हिंदी चिट्ठों पर शानदार लेख
दिल्ली में आज के नवभारत टाईम्स में सरोज सिंह जी का हिंदी चिट्ठों और नारद पर शानदार लेख छपा है। लेख आप सरोज जी के चिट्ठे पर यहां भी पढ़ सकते हैं।
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दिल्ली में आज के नवभारत टाईम्स में सरोज सिंह जी का हिंदी चिट्ठों और नारद पर शानदार लेख छपा है। लेख आप सरोज जी के चिट्ठे पर यहां भी पढ़ सकते हैं।
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झा साहब से परिचय करवाने से पहले अपको पिछले सप्ताह की एक बात बताता हूं। मैं नोएडा में था। अपने एक सरदारजी दोस्त से काम के सिलसिले में मिलने गया था। बातों बातों में सरदारजी ने शेयर बाजार के बारे में एक सवाल पूछा। उन्होंने पूछा कि यह कैसे पता लगाया जाये कि शेयर बाजार कब अपनी पूरी ऊंचाई पर है और वो कौन सा समय हो जब शेयर बाजार से सब कुछ बेच कर बाहर आ जाना चाहिये। मैंने कहा कि इस बाजार में कभी बदहवास को कर माल न ही बेंचे तो अच्छा। अगर आपने अच्छी कंपनी का शेयर लिया है तो बाजार की चाल कैसी भी हो, आप घबरायें नहीं। सरदारजी मेरे जवाब से संतुष्ट नहीं हुए। उन्हें सीधा जवाब चाहिये था। "आप लक्षण बताईये जिन्हें पहचान कर इशारा मिल जाये कि अब बाजार गिरने वाला है" उन्होंने पूछा।
अब बताइये, इस सवाल का जवाब कौन दे सकता है? फिर भी मैंने एक पुरानी मान्यता की बात उन्हें बताई। " जब हर कोई शेयरों की बात करने लगे तो समझो कि अब आपका समय यहां से निकलने का हो गया।"
" हर कोई शेयरों की ही तो बात करता है।" वो भोलेपन से बोले। यह बात भी सही है कि समाज के जिस वर्ग में सरदार जी रहते हैं वहां ज्यादातर लोग शेयरों में निवेश करते हैं।
"मगर जब आपका ड्राईवर भी शेयरों की बात करने लगे तो समझें समय आ गया है" मैंने मुस्कुराते हुए कहा।
अब झा साहब की बात। बहुत मजेदार चरित्र है उनका। झा साहब खुद में मस्त रहते हैं। जब बोलना शुरू करते हैं तो रोकना मुश्किल हो जाता है। एक बार जो निर्णय ले लें तो किसी की नहीं सुनते बस कर गुजरते है। झा साहब कितना पढ़े लिखे हैं यह तो मैंने कभी पूछा नहीं मगर अंग्रेजी में "यू गो"," आई कम" से आगे पैदल हैं। आगे भी आपको उनके किस्से सुनाता रहुंगा। हम एक ही कालोनी में रहते हैं। झा साहब कुछ खास नहीं करते। दो बच्चे होने के बाद भी अपने परिवार का जिम्मा वो अपने पिता पर ही डाले हैं। कल अचानक आ धमके। बोले लैपटॉप लिया है। इंटेरनेट नहीं चल रहा, जरा सहायता कर दें।
"अरे वाह! क्या कन्फिग्रेशन है?" मैंने उत्सुकता दिखाते हुए पूछा।
झा साहब समझ नहीं पाये।
"इसमें क्या क्या लगा है" मैंने फिर पूछा।
अब झा साहब का चेहरा बता रहा था कि मैंने क्या अनाड़ियों वाला सवाल पूछ लिया है।
"ये स्पीकर लगे हैं, यहां सीडी लगती है, ये फोन की लाईन है और यहां, यह लगता है।" झा साहब ने मुझे यूएसबी पोर्ट और पेन ड्राईव दिखाते हुए कहा।
आगे की बातों से पता चला कि झा साहब पचास हजार का लैपटॉप खरीद लाये हैं बिना यह जाने कि दो लैपटॉप के मॉडल्स में क्या क्या फर्क हो सकता है। हार्ड डिस्क, रैम और प्रोसेसर जैसे् शब्द उन्हों ने पहली बार मुझसे ही सुने। झा साहब ने लैपटॉप पर गाना बजाना सीख लिया था और इस बात से बार बार उत्तेजित हो जाते कि कैसे लैपटॉप पर अंगुली घुमाने से गाने की आवाज कम और ज्यादा हो जाती है।
मैं यह जानने के लिये बहुत बेताब था कि झा साहब ने किस उद्देश्य के लिये लैपटॉप खरीदा था। कुछ देर में इसका भी खुलासा हो गया।
"इंटेरनेट पर शेयर ट्रेडिंग करूंगा।" उन्होंने बताया।
"आपको बाजार की जानकारी है?"
"इसमें जानकारी क्या? सुबह खरीदा, शाम को बेचा। सौ रुपये भी बढ़ गये तो अपनी जेब में।" झा साहब ने बहुत ही लापरवाही से बताया।
"मगर झा साहब शेयरों में वही पैसा लगाइये जो डूब भी जाये तो गम न हो" मैंने चिंतित होते हुए कहा।
"ज्यादा नहीं, एक लाख से ही शुरू करुंगा, आप चिंता न करें, पिता जी पिछले महीने ही रिटायर्ड हुए हैं, पैसों की कमी नहीं।" जाते जाते झा साहब ने कहा।
झा साहब के जाने के बाद थोड़ी देर तक मैं खुद ही हंसता रहा। मगर अचानक मुझे पिछले सप्ताह सरदारजी से हुई बातें याद आ गयीं। मेरा दिल धक से रह गया।
क्या वाकई यह बात कोई संकेत देती है?
इंटेरनेट पर हिंदी के पेज हिंदी चिट्ठों की वजह से ज्यादा हैं। वैसे इसके अलावा कुछ पत्रिकायें हैं जो कि हिंदी में निकलतीं हैं। याहू और MSN अब हाल ही में आये हिंदी में। तो जो कुछ भी हिंदी में इंटरनेट पर अपलब्ध है उसका बड़ा हिस्सा हिंदी चिट्ठाकारों द्वारा लिखा गया है। चाहे तो हिंदी में कुछ भी सर्च कर के देख लें आपको प्रमाण मिल जायेगा।
अब हिंदी का इंटेरनेट पर जो भी व्यावसायिक उपयोग करना चाहेगा उसे हिंदी में लिखी सामग्री चाहिये होगी जो कि पहले से इन चिट्ठों पर उपलब्ध है।
हाल ही में हिंदी मे दो नये सर्च इंजनों का पता चला है। गुरू जी और रफ्तार। गुरु जी शुरू से ही चल निकला है, हालांकि मुझे और कुछ अन्य साथियों को यहां युनिकोड की वजह से कुछ समस्या है। गुरूजी को चल निकला है इसलिये कह रहां हूं क्योंकि इससे सर्च करके बहुत लोग आईना पर भी आ रहे हैं।
रफ्तार के बारे में आज पता चला चला जब आईना पर इनकी तरफ से एक टिप्पणी आयी। सजावट अच्छी है। पहले पेज पर हिंदी चिट्ठों के लिये लिंक हैं। मगर जब लिंक पर क्लिक किया तो भयावह परिणाम सामने आये।
'मजेदार ब्लॉग' पर क्लिक किया तो जो पेज खुला उस पर प्रश्न था - "क्या आपकी खोज यह है - जमादार लॉग" :D
एक मुलाकात
मैं चुप शान्त और अडोल खड़ी थी
सिर्फ पास बहते समुन्द्र में तूफान था......फिर समुन्द्र को खुदा जाने
क्या ख्याल आया
उसने तूफान की एक पोटली सी बांधी
मेरे हाथों में थमाई
और हंस कर कुछ दूर हो गया
हैरान थी....
पर उसका चमत्कार ले लिया
पता था कि इस प्रकार की घटना
कभी सदियों में होती है.....
लाखों ख्याल आये
माथे में झिलमिलाये
पर खड़ी रह गयी कि उसको उठा कर
अब अपने शहर में कैसे जाऊंगी?
मेरे शहर की हर गली संकरी
मेरे शहर की हर छत नीची
मेरे शहर की हर दीवार चुगली
सोचा कि अगर तू कहीं मिले
तो समुन्द्र की तरह
इसे छाती पर रख कर
हम दो किनारों की तरह हंस सकते थे
और नीची छतों
और संकरी गलियों
के शहर में बस सकते थे....
पर सारी दोपहर तुझे ढूंढते बीती
और अपनी आग का मैंने
आप ही घूंट पिया
मैं अकेला किनारा
किनारे को गिरा दिया
और जब दिन ढलने को था
समुन्द्र का तूफान
समुन्द्र को लौटा दिया....
अब रात घिरने लगी तो तूं मिला है
तूं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल
मैं भी उदास, चुप, शान्त और अडोल
सिर्फ- दूर बहते समुन्द्र में तूफान है.....
याद
आज सूरज ने कुछ घबरा कर
रोशनी की एक खिड़की खोली
बादल की एक खिड़की बंद की
और अंधेरे की सीढियां उतर गया....
आसमान की भवों पर
जाने क्यों पसीना आ गया
सितारों के बटन खोल कर
उसने चांद का कुर्ता उतार दिया....
मैं दिल के एक कोने में बैठी हूं
तुम्हारी याद इस तरह आयी
जैसे गीली लकड़ी में से
गहरा और काला धूंआ उठता है....
साथ हजारों ख्याल आये
जैसे कोई सूखी लकड़ी
सुर्ख आग की आहें भरे,
दोनों लकड़ियां अभी बुझाई हैं
वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए
कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये
वक्त का हाथ जब समेटने लगा
पोरों पर छाले पड़ गये....
तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी
और जिन्दगी की हन्डिया टूट गयी
इतिहास का मेहमान
मेरे चौके से भूखा उठ गया....
हादसा
बरसों की आरी हंस रही थी
घटनाओं के दांत नुकीले थे
अकस्मात एक पाया टूट गया
आसमान की चौकी पर से
शीशे का सूरज फिसल गया
आंखों में ककड़ छितरा गये
और नजर जख्मी हो गयी
कुछ दिखायी नहीं देता
दुनिया शायद अब भी बसती है
आत्ममिलन
मेरी सेज हाजिर है
पर जूते और कमीज की तरह
तू अपना बदन भी उतार दे
उधर मूढ़े पर रख दे
कोई खास बात नहीं
बस अपने अपने देश का रिवाज है......
शहर
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है
सड़कें - बेतुकी दलीलों सी...
और गलियां इस तरह
जैसे एक बात को कोई इधर घसीटता
कोई उधर
हर मकान एक मुट्ठी सा भिंचा हुआ
दीवारें-किचकिचाती सी
और नालियां, ज्यों मूंह से झाग बहती है
यह बहस जाने सूरज से शुरू हुई थी
जो उसे देख कर यह और गरमाती
और हर द्वार के मूंह से
फिर साईकिलों और स्कूटरों के पहिये
गालियों की तरह निकलते
और घंटियां हार्न एक दूसरे पर झपटते
जो भी बच्चा इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर यह बहस हो रही?
फिर उसका प्रश्न ही एक बहस बनता
बहस से निकलता, बहस में मिलता...
शंख घंटों के सांस सूखते
रात आती, फिर टपकती और चली जाती
पर नींद में भी बहस खतम न होती
मेरा शहर एक लम्बी बहस की तरह है....
भारतीय़ ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित अमृता प्रीतम चुनी हुई कवितायें से साभार
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न्यूयार्क टाइम्स की साइट पर ‘हिंदी टूलबार’ और ‘आईना’
07Jun07
लगभग जा चुकीं सर्दियों की दोपहर में क्नाट प्लेस के फिर से नये बने सेंट्रल पार्क पर जब आज दिल्ली के हिंदी चिट्ठाकार मिले तो शायद दिल्ली में यह अब तक की सबसे बड़ी और सबसे लंबी चली हिंदी चिट्ठाकार मीट थी।
क़ैफे क़ॉफी डे में हमारी मीटिंग तय थी मगर शुरू में थोड़ा कन्फ्यूजन हुआ क्योंकि एक ही क्षेत्र में तीन क़ैफे क़ॉफी डे एक साथ थोड़ी थोड़ी दूरी पर बने हैं। इस कन्फ्यूजन में मैथिली जी एक जगह इंतजार कर कर के चले गये। हम सब को इस बात का बहुत अफसोस हुआ।
पहुंचने वाले चिट्ठाकारों में मेरे अलावा थे
नीलिमा
नोटपैड
अमिताभ
सृजनशिल्पी
मसिजीवी
अमित
अविनाश
भूपेन
मसिजीवी बहुत ही जीवंत और मिलनसार व्यक्तित्व के धनी हैं। मुझे अफसोस है कि मैंने उनके चिट्ठे को बहुत अधिक नहीं पढ़ा। अविनाश बोले कम, सुना ज्यादा। भूपेन जितना तीखा लिखते हैं, उतना ही धीरे और मीठा बोलते हैं। सभी नये चिट्ठाकारों को देख लगा कि हिंदी चिट्ठाकारिता का भविष्य बहुत अच्छा है।
एक डेढ़ घंटा क़ैफे क़ॉफी डे में बैठने के बाद हम लोग खुले सेंट्रल पार्क में आ गये। हालांकि ज्यादातर लोग पहली ही बार मिले थे पर खुले हुए मौसम की तरह बहुत ही खुल कर बाते हुईं। बहुत से सवाल पूछे गये और बहुत सी बातों पर चर्चा हुई। हमारी कोशिश रही कि नये चिट्ठाकारों को और अच्छी तरह जानें और साथ ही उन्हें भी अपने हिंदी चिट्ठाजगत के बारे में बतायें। किस प्रकार सामुहिक और निस्वार्थ कोशिशें हुईं अभी तक हिंदी चिट्ठाजगत को एक परिवार की तरह चलाने में । चिट्ठाजगत के भविष्य को ले कर सभी लोग काफी उत्साहित लगे।
करीब चार बजे काफी लोग विदा हुए मगर मैं, सृजनशिल्पी जी, अमिताभ और अमित टिके रहे साढ़े छः बजे तक।
थोड़ी कन्फ्यूजन के साथ शुरू हुई मीटिंग आकाश में रुई से तैरते बादलों और हरी घास की कोमलता के अहसासों के साथ समाप्त हुई। उम्मीद है कि कोमलता का यह अहसास हमेशा याद रहेगा।
चिट्ठाकार मिलन के फोटो यहां नोटपैड पर देख सकते हैं
देश के ट्रैवेल पोर्टल अब हिंदी में भी उपलब्ध होंगे और यही नहीं, ये लोग हिंदी में अपने विज्ञापन वेबदुनिया और एड्संस वगैरह पर देंगे। इस आशय का मूल समाचार मैंने ईटी में एक दो दिन पहले पढ़ा था। उस समाचार में बहुत मजेदार तरीके से लिखा था कि कल्पना करें हिंदी में नेट पर वैश्नो देवी की यात्रा का विज्ञापन जिस पर लिखा होगा "चलो बुलावा आया है" या एयर इंडिया कह रही है "सस्ती हवाई टिकट" ।
इस समाचार का हिंदी अनुवाद आज के नवभारत टाईम्स में छपा है
इस समाचार की अपनी भाषा कैसी है इसे पढ़ कर आप झुंझलाये बगैर नहीं रह सकेंगे।
कल यानी 11 मार्च को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में रहने वाले हिन्दी चिट्ठाकारों की एक बैठक आयोजित की जा रही है। इसके बारे में विस्तार से यहां देख सकते हैं:
यहां बहुत से नये और पुराने हिंदी के चिट्ठाकार आयेंगे। हम चाहते हैं कि इस क्षेत्र का कोई भी चिट्ठाकार इसमें शामिल होने से छूटे नहीं।
इस क्षेत्र के बहुत से नये चिट्ठाकारों से हम संपर्क नहीं कर पा रहे हैं, इसीलिये परिचर्चा और चिट्ठाकार पर इसकी सूचना दी गयी है। इस पोस्ट से यह सूचना नारद पर भी आ जायेगी।
बैठक के समय और स्थान की सूचना निम्नानुसार है:
तारीख : 11 मार्च, 2007 रविवार
समय : 12 बजे मध्याह्न
स्थान : क़ैफे क़ॉफी डे, (वेंगर के निकट), इनर सर्कल, कनाट प्लेस, नई दिल्ली

महाशक्ति के प्रमेंद्र प्रताप सिंह ने यह सवाल मुझसे दो तीन बार पूछा था। हर बार यही सोचता कि अगले किसी लेख में इस बारे में लिखूंगा। आज फिर जब उन्हों ने यही प्रश्न उठाया तो ज्यादा इंतजार न करवाकर टाईम निकाल उनका जवाब दे रहा हूं। उनका प्रश्न था कि शेयर बाजार और बैल मे क्या सम्बन्ध? क्यों शेयर बाजार के समाचारों के साथ बैल को भी चित्रित किया जाता है।
शेयर बाजार की अपनी एक भाषा होती है। जो लोग यह सोचते हैं कि बाजार तेजी के रुख में रहेगा तो लाभ की आशा में वे और शेयर खरीदना चाहते हैं इसीलिये उन्हें तेजड़िये कहते हैं। जो सोचते हैं कि बाजार में कीमतें गिरेंगी वे शेयरों को बेचना चाहते हैं तो उन्हें कहते हैं मंदड़िये। इन्ही तेजड़ियों को बाजार में बुल्स यानी बैल कहा जाता है तथा मंदड़ियों को बियर्स यानी भालू। इसी लिये जब भी बाजार में तेजी आती है तो अगले दिन सेंसेक्स के ग्राफ के साथ बैल को चित्रित किया जाता है और जब बाजार तेजी से गिरते हैं तो भालू का चित्र दिखाया जाता है।
मान्यता है कि यह नाम इस जानवरों के हमला करने के तरीके से पड़ा। जब भी बैल हमला करता है तो अपने शिकार को नीचे से उठा कर उछाल देता है जबकि भालू अपने शिकार को हमेशा पंजों से नीचे की ओर दबाता है।
मार्च का महीना हमारे लिये बहुत ही व्यस्ततम महीना होता है।
मैंने फैसला किया था कि मार्च में कोई पोस्ट नहीं लिखूंगा, मगर आज लिखनी पड़ रही है। व्यस्तता के कारण ही कल केवल एक जरूरी मेल देखने के लिये सुबह कम्प्यूटर चलाया था और बंद करने लगा तो नारद के फीड पर संजय भाई की पोस्ट के शीर्षक पर नजर गयी। मुझे लगा कि इसका तीव्र विरोध होना चहिये तो जल्दी में एक लाईन की पोस्ट करके चला गया। यकीन मानिये मेरा उद्देश्य कोई सनसनी फैलाना या ड्रामा खड़ा करना नहीं था। थोड़े में तीव्र विरोध जताने का मुझे यही तरीका सूझा।
उस दिन उस महिला को देखता था टीवी पर जब वह रो रो कर निवेदन कर रही थी कि इस फिल्म को अपने राज्य में प्रदर्शित हो जाने दीजिये, शायद मेरा बच्चा मुझे मिल जाये।
मुझे लगा कि एक मां की तस्सली के लिये ही सही, यह फिल्म देश के हर हिस्से में दिखायी जानी चाहिये मगर मैं अपने आप को इस विषय पर बेबस महसूस कर रहा था।
कल सुबह मुझे वही बेबस मां और अपनी बेबसी याद हो आई। मगर मुझे लगा कि नारद के मुद्दे पर मैं इतना बेबस नहीं हूं, यहां शायद मेरी बात भी सुनी जा सकेगी, तो जोरदार तरीके से अपनी बात रखनी चाही।
मेरी यह पोस्ट पाबंदी के विचार के खिलाफ थी। निजी तौर पर संजय भाई के खिलाफ नहीं।
जब मोहल्ला को हटायें तो आईना को भी हटा दें नारद से।
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इस टूलबार का लिंक मैंने अपने साईडबार पर लगाया हुआ था। पिछले कुछ समय से इसे काफी पसंद किया जा रहा है। फरवरी में 33 बार इसे डाउनलोड किया गया। अब इसमें हिंदी रेडियो भी जोड़ दिया गया है। नीचे दिये लिंक से आप भी इसे आजमा कर देखें। यदि पसंद नहीं आये तो इसे अनईंस्टाल करना आसान है। कंट्रोल पैनल से एड रिमूव प्रोग्राम में जायें और इसे रिमूव कर दें। इसमें सुधार के लिये आपके सुझाव आमंत्रित हैं|
और अब इस टूलबार में 30 से अधिक रेडियो चैनल, हिंदी के सभी जरूरी लिंक, लगभग सभी हिंदी पत्रिकाओं के लिंक, नारद की आर एस एस फीड, गूगल हिंदी समाचारों की आर एस एस फीड, हिंदी बलागर चैट रूम जोड़ दिये गये हैं।
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