माँ

निदा फा़ज़ली की तीन नज़्में

एक दिन


सूरज एक नटखट बालक सा



दिन भर शोर मचाए

इधर उधर चिड़ियों को बिखेरे


किरणों को छितराये


कलम, दरांती, बुरुश, हथोड़ा


जगह जगह फैलाये


शाम


थकी हारी मां जैसी


एक दिया मलकाए


धीरे धीरे सारी


बिखरी चीजें चुनती जाये।


माँ



बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन
चिमटा फुकनी जैसी माँ

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोई आधी जागी
थकी दोपहरी जैसी माँ
चिड़ियों के चहकार में गुँजे
राधा-मोहन अली-अली
मुर्ग़े की आवाज़ से खुलती
घर की कुंडी जैसी माँ

बिवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर इक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ

बाँट के अपना चेहरा, माथा,
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पूराने इक अलबम में
चंचल लड़की जैसी माँ

भीगा माँ का प्यार


मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

लेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव

सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत

पूजा घर में मूर्ती मीरा के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम

सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर

अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप

सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास

चाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान

बच्चा बोला देख कर,मसजिद आलीशान
मेरे खुदा तुझ एक को, इतना बडा मकान

मंदिर के अंदर चढे घी-पूरी-मिष्ठान
मंदिर के बाहर खडा ईश्वर माँगे दान

मै था अपने खेत मे,तुझको भी था काम
तेरी मेरी भूल का, राजा पड गया नाम

जादू-टोना रोज का, बच्चो का व्यवहार
छोटी सी एक गेंद मे भर दे सब संसार

"सा" से "नी" तक सात सुर, सात सुरों का राग
उतना ही संगीत तुझमे, जितनी तुझमें आग

सीधा-सादा डाकिया, जादू करे महान
इक ही थैले मे भरे, आँसू और मुस्कान 

जीवन के दिन-रैन का, कैसे लगे हीसाब,
दीमक के घर बैठकर, लेखक लिखे किताब

मुझ जैसा इक आदमी मेरा ही हमनाम
उल्टा-सीधा वो चले, मुझे करे बदनाम

युग-युग से हर बाग़ का, ये ही एक उसूल
जिसको हँसना आ गया वो ही मट्टी फूल

सुना है अपने गाँव में, रहा न अब वह नीम
जिसके आगे माँद थे, सारे वैद-हक़ीम।

(पहली नज्म समकालीन भारतीय साहित्य से तथा बाकी दोनों यहां से ली गयी)




चिट्ठा हिट करने के 20 नुस्खे

आज पेश हैं चिट्ठों को हिट करने के आजमाये हुए नुस्खे।

चेतावनी: इन नुस्खों का प्रयोग चिट्ठाकार अपने रिस्क पर करें। किसी भी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, अथवा मानसिक नुकसान के लिये लेखक किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है। आपको इन नुस्खों पर भरोसा नहीं तो लेखक को पत्र लिखें या मिलें. नाम गुप्त रखे जाने की सौ फीसद गारंटी ।

1. टिप्पणी करना छोड़ें : अगर आप हर जगह यहां वहां टिप्पणी करते हैं तो सावधान। अपने आप को सर्वश्रेष्ठ समझें। आपको सब ज्ञान है। अब जब आप सर्वज्ञानी हैं तो दूसरों की अज्ञान से भरी बातें न तो आप पढ़ें और न ही टिप्पणी करें। दूसरों के चिट्ठों को पढ़ने लायक ही न मानें और यदा कदा इस बात की घोषणा भी करते रहें। इससे लोग आपको सर्वज्ञानी मानने लगेंगे और लाइन लगा कर आपके यहां हिट्स पर हीट्स मिलने लगेंगे। हमारे यहां बाबाओं और स्वामियों के यहां जो भीड़ लगती है वो तो आपने देखी ही होगी।

2. हवा बाजी करें: अपने चिट्ठे पर हवा बाजी करें। जमीन से जुड़े लोगों को आजकल पिछड़ा माना जाता है। हवाबाजी से लोग अवाक हो कर आपको देखते रह जायेंगे और आप पूरे चिटठाजगत का मंच लूट कर ले जायेंगे।

3. टैक्नोराटी? वो के होवे है: आपका चिट्ठा इन टोटकों से ऊपर है। आप अच्छा लिखेंगे तो आपको नारद की भी जरूरत नहीं। लोग अपने आप पढ़ने आयेंगे आपको। अरे जो आप का लिखा न पढ़े सोचिये वो अपना कितना नुकसान कर रहा है?

4. जटिल मुद्दे: जटिल से जटिल मुद्दे उठाइये। साधारण मुद्दे आप साधारण लोगों के लिखने के लिये छोड़ दें। जितना आप जटिल मुद्दों पर लिखेंगे उतनी ही आपकी और आपके चिट्ठे की महानता बढ़ेगी। इसके लिए आप हंस कथा मासिक, वसुधा, पीपुल्स डेमोक्रेसी का नियमित अध्ययन करें और लगातार टीपते रहें.

5. जटिल भाषा: अपनी भाषा को इतना जटिल रखें कि अच्छा भला पढ़ा लिखा पाठक भी हीनभावना का शिकार हो जाये। संस्कृत के शब्दों का खुल कर प्रयोग करें। चाइनीस शब्दों का प्रयोग भी कर सकते हैं। अब आप तो जानते ही हैं कि चाइना ने कितनों को हीनभावना का शिकार बनाया हुआ है। आप जितने कम लोगों की समझ में आएंगे आपको विशेष समझने वाले व्यत्क्रमानुपात में बढ़ते जाएंगे.

6.विवाद खड़े करें: अपने चिट्ठे को हिट करने का यह आम और सर्वाधिक इस्तेमाल में लाया जाने वाला नुस्खा है। अब आपको विवाद खड़े करने के कुछ नये नुस्खे लाने होंगे जैसे की सांस लेने से कैंसर हो सकता है या पानी पीने से कैंसर हो सकता है। अब यदि कोइ इस बात का प्रतिकार करे तो पलट कर उसी पर वार करें और कहें कि तुम्ही हो जिसकी वजह से हवा और पानी की यह हालत हुई है।

7. आला तबके के लिये लिखें: आम आदमी की भाषा में आम आदमी के बारे में कभी न लिखें नहीं तो आपका चिट्ठा भी आम बन कर रह जायेगा। हमेशा आला तबके को ध्यान में रख कर लिखें।

8. ललकारें: अपने पाठकों को यदा-कदा ललकारते रहें। "हिम्मत है तो मुझे झूठा साबित करें।" "हिम्मत है तो टिप्पणी करें।" "मेरा साथ देने वाला कोइ मर्द नहीं है क्या?" इस तरह के वाक्य उछालते रहें। ग़ैरों को तुच्छ साबित करें. अपनी लाइन बड़ी करने की बजाय दूसरों की लाइन छोटी करें. जगह भरती जा रही है नयी लाइनें बनाने या बढ़ाने के लिए स्पेस कहां है?

9. दुश्मन बनायें: सफल आदमी के बहुत से दुश्मन होते हैं। आप भी अपने अधिक से अधिक दुश्मन बनायें और सफल होने का अहसास प्राप्त करें।

10. अपनी दुनिया में मस्त रहें: अपनी दुनिया में मस्त रहें, दूसरे जो भी लिख रहे हैं कान न धरें। अपने आप को हाथी समझ कर सबके बीच में से निकल जायें।

11. ऑफलाइन आपने URL का विज्ञापन दें: अपने चिट्ठे का विसिटिंग कार्ड बनायें। अखबारों में विज्ञापन दें। टीवी के टिकर में चलवायें। यदि आप अख़बार या चैनल वाले किसी दोस्त को जानते हैं तो उसे ब्लॉगजगत पर लिखने के लिए कहें और पूरी स्टोरी अपने ब्लॉग पर फोकस करवाएं।

12. विवादों से बैकलिंक: विवादों में रहने से आपको बैकलिंक मिलता है। लोग जब आपकी पोस्ट के जवाब में कुछ लिखेंगे तो आपका लिंक भी देंगे। तो आप जितने विवाद खड़े करेंगे उतनी ही आपके चिट्ठे की रेटिंग बढ़ती जायेगी।

13. टिप्पणी में सवाल करें: अव्वल तो दूसरों के ब्लॉग पर जाने से बचें. यदि चले भी गए तो दूसरों के यहां जब भी टिप्पणी करें तो पहली लाईन में पोस्ट को बेकार बतायें। फिर लिखें कि आपके बस का कुछ है नहीं। और अंत में कुछ सवाल पूछें जैसे की "बड़ी बड़ी बातें कर रहे हो कभी अपने बच्चों को होमवर्क भी करवाया है।" या "तुमने कौनसे तीर मार लिये?" टाईप। इससे वो तिलमिलाएगा क्योंकि ऐसा कहने का अधिकार अब तक सिर्फ़ उसकी पत्नी को था. अब देखिये वो जवाब देने आपके चिट्ठे पर जरूर आयेगा।

14. दिन में पांच पोस्ट करें, नारद पर छा जायें: पहली से पांचवीं तक आते आते बात से पलट जायें| यानि अगर पहली पोस्ट में आपने लिखा है कि कोकाकोला पीना पूंजीवाद को बढ़ावा देता है तो पहली पोस्ट में आक्रामक तरीके से लिखें, लोगों पर हमला करें। जब माहोल गरम हो जाये तो अगली पोस्ट में थोड़ा नरम हो जायें। दिन की आखिरी पोस्ट तक आते आते सिद्ध कर दें की किस तरह कोकाकोला पीना समाजवाद को बढ़ाता है। अब पाठकों को आपस में भिड़नें दें। आपके पास अपनी पोस्टों में हर तरह के तर्क होंगे। जहां जैसा चाहें वैसा उद्धरण दिखाते हुए दूसरों को पछाड़ दें।

15. समुदाय को तोड़ो: चिट्ठाकारिता सामुदायिकता की भावना से की जाये तो ज्यादा सफल होती है। आप पहले से बने समुदाय में फूट डालें और उसी से अपने लिये नया समुदाय तैयार करें। नए गुट बनाने के लिए कई ब्लॉगरों के बीच लगाई-बुझाई की बातें करें। हो सके तो व्यक्तिगत मेल करें और बाद मे बदनाम करने के लिए उसका व्यक्तिगत मेल अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर दें।

16. दूसरों की पोस्ट में नुस्ख निकालें: एक साप्ताहिक पोस्ट लिख कर पिछले सप्ताह के १० बेकार चिट्ठे बतायें। दूसरों के लिखे को बकवास बतायें और उनका मजाक उड़ायें।

17. भूल जायें कि पहले क्या कहा था: समय के साथ साथ आपके विचार भी बदलते रहने चाहियें। यकीन मानिये पाठकों की यादाश्त बहुत कम होती है। वो अकसर भूल जाते हैं कि किसी मुद्दे पर आपने पहले क्या विचार प्रगट किये थे। अपनी बात से पलट जायें कौन आपकी पिछली पोस्ट सर्च करेगा सोचिये भला?

18. टिप्पणियां चोरी करें: टिप्पणियां न मिलें तो चुरा कर छापें। कहीं से भी माल उड़ा कर अपने यहां टिप्पणी के रूप में छाप लें। जाने अनजाने नामों से या बेनामों के नाम से खुद टिप्पणियां करें। बेनाम घटिया टिप्पणियां कभी न मिटायें। जितनी हो सके सहानुभूती बटोरें।

19. गाली गलौच की भाषा में लिखें: चिट्ठा हिट करने का सबसे आसान तरीका। इंटेरनेट पर सबकुछ चलता है । नामर्द और हिजड़ा कहना तो आम है। आजकल चू------- गाली भी काफी डिमांड में है। आप अपनी भी कोई मजेदार गाली बना सकते हैं। इससे आप ज़मीन से जुड़े आम आदमी की श्रेणी में दिखाई पड़ते हैं।

20. शीर्षक का कमाल: अपने चिट्ठे का नाम 'म' से शुरू करें। या अपनी पोस्ट का शीर्षक 'म' से शुरू करें। एक और तरीका है कोई चरित्र बनायें 'म' नाम से और उसके बारे में लिखना शुरू करें। जैसे 'क' से शुरू होने वाले सीरियल टीवी पर बहुत हिट होते हैं वैसे ही 'म' से शुरू होने वाले चिट्ठे शर्तिया हिट होते हैं। अपने जीतू भाई चिट्ठा जगत में किस लिये हिट हैं? क्योंकि उनके चिट्ठे का नाम 'मेरा पन्ना' है। 'मुंबई ब्लॉग' को तो ईनाम भी मिला। आईना पर भी जब से 'मुन्नाभाई' के बारे में लिखना शुरू किया, आईना चल निकला।

इतना कुछ करने पर भी यदि आपका चिट्ठा न चले तो समझ लें आपके विचार 'निशब्द' फिल्म की तरह आज से बीस वर्ष बाद के लिये हैं, आपकी सोच को समझने वाले अभी पैदा ही नहीं हुए हैं। चिट्ठा अजर अमर है, आज अगर कोई नहीं पढ़ेगा तो बीस साल बाद आप ही का चिट्ठा सुपर हिट होने वाला है।


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जनसत्ता पर देसी चिट्ठे

हिंदी चिट्ठाकारिता के हर आयाम को छूता सुजाता जी का विस्तृत लेख आजके रविवारी जनसत्ता में छपा है। पूरे पेज को स्कैन करना मुमकिन नहीं था तो अलग अलग हिस्से स्कैन किये हैं।

चित्रों को बड़ा देखने के लिये इन पर क्लिक करें।







 








वारिस शाह नूं - अमृता प्रीतम

आज बैसाखी के अवसर पर अमृता प्रीतम की एक रचना और उसका हिंदी अनुवाद। 1947 पर लिखी गयी यह रचना वारिस शाह को संबोधित है जिन्होंने 'हीर' लिखी थी।


 


वारिस शाह नूं



आज्ज आखां वारिस शाह नूं
कित्थे कबरां विचों बोल ते आज्ज किताबे ईश्क दा
कोई अगला वर्का फोल

इक रोई सी धी पंजाब दी तूं लिख लिख मारे वैण


आज्ज लखां धिया रोंदियां तैनूं वारिस शाह नूं कैण


उठ दर्दमंदा देया दर्दिया उठ तक्क अपना पंजाब



आज्ज वेले लाशा विछियां ते लहू दी भरी चिनाव

किसे ने पंजा पाणियां विच दित्ती जहर रला


ते उणा पाणियां धरत नूं दित्ता पानी ला


इस जरखेज जमीन दे लू लू फुटिया जहर


गिट्ठ गिट्ठ चड़ियां लालियां ते फुट फुट चड़िया कहर


उहो वलिसी वा फिर वण वण वगी जा


उहने हर इक बांस दी वंजली दित्ती नाग बना


नागां किल्ले लोक मूं, बस फिर डांग्ग ही डांग्ग,


पल्लो पल्ली पंजाब दे, नीले पै गये अंग,


गलेयों टुट्टे गीत फिर, त्रखलों टुट्टी तंद,


त्रिंझणों टुट्टियां सहेलियां, चरखरे घूकर बंद


सने सेज दे बेड़ियां, लुड्डन दित्तीयां रोड़,


सने डालियां पींग आज्ज, पिपलां दित्ती तोड़,


जित्थे वजदी सी फूक प्यार दी, ओ वंझली गयी गवाच,


रांझे दे सब वीर आज्ज भुल गये उसदी जाच्च


धरती ते लहू वसिया, कब्रां पइयां चोण,


प्रीत दिया शाहाजादियां अज्ज विच्च मजारां रोन,


आज्ज सब्बे कैदों* बन गये, हुस्न इश्क दे चोर


आज्ज कित्थों लाब्ब के लयाइये वारिस शाह इक होर


 वारिस शाह से



आज वारिस शाह से कहती हूं
अपनी कब्र में से बोलो

और इश्क की किताब का


कोई नया वर्क खोलो


पंजाब की एक बेटी रोई थी


तूने एक लंबी दस्तांन लिखी


आज लाखों बेटियां रो रही हैं,


वारिस शाह तुम से कह रही हैं


ए दर्दमंदों के दोस्त



पंजाब की हालत देखो
चौपाल लाशों से अटा पड़ा हैं,

चिनाव लहू से भरी पड़ी है


किसी ने पांचों दरियाओं में



एक जहर मिला दिया है
और यही पानी

धरती को सींचने लगा है


इस जरखेज धरती से


जहर फूट निकला है


देखो, सुर्खी कहां तक आ पंहुंची


और कहर कहां तक आ पहुंचा



फिर जहरीली हवा वन जंगलों में चलने लगी
उसमें हर बांस की बांसुरी

जैसे एक नाग बना दी


नागों ने लोगों के होंठ डस लिये


और डंक बढ़ते चले गये


और देखते देखते पंजाब के


सारे अंग काले और नीले पड़ गये


हर गले से गीत टूट गया



हर चरखे का धागा छूट गया
सहेलियां एक दूसरे से छूट गयीं

चरखों की महफिल विरान हो गयी


मल्लाहों ने सारी कश्तियां



सेज के साथ ही बहा दीं
पीपलों ने सारी पेंगें

टहनियों के साथ तोड़ दीं


जहां प्यार के नगमे गूंजते थे


वह बांसुरी जाने कहां खो गयी


और रांझे के सब भाई



बांसुरी बजाना भूल गये
धरती पर लहू बरसा

कबरें टपकने लगीं


और प्रीत की शहजादियां


मजारों में रोने लगीं


आज सब कैदों* बन गये


हुस्न इश्क के चोर


मैं कहां से ढूंढ के लाऊं


एक वारिस शाह और..


(*कैदों हीर का चाचा था जो उसे  जहर दे डालता है)


(कविता का पंजाबी संस्करण यहां से सुन कर लिखा गया है इस लिये त्रुटी की संभावना है। हिंदी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ से साभार)


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"बिरह" का सुलतान - शिव कुमार बटालवी




सरकिट का भी चिट्ठा

'हैलो मुन्नाभाई, कैसे हो भाई!"

"अपुन मजे में हैं, कैसे फोन किया सरकिट?"

"भाई, अब तो तुम्हे चिट्ठा लिखते हुए एक साल से ज्यादा हो गया, अपुन का भी चिट्ठा बनवा दो ना।"

"अरे सर्किट तुम क्या करोगे चिट्ठा बना कर, पहलेइच इदर चिट्ठों की क्वालिटी पर कोश्चन लग रेले हैं।"

 "क्यों भाई, चिट्ठा है कि शादी का सूट जो सिर्फ रीड एंड टेलर की क्वालिटी के कपड़े सेइच बनेगा?"

"अरे नहीं सरकिट, कहने का मतलब है कि वो क्या कहते हैं कि भाषा उच्च्च.... होनी चाहिये और सब्जेक्ट सीरियस।"

 "पर भाई एक चिड़िया को तो चहकना सीखने के लिये बड़ी बड़ी किताबें नहीं पढ़नी पड़तीं। क्या कोयल की कूक की भी कोई क्वालिटी होती है?"

"ओफ्फ! तुम से कौन जीत सका है, कहां बनाना है चिट्ठा?"

 "भाई चंपा के बगल में बनवा दो ना।"

 "अरे मैंने पूछा वर्डप्रैस या ब्लागस्पाट?"

"ये सब अपुन को नहीं पता भाई, बस चंपा के बगल में होना चाहिये, अपुन हर रोज उसको आते जाते देखेंगा।"

 "सरकिट तूं तो अईसे कह रहा जैसे चिट्ठा नहीं, मुम्बई में खोली बनवा रहा है। ये वर्चुअल दुनिया है, यहां कोइ अगल बगल नहीं होता। न कोई प्लाट, न कीमत, न भाड़ा।"

 "क्या कहा भाई? यहां किसका वर चुहल करता है? "

"सरकिट ! तेरे कु समझाना भोत मुश्किल काम है। वर्चुअल बोले तो आभासी।"

 "भाई मेरे कु कुछ समज नहीं आ रहा जरा ठीक से समझाओ ना।"

 "देखो सरकिट, जईसे अपुन को बापू दिखता था ना मगर बापू होता नहीं था, वैसेईच चिट्ठे दिखते हैं मगर चिट्ठे होते नहीं हैं, हमको बस इनके होने का आभास होता है। एक पल स्क्रीन पर दिखे, दूसरे पल गायब।"

 "बड़ी अजीब बात है भाई, अगर ये सब आभासी दुनिया है, न कोई प्लाट, न कीमत, न भाड़ा। फिर यहां इतनी लड़ाईयां क्यों होती हैं?"
 

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क्षेत्रिय चिट्ठाकारिता पर इंडियन एक्सप्रैस में

क्षेत्रिय चिट्ठाकारिता पर आज के इंडियन एक्सप्रैस के दिल्ली संस्करण  में एक लेख छपा है।  

पढ़ने के लिये इमेज पर क्लिक करें।

इंडियन एक्सप्रैस में छपा क्षेत्रिय चिट्ठाकारिता पर एक लेख


365 दिन, 110 पोस्ट, 876 टिप्पणियां........!

365 दिन, 110 पोस्ट, 876 टिप्पणियां, लगभग 20,000 हिट्स (16000 वर्डप्रैस पर और 4000 ब्लॉगस्पॉट पर), ढेर सारे दोस्त और बहुत सा प्यार!!

धन्यवाद। 

चिट्ठाकारिता के अपने अनुभवों और भावनाओं पर मैं जीतू जी को दिये अपने पांच जवाबों में पहले ही बहुत कुछ लिख चुका हूं। आज बस यही कहना चाहूंगा कि यहां के अनोखे अनुभवों को पूरी तरह शब्दों में लिख पाना बहुत ही कठिन है। यहां जो भी प्यार और भाईचारा है वह उन लोगों की वजह से है जो कि सरोज जी के शब्दों में "अभावों के दिनों से" हिंदी चिट्ठाकारी से जुड़े हैं। एक साल में मैंने देखा कि अलग अलग तरह के बहुत से नये लोग आये और यहां के रंगों में रंग गये। यहां गजब की आपसी समझ, एक दूसरे को सहयोग देने की भावना और परिपक्वता देखने को मिलती है। इस सामूहिक भावना को नये लोगों को समझने में कभी कभी कुछ समय लगता है। एक बात हिंदी चिट्ठाकरी में मैंने देखी कि  केवल हिट्स लेने के लिये कभी किसी ने तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर सनसनी फैलाने के लिये नहीं लिखा। जहां भी चिट्ठाकार अपनी बात पर पूरी तरह आश्वस्त नहीं था उसे सहर्ष स्वीकार किया। जैसा की अनूप जी ने भी कहा कि चोरी की जो एक दो वारादातें हुईं वो भी बाहर वालों ने ही कीं। यहां यदि समीर भाई इंडीब्लॉगीस का पुरस्कार जीतते हैं तो कोई दूसरा अपने को हारा हुआ महसूस नहीं करता। सभी को इस में अपनी और हिंदी चिट्ठाकारिता की जीत का अहसास होता है। किसी चिट्ठे पर मैंने पढ़ा था कि यहां सब 'मैं' की जगह 'हम' शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं। पिछले एक वर्ष में मुझमें भी सामुहिकता के 'हम' की भावना कब आ गयी और 'मैं' कब गौण हुआ, पता ही नहीं चला। शायद सामुहिकता की यही भावना हमें वो बल देती है कि हमें आने वाले ज़लज़लों से कभी भी डर नहीं लगता।


मुलायम मेरा तकिया है

राजनीति में उम्र का कुछ हिसाब हमें समझ नहीं आता। अपने राहुल गांधी 30+ हो गये मगर उनके विरोधी उन्हें बच्चा कहते रहते हैं। राजनीति में अकसर मैंने देखा है कि चालिस के न हुए तो आप बच्चे हैं, पचास पार नेता को युवा नेता कहा जाता है और शीर्ष तक पहुंचते पंहुचते नेता सत्तर पार हो जाता है। राजीव गांधी जब प्रधान मंत्री हुए तो युवा प्रधानमंत्री कहा जाता था, उस समय मुझे अकसर यह प्रश्न सताता रहता था कि सुनील गावस्कर 36 की उम्र में बूढ़े खिलाड़ी कहे जाते हैं और पैंतालिस के राजीव युवा? राजनीति में सब गड़बड़ है। जो कहा जाता है वो होता नहीं और जो होता है वह कहा नहीं जाता। उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में चुनाव हो रहे हैं पर हिंदी चिट्ठों पर उन पर कोई खास चर्चा नहीं हो रही। इससे यही साबित होता है कि अब हम लोगों को न तो राजनीति से कोई रुचि है और न ही कोई उम्मीद। यह एक भयावह स्थिति है। शायद नेताओं को हमारी बात समझ नहीं आती और हमें नेताओं की।

दिल्ली में भी पालिका चुनाव हो रहे हैं, छोटे चुनाव क्षेत्र होने की वजह से चुनावों का प्रचार ज्यादा दिखाई दे रहा है। जैसा कि मैंने कहा कि राजनीति में कहा कुछ जाता है और समझ कुछ आता है। जब बड़े बड़े समझ नहीं पाते तो बच्चे क्या समझेंगे? महिलाओ और बच्चों के एक जलूस में जब नारे लग रहे थे - 'मोहर लगेगी हाथ पे' तो मेरा सात वर्षिय बेटा समझा कि कह रहे हैं 'मुंबई हॉफ प्लेट।'  एक बात और उसे समझ नहीं आती कि 'मुलायम मेरी पाठशाला है' में मुलायम किसी का नाम भी हो सकता है, वह इसका शाब्दिक अर्थ ही समझता है और अकसर बोल पड़ता है 'मुलायम मेरा तकिया है।'


मूर्ख दिवस पर कुछ मजेदार

मूर्ख दिवस पर नुक्ताचीनी पर गूगल का मजाक देख मुझे हैरानी हुई कि इतनी बड़ी कंपनी भी ऐसे मजाक कर सकती है, मगर शायद यह एक बानगी ही थी। अभी और बहुत कुछ बाकी था।

 


शाम को जीमेल पर गये तो पता चला कि जीमेल अब आपके मेल कागज पर प्रिंट करके आपके घर पर डिलीवर करने की सुविधा भी दे रहा है और वो भी मुफ्त।

यह सब काफी नहीं था कि आज सुबह वर्डप्रैस पर एक और मजेदार मजाक हमारा इंतजार कर रहा था। वर्डप्रैस आईना को सभी भाषाओं के अपने चिट्ठों में टॉप पर दिखा रहा था। अब बताईये किसी चिट्ठाकार के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिये इससे अच्छा उपहार क्या हो सकता है?