न नूं कोइ मस्या
कीकण अरघ चड़ाये वे
कद कोई डाची सागर खातिर
मारू थल छड जाये वे


करमां दी मेंहदी दा सजना
रंग कीवें दस्स चड़दा वे
जे किस्मत मिर्चां दे पत्तर
पीठ तली ते लाये वे,


गम दा मोतिया उत्तर आया
सिदक मेरी दे नैनीं वे
प्रीत नगर दा औखा पैंदा
जिंदड़ी किंज मुकाये वे


किकरां दे फुल्लां दी अड़िया
कौन करेंदा राखी वे
कद्द कोइ माली मल्लियां उत्तों
हरियल आन्न छुड़ाये वे


तड़प तड़प के मर गयी अड़िया
मेल तेरे दी हसरत वे
ऐसे इशक दे जुल्मी राजे
बिरहों बाण चलाये वे


चुग्ग चुग्ग रोड़ गली तेरी दे
घुंघणियां वांग चब लये वे
कट्ठे कर कर के मैं तीले
बुक्कल विच दुखाये वे


इक चुल्ली वी पी न सकी
प्यार दे नितरे पानी वे
व्योंध्या सार पये विच पूरे
जां मैं होंठ छुहाये वे.

इश्तेहार



इक कुड़ी जिंदा नां महोब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है


सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओ मरियम लगदी
हंसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां गजल है लगदी
लम्म सलम्मी सरू दे कद्द दी
उमर अजे है मर के अग्ग दी
पर नैनां दी गल्ल समझदी


गुमयां जनम जनम हण होये
पर लगदा ज्यों कल दी गल है
यूं लगदा ज्यों अज्ज दी गल्ल है
यूं लगदा ज्यूं हुण दी गल्ल है


हुणे तां मेरे कौल खड़ी सी
हुणे तां मेरे कौल नहीं है
एह की छल है एह केही भटकन
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नजर मेरी हर आंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है
ओस कुड़ी नूं टोल रही है


ओस कुड़ी नूं मेरी सौं है
ओस कुड़ी नूं अपनी सौं है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौं है
ओस कुड़ी नूं जग दी सौं है
जे कित्थे पड़दी सुनदी होवे
ज्यूंदी या ओह मर रही होवे
इक वारी आके मिल जावे
वफा मेरी नूं दाग ना लावे
नहीं तां मैथों जिया ना जांदा
गीत कोइ लिखया ना जांदा


इक कुड़ी जिंदा नां महोब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

रुख



कुज रुख मैनूं पुत्त लगदे ने
कुज रुख लगदे मांवां
कुज रुख नूंहां धीयां लगदे
कुज रुख वांग भरांवां
कुज रुख मेरे बाबे वक्कण
पत्तर तांवां तांवां
कुज रुख मेरी दादी वरगे
चूरी पावन कांवां
कुज रुख यांरा वरगे लगदे
चुम्मां ते गल्ल लावां
इक मेरी महबूबा वक्कण
मिट्ठा अते दुखांवां
कुज रुख मेरा दिल करदा वे
मोडे चक्क खिडावां
कुज रुख मेरा दिल करदा वे
चुम्मां ते मर जांवा
कुज रुख जद वी रल के झुम्मण
तेज वगन जद हवांवा
सावी बोली सब रुखां दी
दिल करदा लिख जांवां
मेरा वी एह दिल करदा है
रुख दी जूणे आवां
जे तुसां मेरा गीत है सुनना
मैं रुखां विच गांवा
रुख तां मेरी मां वरगे ने
ज्यों रुखां दियां छांवां.


यूं तो मैं इतना सक्षम नहीं कि इन खूबसूरत गीतों के भावार्थ लिख पाऊं फिर भी अनूपजी और समीर जी के कहने पर कोशिश कर रहा हूं।


पहला गीत विरह का गीत है।


शुरू की पंक्तियों के भाव हैं



किस्मत की मेंहदी का दोस्त रंग बता कैसे चढ़े


गर किस्मत ही मिर्ची के पत्ते पीस हथेली पर लगाये रे



दूसरी नज्म एक इश्तहार के रूप में है


एक लड़की जिसका नाम मोहब्बत


गुम है


सूरत उसकी परियों जैसी


सीरत उसकी मरियम जैसी


हंसती है तो फूल झड़ते हैं


चलती है तो गजल है लगती


छोटी उम्र है पर आंखों की बात समझती है


उसे गुम हुए कई जनम बीत चुके


पर लगता है ज्यों अभी की बात है


उस लड़की को मेरी सौगंध है


अगर कहीं पढ़ या सुन रही हो


एक बार आ कर मिल जाये


नहीं तो मैं अब जी नहीं सकता


गीत कोई भी लिख नहीं सकता



तीसरा गीत है रुख यानी वृक्ष



कुछ पेड़ मुझे बच्चों जैसे लगते हैं


कुछ माओं जैसे


कुछ भाइयों जैसे


कुछ बेटियों बहुओं जैसे


कुछ दोस्तों जैसे


दिल करे गले लगा लूं


कुछ महबूबा जैसे


मी्ठे और कभी खट्टे


कुछ को दिल करे कंधे लगा कर खिलाऊं


सब पेड़ों की एक ही भाषा


दिल करे उसी भाषा में लिख जाऊं


कभी कभी मेरा दिल करता है


पेड़ का जनम ले कर आऊं


यदि आपको मेरा गीत सुनना है


तो मैं पेड़ों के बीच हॊ गाऊं


पेड़ मेरी मां जैसे हैं


मांएं जैसे ठंडी छायाएं।


 


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“बिरह” का सुलतान - शिव कुमार बटालवी


 





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अब बस क्लिक करें और किसी भी साईट पर हिंदी लिखना शुरू कर दें

आज शास्त्री जे सी फिलिप ने चिट्ठाकार समूह पर कुशिनारा हिंदी तुलिका टूल के बारे में बताया। इस टूल के बारे में पहले से सुन तो रखा था मगर इस तरह से इसकी उपयोगिता हो सकती है यह आइडिया मुझे शास्त्री जे सी फिलिप जी की बात से ही आया। अब इस टूल को हिंदी टूलबार में जोड़ दिया गया है। अब आप ब्राउज करते करते किसी भी साईट पर पहुंचें बस इस टूलबार के ’हिंदी लिखे’ बटन पर क्लिक करें और शुरू करदें हिंदी लिखना। इसके लिये बरहा अथवा इसी तरह के किसी अन्य सॉफटवेयर की जरूरत नहीं होगी।

आपको बस इस टूलबार को डाउनलोड करके स्थापित करना है और बस शुरू हो जाइये किसी भी साइट पर हिंदी लिखना।

हिंदी टूलबार यहां से डाउनलोड करें।


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आइये समझें गुलजार को : मैंडा यार मिला दे....

आ देख मेरी पेशानी को तक़दीर के हरफे लिक्खे हैं


पैरों के निशाँ जब देखे जहाँ सौ बार झुकाया सर को वहाँ

(पेशानी =माथा, तकदीर = किस्मत, हरफे = वाक्य)


गुलजार साहब के ये बोल बहुत ही अनोखे हैं। फिल्मी गीतों के पूरे इतिहास में ऐसे खूबसूरत बोल कहीं नहीं मिलते। मैं तो यहां तक कहुंगा कि इन दो लाइनों मे गुलजार साहब गालिब की बराबरी करते नजर आते हैं। शब्दों के अर्थ समझ में आ भी जायें तो भी बात का मर्म बहुत बाद में समझ आता है।


 


साथिया फिल्म में ए आर रहमान का गाया यह गीत मुझे इतना पसंद है कि एक ही दिन में लगातार इस गीत को अगर मैं पचासों बार भी सुन लूं तो भी जी नहीं भरता। आसानी से चाहे गीत समझ में न आये पर रहमान साहब ने जिस शिद्दत से इसे गाया है, यह गीत सुनने वाले के दिल में उतर जाता है। मैंने पूरा इंटेरनेट छान मारा मगर इसके सही बोल न तो देवनागरी में मिले और न ही रोमन मैं हालांकी गलत बोल कई जगह मिलते हैं। सूफी अंदाज में लिखे और गाये गये इस गीत में जो पंजाबी के शब्द प्रयोग में लाये गये हैं उस तरह की पंजाबी पाकिस्तान में ज्यादा बोली जाती है। आइये थोड़ा इस गीत को समझने की कोशिश करते हैं।


बंजर है सब बंजर है


बंजर है सब बंजर है


हम ढूँढने जब फ़िरदौस चले (फ़िरदौस =स्वर्ग)


तेरी खोज तलाश में देख पिया हम कितने काले कोस चले


बंजर है सब बंजर है


मैंडा यार मिला दे साईयाँ (मैंडा = मेरा)


इक बार मिला दे साईयाँ


एक बार मिला दे साईयाँ


मैंने पोटा पोटा फ़लक़ छाना, (पोटा =अंगुलियों के पोर, फ़लक़= आकाश)


मैने टोटे-टोटे तारे चुने (टोटे-टोटे = टुकड़े टुकड़े)


मैंडा यार मिला दे साईयाँ


इक बार मिला दे साईयाँ इक बार मिला दे साईयाँ


तारों की चमक ये सुबह तलक़ लगती ही नहीं पल भर को पलक,


साईयाँ साईयाँ साईयाँ


मैंने पोटा पोटा फ़लक़ छाना,


मैने टोटे-टोटे तारे चुने


सिर्फ़ इक तेरी आहट के लिये


कंकड़ पत्थर बुत सारे सुने


हुण मेणे ते रुस्वाइयाँ (हुण = अब, मेणे = उलाहने,रुस्वाइयाँ = बदनामियां )


मैंडा यार मिला दे साईयाँ


इक बार मिला दे साईयाँ


इक बार मिला दे साईयाँ


मैंडा यार मिला दे साईयाँ


आ देख मेरी पेशानी को तक़दीर के हरफ़े लिक्खे हैं


पैरों के निशाँ जब देखे जहाँ सौ बार झुकाया सर को वहाँ


यार मिला दे साईयाँ


आ देख मेरी पेशानी को तक़दीर के हरफ़े लिक्खे हैं


मैं कितनी बार पुकारूँ तुझे तेरे नाम के सफहे लिक्खे हैं (सफहे = पन्ने)


तेरा साया कभी तो बोलेगा तेरा साया कभी तो बोलेगा मैं सुनता रहा परछाइयाँ


मैंडा यार मिला दे साईयाँ


इक बार मिला दे साईयाँ


इक बार मिला दे साईयाँ


मैंडा यार मिला दे साईयाँ


आप इस गीत को यहां सुन सकते हैं।


इसे भी पढ़ें:


गुलजार साहब का ‘झूम बराबर झूम’ और ‘टिकट टू हॉलिवूड’


 




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वित्तमंत्री जी डाक टिकट के पैसे तो दे दो इन्हें


आज जीतू भाई से दिल्ली में मिलने से पहले मैं अपना आयकर रिटर्न जमा करवाने ITO गया। कई सालों से देख रहा हूं कि दिल्ली के ITO ऑफिस में कैसा बुरा हाल है। ऑफिस के गलियारों और कमरों में पर्याप्त रोशनी नहीं है। कूलर दसियों साल पुराने हैं। जो रिटर्न हर साल हम बड़े चाव से बनाते हैं और बड़े शान से जमा करवाते हैं वह सब रिटर्न वहां यूंही खुले में जमीन पर पड़ीं दिखीं। मैने जब कर्मचारी से अपने 2004- 05 तथा 2005-06 के रिफंड के बारे में जानना चाहा तो उन्हों ने कहा की जुलाई के बाद ही आकर पता करें। मेरे यह पूछने पर कि क्या आप डाक से भिजवा देंगे कर्मचारी ने कहा कि आप खुद ही आकर पता कर लीजियेगा क्योंकि हमें तो डाक टिकट भी नहीं मिलते अपने पास से टिकट लगा कर भेजने पड़ते हैं।

अब पता नहीं कि कर्मचारी सच कह रहा था या बहाने से बुला कर कुछ अपनी जेब गर्म करवाना चाहता था।

आज सुबह ही अखबार में पढ़ा था कि सरकार के पास 5000 करोड़ रुपये का बकाया रिफंड पड़ा है। मंत्री जी इस पैसे के एक दिन के ब्याज के बराबर भी अगर आप आयकर विभाग के कार्यालयों के ऊपर खर्च करदें तो कैसा रहे? न सिर्फ यहां आधारभूत सुविधाओं की आवश्यकता है इसके साथ साथ सारे कार्यालय को कंप्यूटरीकृत कर करदाताओं के लिये उनके रिटर्न तथा रिफंड के बारे में ऑनलाइन जानकारी भी दिया जाना आवश्यक है। सरकार ने कर तथा रिटर्न जमा करवाने की तो समय सीमा निर्धारित की हुई है मगर रिफंड भिजवाने की कोइ समय सीमा तय नहीं की है।




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फिशिंग के बाद अब विशिंग से बच कर रहें

जी हां इंटेरनेट का धोखा फिशिंग(phishing) अब नये रूप में आपके मोबाइल पर आगया है जिसे कहते हैं विशिंग(Vishing )। आज के इकॉनामिक टाइम्स में छपे एक समाचार के अनुसार वर्चुअल दुनिया के धोखेबाज अब और भी चालाक हो गये हैं। ये धोखेबाज इंटेरनेट पर उपलब्ध कुछ सॉफट्वेयरों से युद्धस्तर पर एक साथ सैंकड़ों फोन नम्बरों पर इंटेरनेट से फोन मिला कर ग्राहकों तक पहुंचते हैं। ग्राहक इसे बैंक से आयी ऑटोमेटिड कॉल समझ लेते हैं। बदले में ऊधर से आती आवाज ग्राहक से अपने बैंक अथवा क्रैडिट कार्ड का नंबर तथा अन्य विवरण ले लेती है।


जानकारों ने चेताया है कि यदि आपसे कोई फोन कॉल पर क्रेडिट कार्ड के नंबर के साथ तीन अंकों वाला कार्ड के पीछे छपा Card Verification Value (CVV) भी मांगे तो कभी भी इसे न बतायें और न ही इस नंबर को दबायें।
इस सॉफट्वेयर में हर अंक के लिये अलग आवाज निश्चित होती है जिसके कारण आपके द्वारा दबाये गये सभी नंबरों का उन धोखेबाजों को पता चल जाता है। फिशिंग में जहां धोखेबाजों को बैंक की साईट से मिलती जुलती साईट बनानी पड़ती है विशिंग में इतनी ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती।

फिशिंग मे आपके पास आयी इमेल आपको आपके बैंक से मिलती जुलती एक साईट पर ले जाती हैं और आपसे आपकी बैंक अथवा क्रेडिट कार्ड की जानकारी पिन नंबर के साथ ले ली जाती है जिससे हो सकता है कि धोखेबाज आपके बैंक एकाऊंट से पैसा निकालने अथवा आपके कार्ड के बदले ऑनलाइन खरीदारी करने में सफल हो जायें।


तो यदि आपके साथ ऐसा हो तो सतर्क रहे और अपने बैंक अथवा कार्ड की जानकारी किसी को भी न दें और अपना पिन नंबर तो भूलकर भी कभी किसी बैंक के कर्मचारी को भी न बतायें।


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क्या कोइ हमें हिंदी चिट्ठों का देसीपंडित देगा ?

मेरे दोस्त राजेश रोशन ने लिखा कि कैसे उनकी एक पोस्ट पर एक ही दिन में 221 हिट्स मिले। ऐसा ही एक बार मेरे एक पोस्ट पर हुआ जब मैंने गुरू फिल्म के अनदेखे सीन पोस्ट किये और उनका लिंक किसी ने ऑर्कुट पर किसी की स्क्रैपबुक पर लगा दिया।

यह बात पहले भी कई वरिष्ठ चिट्ठाकार लिख चुके हैं कि एग्रीगेटर केवल वह नोटिसबोर्ड होता है जो कि आपकी पोस्ट की सूचना लोगों तक दे देता है। वास्तव में केवल पहले और दूसरे दिन ही लोग एग्रीगेटर से उस पोस्ट तक आते हैं उसके बाद सर्च करने वाले ही आपके चिट्ठे की विभिन्न पोस्टों तक आते हैं और हमारी पोस्ट की आयू तो अनंत वर्षों की है। आईना पर सर्च से आने वाले

यहां मैं अपनी एक पोस्ट दिस इज़ हिंडी न्यूजपेपर फ़्रॉम डेल्ही का उदाहरण देता हूं जिसे मैंने जून 2006 में पोस्ट किया था। आप देख सकते हैं कि पिछले तेरह महीने में इस पोस्ट पर तेरह सौ से ज्यादा हिट्स मिले हैं।
मेरी एक पोस्ट के  आंकड़े
यदि आपकी पोस्ट में कुछ ऐसा लिखा है जो केवल आज ही नहीं आने वाले समय तक प्रासांगिक है तो पाठक आपके चिट्ठे पर आते रहेंगे। अब जब चिट्ठाकारों की संख्या जल्द ही हजार (अभी तक ७६१) को छूने वाली है और प्रतिदिन दो सौ से अधिक लेख पोस्ट होंगे तो एग्रीगेटर की भूमिका और भी नग्णय हो जायेगी। आज जब हम इस बात पर खुश हो रहे हैं कि हमारी पोस्ट बटन दबाते ही एग्रीगेटर पर आ जायेगी तब इस बात को भूल रहे हैं कि जल्द ही इतने चिट्ठे हो जायेंगे कि हमारी पोस्ट एक घंटा भी एग्रीगेटर के पहले पेज पर नहीं रहेगी। दिन भर एग्रिगेटरों की बहती गटरगंगाओं में कोइ अच्छी पोस्ट कब आयी और कब चली गयी पता भी नहीं चलेगा। आज हमें शायद नये एग्रीगेटरों की उतनी जरूरत नहीं है जितनी कि एक मैच्योर तरीके से की गयी चिट्ठाचर्चा की जरूरत है जिसमें दिन की केवल अच्छी पोस्टों का ही जिक्र हो। क्या कोइ हमें हमारा हिंदी चिट्ठों का अपना देसीपंडित देगा?

देसी पंडित पर मेरी एक पोस्ट


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नारद पर सर्च करें सीधे अपने ब्राउज़र से

search2.jpgआज अनजाने ही इस मजेदार चीज का पता चला। यदि आपके पास इंटेरनेट एक्सप्लोरर 7 है तो आप सीधे अपने ब्राउज़र से ही नारद या किसी भी ब्लॉग पर बिना वहां पर गये सर्च कर सकते हैं। बस नारद या जिस ब्लॉग से search.jpgsearch.jpgआप सीधे सर्च करना चाहते हैं उसे आपको अपने ब्राउज़र मे सर्च प्रोवाईडर के रूप में जोड़ना पड़ेगा। ब्राउज़र में सर्च प्रोवाईडर को जोड़ना बेहद आसान है। पहले आप अपने ब्राउज़र के सर्च इंजन के ड्रॉपडाउन मीनू में जा कर Find more providers क्लिक करें, आप माइक्रोसॉफ्ट की इस साइट पर पहुंच जायेंगे। यहां Create Your Own के बॉक्स में यह URL डाल दें। http://narad.akshargram.com/?s=TEST अब इसे नाम दे कर Install पर क्लिक कर दें। बस हो गया। अब नारद आपके सर्च इंजनों में जुड़ गया। अब आप सीधे अपने ब्राउज़र से नारद पर सर्च कर सकते हैं।

ब्लॉगस्पॉट के ब्लॉगर यदि अपने ब्लॉग पर गुगल एड लगाते हैं तो गुगल एड से वे गुगल सर्च अपने चिट्ठे पर लगायें। अब इस सर्च बॉक्स में लिखें TEST और अपने ब्लॉग को सर्च करने का विकल्प टिक करके एंटर करें। अब जो साइट खुलेगी उसका URL कॉपी करके Create Your Own के बॉक्स में डाल दें। इस प्रकार आप अपने चिट्ठे को भी सीधे अपने ब्राउज़र से सर्च कर पायेंगे।

वर्डप्रैस के चिट्ठाकार सर्च का विजेट लगा कर ऊपर की प्रक्रिया से इसे जोड़ें। वर्डपैस का URL यूं आयेगा http://aaina2.wordpress.com/?s=TEST बस यहां http://aaina2.wordpress.com/ के स्थान पर अपने चिट्ठे का पता डाल लें।


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देवनागरी में दिखता है मोबाइल पर ब्लॉगवाणी

मैं हमेशा से सोचता था कि काश हिंदी चिट्ठे मोबाइल पर भी पढ़े जा सकते। भोमियो की जब प्रॉक्सी पते पर रोमन में हिंदी पढ़ने की सुविधा मिलने लगी तो मोबाइल पर नारद और हिंदी चिट्ठों को रोमन मॆं पढ़ना आसान हो गया। अब मैं मजे से नारद पर आयी नयी पोस्ट अपने मोबाइल पर रोमन में देख लेता हूं मगर अभी भी एक कसक मन में रहती है देवनागरी में मोबाइल पर पढ़ने की। आज मेरी खुशी का उस समय ठिकाना न रहा जब मैंने ब्लॉगवाणी पर साइडबार को देवनागरी में अपने मोबाइल पर देखा। मैंने झट से मैथिली जी को फोन मिलाया और उन्हें बताया कि ब्लॉगवाणी की साइडबार को देवनागरी में मोबाइल पर भी पढ़ा जा सकता है। उन्हों ने खुश हो कर कहा कि हम पूरी साइट को ही इसी फॉट में बदल देते हैं। शाम तक पूरीसाइट ही मोबाइल पर पढ़ी जा सकती थी। हमारे देश में जितने इंटेरनेट कनेक्शन हैं उनसे कई गुणा ज्यादा इंटेरनेट एक्सेस कर सकने वाले मोबाइल हैं। फिर क्यों नहीं सारे हिंदी चिट्ठे इसी फॉट से लिखे जाते?  क्या मैथिली जी कैफेहिंदी के टाइपिंग टूल में यह सुविधा जुड़वा सकते हैं ?यहां यह बताना जरूरी है कि मेरा मोबाइल है I Mate SP3. OS Windows Mobile 3, Browser Internet Explorer.








कुछ मजेदार कार्टून

मजेदार समाचार पर मजेदार समाचारों के अलावा मजेदार कार्टून भी कभी कभी देखने को मिलते हैं। हाल ही में छपे कुछ मजेदार कार्टून आपके लिये।










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यह चिट्ठाचर्चा नहीं है फिर भी...

आज नारद पर एक बहुत ही मजेदार चीज देखने को मिली। नारद पर आयी हर पोस्ट का शीर्षक जैसे अपने पहले वाले पोस्ट के शीर्षक का ही जवाब था। यकीन न हो तो यहां देख लीजिये। मजे की बात यह है कि अधिकतर पोस्ट एक दूसरे के साथ साथ हैं।


रचनात्मकता नाम की कोई चीज़ नही है। - नारद का एकाधिकार खत्म होगा! 



हमारा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं है - बडे़ भाई की ब्लोगर मीट

विकी पर कोई गया तो फिर लौटाnarad-1.jpgnarad-1.jpg है? - समीर लाल - तुम अकेले नहीं


स्वर्ग मे बाथरूम नहीं…. - तॊलिया,इजिचेअर ऒर वेटिंग-रूम


यादोंके झरोखों से... - गोत्र को गाली देनेवालों, सुनो


नक्सलवाद को समस्या नहीं मानें - बोए पेड बबूल का


नमक खाओ तो सेंधा नमक खाओ - भूत और कामुकता के बीच विज्ञापन


नए और फ्लॉप लेखक हिट्स से विचलित न हौं - भूख का इलाज


गोत्र का स्त्रोत - अंधेरे में झांकती आँखें


ईर्ष्या - आज का विचार


मेरा एक गीत सूनें - पहला नशा ,पहला खुमार


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हमहूं छाप दिये अखबार


गुलजार साहब का ‘झूम बराबर झूम’ और ‘टिकट टू हॉलिवूड’