बजट अपडेट लाईव Budget live update

बजट पेश करने का आज से खराब दिन पी चिदंबरम जी के लिये कोई नहीं हो सकता था। दुनिया भर के शेयर बाजार आज सुबह से धड़ा धड़ गिर रहे हैं। लग रहा है कि आज हमारे शेयर बाजारों पर भी खून बहेगा। :(
एक दिन पहले कांग्रेस उत्तराखंड और पंजाब में हार गयी। मंहगाई से लोग त्रस्त हैं। वैसे जब सारे टी वी चैनल और समाचार पत्र कांग्रेस की हार के लिये मंहगाई को जिम्मेदार बता रहे हैं, शहरों में कांग्रेस की हार के पीछे आरक्षण और अर्जुन सिंह कितने जिम्मेदार हैं, यह भी सोचने की बात होगी।

आपको हिंदी में बजट के मुख्य बिंदू लगातार यहां बताये जायेंगे। उम्मीद है कि वित्तमंत्री जी महंगाई को काबू करने के उपाय करेंगे और कृषि क्षेत्र को बढ़ावा दिये जाने की कोशिश की जायेगी। यदि आपको इस विषय में रुचि है तो इस पेज को रिफ्रेश करते रहें।
सेंसेक्स ४३३ प्वाईट नीचे खुला
निफ्टी १५७ प्वाईंट नीचे खुला
गैहूं और चावल की फ्यूचर ट्रेडिंग पर प्रतिबंध लगा।
(मगर अफसोस दो राज्यों को खोने के बाद। लगता है दो राज्य खोने के बाद सरकार बदहवासी में कदम उठा रही है)
बजट प्रावधान
शिक्षा बजट में ३५ % वृद्धी
स्वास्थ्य के बजट में २२% वृद्धी
आयुर्वेद पर खास ध्यान (आयुर्वेद FMCG के लिये अच्छा)
कृषि को खास ध्यान
अच्छे बीजों के लिये निजी कंपनियों से सहयोग लिया जायेगा
खाद सब्सिडी सीधे किसानों को दिये जाने का तरीका खोजा जायेगा। सिंचाई पर खास ध्यान।
गरीब ग्रामीन भूमीहीनों के लिये आम आदमी जीवन बीमा योजना, आधा प्रीमियम केंद्र सरकार देगी, बाकी आधा राज्य सरकारें।
अनओर्गनाईज सेक्टर के लिये सामाजिक सुरक्षा योजना
शेयर बाजार में ट्रेडिंग के लिये सभी को PAN जरूरी
रक्षा पर 96000 करोड़ की वृद्धी
म्यूचल फंड के जरिये आम आदमी विदेशों में निवेश कर सकेंगे ( कीमतों को कम करने में सहायक)
मुंबई को विश्व स्तर की फाईनेंशल सिटी बनाया जायेगा
विकलांगों को एक लाख सरकारी नौकरियां
दिल्ली कामेनवेल्थ गेम के लिये ५०० करोड़
बाजार कुछ संभले
सेंसेक्स अब २५० प्वाईंट नीचे (१२.१० बजे)
टैक्स क्लेक्शन २७ % बढ़ा
कस्टम (गैर कृषी चीजों के लिये)ड्यूटी पीक रेट १२.५ से घटा कर १० % ( कीमतों को कम करने में सहायक)
सर्विस टैक्स रेट में बदलाव नहीं
कुत्ते बिल्लियों के खाने का सामान सस्ता (इन्सानो का भी ध्यान करें मंत्री जी) :(
पोलियेस्टर, खाने का तेल, सिंचाई उपकरण और पाईप्स सस्ते
सर्विस टैक्स में और सेवाएं शामिल

निजी आयकर में कुछ राहत
आयकर में छूट १०००० रु से बढ़ी (आम कर देने वालों को एक हजार रु की बचत)
जम्मू कश्मीर में उद्योगों को और पांच वर्ष तक करों में छूट
कार्पोरेट टैक्स रेट में बदलाव नहीं
एजुकेशन सेस २% से बढ़ कर ३% हुआ
डिविडेंड डिस्ट्रिब्यूशन टैक्स बढ़ कर १५%
IT कंपनियों पर MAT लगा
IT कंपनियों में ESOP पर FBT लगा
एक करोड तक के लाभ कमाने वाले कार्पोरेट्स पर सरचार्ज नहीं
(बजट फुस्स लग रहा है
बाजार फिर फिसले)
ना आम आदमी को कुछ मिला न ही खास आदमी को
बाजार लुड़के
आधा घंटा तक कृषि पर बोले पर कोई बड़ी घोषणा नहीं की। कृषि का योगदान जीडीपी में घट रहा है मगर इसे बढ़ाने के लिये कुछ नहीं क्या है।
कंपनियों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा। कुछ रिफार्म्स नहीं किये। ज्यादा ले लिया पर दिया कुछ भी नहीं।

मेरी राय

यह एक दिशा हीन बजट है। उम्मीद थी कि कीमतें कम करने तथा कृषि के विकास के लिये कुछ क्रांतिकारी कदम उठाये जायेंगे मगर इस दिशा में साधारण कदम भी नहीं उठाये गये। एक मौका गंवा दिया। वित्त मंत्री दबाव में लग रहे हैं। दस साल पहले वाले चिदंबरम का जलवा नहीं दिखा सके।
मुझे कभी कभी लगता है कि मैडम जी, प्र मं जी, वि मं जी तथा वाम पक्ष में जबर्दस्त संवाद हीनता है। ना कोई विजन है और न ही कोई दिशा। :(


सावधान! यह आपके साथ भी हो सकता है

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एल आई सी के कुछ एजेंट आजकल कुछ इस तरह के पर्चे बांट कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं जिसमें कहा गया है कि 30000 रु जमा करवा कर 16 लाख रु लें। आप सब से अनुरोध है कि इस तरह के किसी बहकावे में न आयें। यह पूरी तरह झूठ और फरेब पर आधारित है।

एल आई सी के उच्च अधिकारियों ने इसके लिये एक सर्कुलर भी निकाला है जिसका एक हिस्सा यहां दिया जा रहा है। इसमें लिखा है कि इस पर्चे की वजह से कार्पोरेशन को शर्मिंदा होना पड़ रहा है तथा यह लोगों के कार्पोरेशन पर 50 साल के विश्वास के साथ धोखा है। पूरे सर्कुलर की कापी मेरे पास है। आप भी अपने चारों ओर इस बारे में जागरुकता फैलायें जिस से लोग इस धोखे से बच सकें।

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जल्द ही एक लेख लिख कर आपको बताऊंगा कि निवेश संबंधी फैसले लेते समय किस तरह के एजेंटों से व्यवहार करना ठीक रहेगा जिससे आपको कभी इस तरह का धोखा न हो।

(नोट : कल वित्त बजट पेश किया जायेगा। संभव है कि निजी करों के ढांचे तथा दरों में कुछ परिवर्तन किया जाये। यदि इससे संबधित कोई जानकारी चाहते हों या बजट के किसी भी पहलू पर कोई जिज्ञासा हो तो आप मुझे mailjpb at gmail dot com पर मेल कर सकते हैं। मैं कोशिश करुंगा कि आपको जवाब दे सकूं। बजट के दौरान तथा बाद में जीमेल चैट पर भी रहने की कोशिश करुंगा।)


मेरी पाँच बातें : तर्जुमा आईने का ठीक नहीं


रचना जी ने जब पांच सवाल पूछे तो मैंने चुटकी ली थी कि "आपको मौका मिला था तो कुछ निजी पोल पट्टी खुलवाते इन सब की। आपने तो बड़े औपचारिक से प्रश्न पूछे।" इस पर समीर भाई ने लिखा कि "जितने लोग सोच रहे हैं कि हमें सस्ते में छोड़ दिया गया है, उनके नाम नोट हो गये हैं. अब कम से कम वो तो सस्ते में नहीं ही छूटेंगे, यह तय रहा."
मुझे आशंका थी कि जल्द ही समीर भाई निशाना साधेंगे मगर जब तक समीर भाई रचना जी के सवालों का जवाब देते और हमें फंसाते, जीतू भाई ने हम पर सवालों के तीर दाग दिये। वो सवाल जो जब दूसरों से पूछे जा रहे थे तो बहुत आसान लग रहे थे, जब हम से पूछे गये तो कुछ कुछ मुशकिल लगने लगे। फिर भी कोशिश करते हैं कि जवाब सच्चाई और इमानदारी से दिये जायें।

(जब यह लिख रहा था तो श्रीश ने भी मुझे टैग किया है। मगर जो कुछ भी लिखा है उसमें उनके सवालों के जवाब भी मिल जाते हैं इसीलिये अलग से नहीं लिख रहा। मैं जिनको टैग करना चाहता था वे पहले से ही टैग हो चुके हैं तो मैं अपने पांच नाम भी नहीं दे रहा।)

क्या चिट्ठाकारी ने आपके जीवन/व्यक्तित्व को प्रभावित किया है?

बहुत ही अनोखी दुनिया है हिंदी चिट्ठाकारिता की। दुनिया के अलग अलग कोने पर बैठे लोग एक दूसरे से इतना प्यार और सहयोग रखे हैं| बिना किसी स्वार्थ के. बिना किसी लालसा के संबध बन रहे हैं| एक दूसरे का विरोध करते हैं, सहमत होते हैं, फिर विरोध करते रहने के लिये सहमत हो जाते हैं| एक दिन जिस पर गुस्सा दिखाते हैं, दूसरे दिन उसी के ब्लाग पर जाकर प्यार भरी टिप्पणी कर आते हैं :) ऐसी दुनिया में आप प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकते हैं? फिर यहां आकर न सिर्फ अपने विचारों को प्रस्तुत करने का मंच मिला, दूसरों को पढ़ पढ़ कर अपने ज्ञान और सोच का दायरा भी बढ़ा। कई चीजों पर मेरी सोच बदली। कई बार तो पूरे 180 डिग्री। शुरू में जीतू भाई आपके चिट्ठे पर जब आपके बारे में पढ़ रहा था तो आपकी एक बात ने बहुत प्रभावित किया, वो थी कि "जिन्दगी हर रोज कुछ ना कुछ नया सिखाती है, बहुत कुछ सीखा…….नही सीख पाया तो बस किसी से नफरत करना।" अनूप जी द्वारा प्रस्तुत अखिलेश जी का लेख "मनुष्य खत्म हो रहे हैं, वस्तुयें खिली हुई हैं" ने मेरी सोच को जैसे झकझोड़ दिया। इस लेख से संवेदनाओं के नये मायने सीखे। इस लेख ने मेरा ध्यान दूसरे भारत की तरफ खींचा जिस दूसरे भारत के बारे में सृजनशिल्पी जी मुझे लिखने को बार बार कहते रहते थे, उस तरफ ध्यान गया तो जाना कि सच्चाई वह नहीं जो दिल्ली से दिखती है। इसके बाद मेरे लेखन का झुकाव भी इस दूसरे भारत की तरफ हुआ।
अभी हाल ही में लिंक बदलते बदलते रवि रतलामी जी के एक पुराने लेख पर पहुंच गया। इस लेख ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया और वहां एक भावुक सी टिप्पणी भी छोड़ कर आया जिसका जिक्र रवि जी ने भी किया। यूं तो यहां आकर इतनी ज्यादा उद्विग्नताएं और संवेदनायें मिली फिर भी पहले की अपेक्षा अब ज्यादा अच्छी नींद आती है :)
एक बात बताना चाहूंगा कि कभी कभी चिट्ठे में इतना तल्लीन हो जाता हूं कि कई जरूरी काम भी छूट जाते हैं ।

आपने कितने लोगों को चिट्ठाकारी के लिए प्रेरित किया है।

याहू ने जब ३६० ब्लाग शुरू किया तो कुछ एक दो प्रविष्टियां वहां मैंने भी कीं (बहुत कुछ बचकानी सी, ब्लाग के बारे में जानता नहीं था कुछ)। एक जगह जब मैंने रोमन में गालिब का एक शेर लिखा तो शेषनाथ जी की टिप्पणी मिली जिसमें अक्षरग्राम, नारद के साथ अनुनाद जी कें हिंदी लिंकों वाली पोस्ट के लिंक थे। बस, कड़ी से कड़ी मिलती गई। मैं भी वही तरीका अपनाता हूं। बहुत से भारतीय जो अंग्रेजी में लिखते हैं, उनके ब्लाग पर टिप्पणी छोड़ आता हूं, इससे हमें नये पाठक मिलते हैं, कई प्रेरित हो कर हिंदी लिखना भी शुरू कर देते हैं। संख्या नहीं बता पाऊंगा।

आपके मनपसन्द चिट्ठाकार कौन है और क्यों?

यूं तो पूरी सूची लगा रखी है साईडबार में। सब पसंद हैं। फिर भी अनूपजी, जीतू भाई, रवि जी, रमन जी, दीपक जी, समीर जी, नीरज भाई ऐसे नाम हैं जिनके पोस्ट नारद पर देख कर फट चटका लगता है। अब कुछ कवितायें भी पढ़ने लगा हूं।

आपको चिट्ठाकारी शुरु करते समय कैसा प्रोत्साहन और सहयोग मिला था?

बहुत डरते डरते चिट्ठा शुरू किया था कि पता नहीं लोग कैसा रिएक्ट करेंगे। थोड़ी आशंका तो अब भी रहती है मगर अब लगता है कि सब अपने ही हैं, कोई कुछ कह भी देगा तो झेल लेंगे। उस वक्त डर लगता था। जब मैंने चिट्ठाकार समूह में अपने चिट्ठे को शुरु करने की सूचना भेजी तो आपका जवाब आया कि आपने नारद में इसे शामिल कर दिया है, आपने सभी सद्स्यों को भी कहा कि जाकर टिप्पणी करें और उत्साह बढ़ाएं। मैं गद गद। होंसला बढ़ता गया। जब भी तकनीकि समस्या आई, आपने सहयोग किया। टिप्पाणियां अभी भी प्रोत्साहित करती हैं। खासकर जब पुराने और बड़े चिट्ठाकार टिप्पणी करते हैं तो रोमांचित हो जाता हूं। कुछ टिप्पणियां मैं कभी नहीं भूलता, जैसे की:

देवाशीष जी की टिप्पणी मूषकर जी का ईंटरव्यू पर:



Its very finely written, writer is worth appreciating, simplicity of language is the most admirable followed by splendid use of “LAKSHANA” that characterized “GAGAR MEIN SAGAR” . Keep interviewing.




अनूप जी दिल में वंदेमातरम दिमाग में तेलगी पर



बढ़िया! दिन पर दिन आप ऐसा लिखते जा रहे हैं कि क्या कहें याद रहता है कि टिप्पणी करनी बाकी है! बधाई!




समीर भाई लगे रहो मुन्ना भाई पर



क्या गजब लिखे हो, भाई. मजा आ गया. बहुत खुब. कहां थे अब तक…?




आपकी टिप्पणी चिट्ठाकार गीता पर



जगदीश भाई,
आपकी प्रविष्टि इस साल के इन्डीब्लॉगीज के लिए सबसे मुफ़ीद प्रविष्टि थी। आप इस वर्ष की नायाब खोज हो। आपकी मुन्नाभाई सीरीज को पढने के लिए मै अकेला ही नही, सैकड़ो अन्य लोग भी इन्तज़ार करते है।
आप अच्छा लिखते हो, लगातार लिखते रहो। भविष्य को आपसे बहुत उम्मीदें है।




आप किन विषयों पर लिखना पसन्द/झिझकते है?

आपको सच बताऊं, जो कुछ भी मैं आईना पर लिखता हूं वह सब मैं लिखना नहीं चाहता। मगर क्या करूं, जो लिखना चाहता हूं वह लिख ही नहीं पाता। बचपन से माता पिता से पाकिस्तान से उजड़ कर आने के किस्से सुने। अभी भी हर तरफ वही भीड़ तंत्र दिखता है। हमने इतिहास से कुछ नहीं सीखा। फिर दिल्ली में चौरासी के दंगे देखे। मौत के डर से फटी आंखें देखीं। कैसे सात दिनों में एक शहर का भुगोल और चरित्र बदल जाता है। हर धर्म सद्भावना सीखाता है और हर झगड़ा धर्म के नाम पर ही होता है। कल उस महिला को बिलखते देखा समाचारों में, जिसके पांच बच्चे मर गये समझौता एक्सप्रैस में? चाहता हूं कि सब को बताऊं कि इन राजनीतिबाजों के शिकंजे में न आयें। ये सब धर्म के नाम पर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। मगर कह नहीं पाता। और भी बहुत से दर्द हैं दिल में। लिखना कुछ चाहता हूं, लिख कुछ और देता हूं।

मेरी बेटी जब दो ढाई साल की थी तो चोट लगने से उसके पैर की हड्डी टूट गई। लंबे समय का प्लास्टर लग गया। जो बच्चा एक पल चैन से न बैठता, हिल डुल भी न पाये। ऊपर से दर्द और प्लास्टर की असुविधा। बच्ची परेशान हो जाती तो गोद में उठा बाहर ले जाता और दिखता, वो देखो फूल, वो देखो चिड़िया। रात होती तो वो देखो चंदा मामा। वो देखो तारे। यही खेल खेलता। बच्ची ठीक हो गयी। खेल भी भूल गयी। मैं नहीं भूला। अभी भी वही खेल जारी है। अब खुद से खेलता हूं। दर्द की बात कर नहीं पाता तो ऊट पटांग लिख देता हूं। वो देखो आईना, वो देखो मुन्नाभाई, वो देखो सरकिट.......।

मेरी पसंद

जिंदगी क्या है जानने के लिये
जिंदा रहना बहुत जरूरी है
आज तक कोई भी रहा तो नहीं

सारी वादी उदास बैठी है
मौसमे गुल ने खुदकशी कर ली
किसने बारूद बोया बागों में

आओ हम सब पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हसीं लगेंगे यहां

है नहीं जो दिखाई देता है
आईने पर छपा हुआ चेहरा
तर्जुमा आईने का ठीक नहीं


हम को गालिब ने ये दुआ दी थी
तुम सलामत रहो हजार बरस
ये बरस तो फकत दिनों में गया

लब तेरे मीर ने भी देखे हैं
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
बात सुनते तो गालिब हो जाते

ऐसे बिखरे हैं रात दिन जैसे
मोतियों वाला हार टूट गया
तुमने मुझको पिरो के रखा था।

-गुलजार


'मुन्नाभाई चले अमेरिका' का वास्तविक ट्रेलर

मुन्नाभाई चले अमेरिका का वास्तविक ट्रेलर Munnabhai Chale America








और लीजिये अब पेश है मुन्नाभाई चले अमेरिका का वास्तविक ट्रेलर।





मुन्नाभाई श्रेणी के लेख
बिल्लूगिरी और विंडोस में लोचा
लगे रहो मुन्ना भाई
“पता नहीं सरकिट……. !”
“मुन्नाभाई अमेरिका में”


छोरा गंगा किनारे वाला

परम पूज्य गंगा किनारे वाले बड़े भैया,
प्रणाम,

आज आपको खत लिखने की सोची तो समाचार मिला कि जल्द ही आप सबसे बड़े पद पर भी हो सकते हैं तो सबसे पहले हमार तरफ से और हमार पूरे गांव की तरफ से आपको बहुत बहुत बधाई!
कल रात फिर टी वी पर तोहार इंटरब्यूह देखा। का बताई, गांव मा तो बिजली बहुत ही कम आवत बा हम गये रहे साथ के कस्बा मा। ऊ स्टेशन के पास दुकान पर टीवी चलत रहा तो ऊ पर ही देखे। का शान से बोलत हो भैया। इ सब बाबू जी के संस्कारन का परताप बा। हम इंतजार कर रहे हैं तोहार फिलम 'एकलब्य' का। इंहा तो देर से आई। हम तो सहर जा के देखी। ससुर सहर के मल्टीप्लेक्स मा टिकट बहुत ही मंहगा बा, पर कौनो चिंता नाही, अपने बड़े भैया की फिलम बा। हम जरूर देखी। पर का बताई बड़े भैया, ई मल्टीप्लेक्स वाले जितने में एक लीटर पानी देत हैं, उत्ते में खेत के पम्प की खातिर दुई लीटर डीजल मिल जाई।

और इंटरब्यूह के बीच बीच मा जो तुम आ आकर हमार आंखन में देख कर बोले रहे कि 'पुनरजन्म हो यदि मेरा, तो फिर हो गंगा के तट पर' तो भैया हमार सीना फूल जात है। तोहार इसी अदा पर तो पूरा यूपी फिदा हो जात है।
मगर का बताई बड़े भैया, ऊ हमार दोस्त है ना दिल्ली में रहता है, ऊ हमका आईना दिखा के बोला कि इ जो तुम बोलत हो ना 'पुनरजन्म हो यदि मेरा....' इ तोरे दिल की बात नाही। इ तो तुम बिज्ञापन किये हो और इ दुई बोल बोलन के वास्ते पैसे लिये हो। हम तो कह दिये कि हमार बड़े भैया पैसन की खातिर हमार भावना के साथ कबहु खिलवाड़ ना करी। तो बोले कि जदि पैसे नहीं लिये तो भी ई मा तोहार राजनैतिक दोस्तन का फायदा होई। तुमही बताओ बड़े भैया ई आईना वाला झूठ बोल रहे हैं ना अपना बिलाग चलाये कि खातिर? हमार भावनाओं से तो तुम कभहु खिलवाड़ ना करी?
पर एक बात बा बड़े भैया। ई जो तुम नया बिज्ञापन करे हो कि हमार प्रदेस मा कानून ब्यबस्ता सब चकाचक बा। ई देख कर हमार माथा भी ठनक गया। हमें लगत है कि कोइ तुमका बरगलाय दिया है। लगता है कि तुम टाईम निकाल कर इसे कम्फर्म नहीं कर पाये। ठीक है भईया, इतनी फिलमें, कभी एकलब्य तो कभी निशब्द। फिर इतने इंटरब्यूह । फिर घर मा शादी। एक जान हजार काम। फिर जो नयी गाड़ी मिली ऊका कागज पत्तर। सब काम करन मा कितना टाईम लगत है। ससुर लम्बी लाईन लगत अथारिटी मा गाड़ी के कागजन की खातिर।

पर भैया हम से पूछ लेते प्रदेश की कानून ब्यबस्था के बारे में। हम तो एक ही फुनवा की दूरी पर थे(हम जीतू भाई का बिलाग भी पढ़त हैं)। और अब तो हम मुबाईल भी ले लिये हैं। अगली बार कभी फोन करके पूरे प्रदेश की ना सही हमार और हमार गांव की खबर ले लेना। हमार दिल खुश हो जाई। अब खत को खतम करते हैं।

भौजी को परणाम
रामखिलावन
गंगा किनारे के एक गांव से


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वे आ रहे हैं

यह बात हिंदी चिट्ठाजगत में अकसर पढ़ने को मिलती है कि ले दे कर चार सौ चिट्ठाकार हैं, यही लेखक हैं, यही पाठक हैं और यही टिप्पणी कर्ता। कभी कभी मुझे लगता जैसे हम किसी जुरासिक पार्क में रहते हैं जहां रहने वालों की अपनी ही दुनिया है और बाहर की दुनिया को इसके बारे में पता ही नहीं है।

अब यह बात तय है कि बाहर की दुनिया को जब इसका पता चलेगा तो लोगों का बहुत तेजी से हमारी इस छोटी सी और प्यारी सी दुनिया में आना शुरू हो जायेगा। जब भी यह होगा तो नारद पर दबाव बढ़ जायेगा और चिट्ठाचर्चा में सभी हिंदी चिट्ठों की चर्चा करना असंभव हो जायेगा। इसका दबाव अभी से महसूस हो रहा है। पिछले दिनों बढ़्ती चोरी की घटनाये भी इस और ही इशारा करती है कि बाहर से नये लोग तेजी से यहां आ रहे हैं ।

परिचर्चा पर पुराने सदस्य जब थक हार कर बैठ गये तो नये सदस्यों ने आकर इसे फिर से गुंजायमान कर दिया है तथा परिचर्चा के सदस्यों की संख्या भी अब चार सौ को छू रही है।

पिछले दिनों हिंदी चिट्ठों को टीवी और याहू हिंदी पर स्थान मिला। मैंने कई अंग्रेजी के चिट्ठों पर भी मीडिया पर हिंदी चिट्ठों के जिक्र के बारे में पढ़ा। तो क्या दूसरी दुनिया के लोग हमारे यहां आ रहे हैं?

तो क्या जिन दिनों का हम बहुत बेसब्री से इंतजार कर रहे थे वे आ गये हैं? वर्डप्रैस पर हमें हमारे चिट्ठे पर आने वालों का पूरा हिसाब किताब मिल जाता है। पिछले दस बारह दिनों से सर्च इंजिन से सर्च करते हुए आईना पर आने वालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धी हुई है। बहुत बड़ी संख्या में लोग hindiyahoo, narad, akshargram, hindiblog, hindinewspaper सर्च करते हुए आरहे हैं। लोग हिंदी में भी सर्च कर रहे हैं जिनमें मेरे यहां आने वाले प्रमुख रूप से सर्च कर रहे थे - हिंदी, साहित्य, समाचार, फिल्म, अमिताभ, साफ्टवेयर, समाज, गुरू आदि।

अभी नारद पर प्रविष्टियों पर लगने वाले हिट्स की संख्या दिखायी जाने लगी है मगर जब मैंने पिछले एक सप्ताह में लगने वाले हिट्स का जायजा लिया तो चौंका देने वाले नतीजे मिले। बहुसंख्या में हिट्स नारद के अलावा भी मिल रहे हैं। पिछले एक सप्ताह में मिले कुल पेजलोड्स में से आईना पर औसतन 12% लोग ही नारद से हिट करके आये। पहली बार देख कर मुझे भी विश्वास नहीं हुआ। तो क्या वो आ रहे हैं? आप क्या कहते हैं?


चिट्ठाकार गीता

रात के डेढ़ बज रहे हैं, संजय इस समय भी धृतराष्ट्र को आंखों देखा हाल सुना रहे हैं।

संजय बोले:

जगदीश ने 'मुन्नाभाई अमेरीका में' नाम की पोस्ट अभी अभी आईना पर पोस्ट की है और जब तक यह नारद पर पहुंचे एक बार फिर से पढ़ कर अशुद्धियों को ठीक कर रहे हैं। तभी उनकी नजर आईना पर दायीं ओर के विजेट पर पड़ी जहां इंडीब्लागजीन की साईट की आर एस एस फीड पहले से ही लगी है। वहां उन्होंने देखा कि अभी अभी एक नयी प्रविष्टी Precursor to the Polls, meet the IB 2006 nominees के शीर्षक से आयी है। मुन्नाभाई की वर्तनी को छोड़ झट जगदीश ने चटका ईंडीब्लागजीन की साईट पर लगा दिया है। जगदीश, संजय और धृष्टराष्ट्र तीनों की धड़कनें तेज हो गयीं|

माउस को स्क्रोल करके Best Indic Blog (Hindi) तक आते आते एक बार तो हाथ भी कांप गया था। सबसे पहले 'आईना' का नाम देख विश्वास न हुआ। सोचने लगे 'आईना' के नाम से हिंदी में शायद कोई और चिट्ठा भी होगा जो मेरी नजर में अब तक आया नहीं होगा। जगदीश ने चेक करने के लिये लिंक पर चटका लगाया तो सामने अपने ही ब्लाग को पाया जहां 'मुन्नाभाई अमेरिका में' बिना वर्तनियों की शुद्धी के विराजमान थे।

जगदीश ने बैकस्पेस दबाया और बाकी सूची देखने लगा। इसके बाद उस लिस्ट मे स्थित चिट्ठा जगत के ताऊ-चाचों को, दादों-परदादों को, गुरुओं को, भाइयों को तथा मित्रों को देखा। उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर आईना लेखक जगदीश अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोकाकुल होकर बोले...

प्रतियोगिता क्षेत्र मे डटे हुए इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है, तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमाञ्च हो रहा है ये जीतू भाई हैं, जिन्होंने मुझे अंगुली पकड़ कर ब्लाग बनाना सिखाया। ये फुरसतिया जी हैं, जिन्होंने नये नये पोस्ट लिखने को हमेशा उत्साहित और प्रेरित किया। ये रवि रतलामी जी हैं, जिनसे कभी तकनीकी ज्ञान लिया और कभी चिट्ठा लिखने का व्यावाहरिक ज्ञान लिया। ये सुनील जी हैं, जिनके चिट्ठे को पढ़ कर स्वंय पर ही गर्व होने लगता है। यह समीर भाई हैं, जिनकी टिप्पणी का इंतजार हर पोस्ट करने के बाद होने लगता है | ये मेरे दिल्ली के मित्र सृजनशिल्पी हैं जिन्होंने कई बार फोन पर छोटी छोटी बातों पर गाईड किया। ये प्रिय रंजन हैं जिनका लिखा एक बार ब्लाग पर पढ़ते हैं तो अगले दिन समाचार पत्र में भी दोबारा जरूर पढ़ते हैं।

हाथ से माउस गिर रहा है, और मानिटर की स्क्रीन धुंधली हो रही है तथा मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है; इसलिये मैं खडा़ रहने में भी समर्थ नही हो पा रहा हूँ।
हे कृष्ण तुम कहां हो? एक जरा सा महाभारत हुआ तो तुम ने अर्जुन को पूरा गीता का ज्ञान दे दिया। अब जब एक तरफ इंडीब्लागीस जैसा प्रतिष्ठित अवार्ड है और दूसरी तरफ मेरे अपने ही बंधू बांधव। मुझको इस दुविधा से कौन निकालेगा? कहां हो प्रभू !


मुन्नाभाई अमेरिका में


(नीरज भाई तथा अनूप भाई की फरमाईश पर एक बार फिर पेश है मुन्ना सरकिट संवाद। जैसा कि आप सब को मालूम होगा कि मुन्नाभाई सिरीज की तीसरी फिल्म 'मुन्नाभाई अमेरिका में' बनने वाली है। आजकल इसकी स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है। हमने अपने सूत्रों से इस स्क्रिप्ट की एक ओरिजनल कापी का जुगाड़ कर लिया है- पेश है आपके लिये इसी का एक हिस्सा)

"याहू ! चाहे कोई मुझे जंगली कहे.........!"

"अरे मुन्नाभाई, बड़े खुश लग रहे हॊ, क्या बात है?"

"अरे सरकिट कुछ मत पूछ आज अपुन भोत खुश है"

"क्या बात है भाई? इस बार इंडीब्लागीस में तुम्हारा चिट्ठा आ रहा है क्या?"

"अरे उसका तो अभी चुनाव भी शुरु नईं हुआ, अपुन तो खुश हैं कि याहू ने हिंदी का पोर्टल शुरू कर दिया।"

"पर भाई, अपन सुना कि कोई धुरविरोधी साहब बोला कि हिंदी को याहू की क्या जरूरत? वो बोला कि "हिन्दी की वेबसाइटें कम नहीं हैं" और बोला कि "याहू में कौन से फुंदने टंके हैं"

"अरे सरकिट, याहू के पास इंडिया मेंइच ढाई करोड़ खाते हैं, याहू और गुगल जैसी कम्पनियां अगर इतना बड़ा प्लेटफारम हिंदी चिट्ठाकारों को परदान करतीं है तो अपुन लोगों को निरमल आनंद तो होंयेंगाइ ना। अपन तो खुश हैं कि अब हिंदी जानने वाले और लोग भी हमारे साथ जुड़ेंगे और इंटेरनेट पर हिंदी लिखने और पढ़ने वाले राकेट की माफिक बढ़ेंगे।"

"पर भाई तुम इतना खुश कयेकु हो रिया है।"

"अरे सरकिट तरकश और इंडीब्लागीस की तरह क्या पता याहू भी अच्छे चिट्ठाकार की प्रतियोगिता रख दे और इनाम में हमें अमेरीका की सैर करवा दे । अपुन उदर जाके मिस्टर खुश को गांधीगिरी सिखायेंगा।"

"पर भाई, यह धुरविरोधी क्या नाम हुआ? कुछ भी अच्छा होता है ना भाई, कुछ लोग विरोध करने आ जाते हैं।"

"सुन सरकिट, अपुन के यहां लोकतंतर है और विरोध लोकतंतर का भोत जरूरी हिस्सा है, बिना विरोध के सत्ता निरंकुश हो जाती है।"

"क्या बोला भाई? मिस्टर सत्ताम और मिस्टर खुश में क्या हो जाती है?"

"अरे सरकिट तुम आज सुबह सुबह ही पी लिये हो क्या? अपुन कह रहा है कि सत्ता निरंकुश हो जाती है और तुम सुन रहा है कि मिस्टर सत्ताम और मिस्टर खुश में कुछ हो जाती है।"

"भाई तुम भी तो संसकरित में बात कर रेला है, अपुन तो एक ही सत्ता मालूम है जो ताश का पत्ता होता है - पंजा, छक्का, सत्ता, ये तुम कौन सी सत्ता की बात कर रेला है?

"अरे सरकिट तुम अनजानें में ही बहुत बड़ी बात बोल दिया। आजकल अपुन के यहां यहिच हो रिया है, जो सत्ता दूसरों की मेहरबानी से मिलती है ना भाई, वो पंजा छक्का सत्ता बन केईच रह जाती है।"

"पर भाई, तुम अपुन को समझाओ कि सत्ता क्या होती है?

"अरे सरकिट, सत्ता का मतलब होता है ताकत, ताकत चाहे आदमी में हो, सरकार में हो या किसी कंपनी में, यदि विरोध न हो तो निरंकुश हो जाती है। "

"भाई फिर यह ताकत मिस्टर खुश, मेरा मतलब है निरंकुश कैसे हो जाती है?"

"जब भी विरोध की ताकत कमजोर हो जाती है, सत्ता निरंकुश हो जाती है जैसे घोड़ा बेलगाम हो जाता है तो किसी भी पार्क या गुलिस्तान को उजाड़ सकता है।"

"क्या बोला भाई इराक और अफ्गानिस्तान को उजाड़ सकता है?"

"इसी लिये तो बापू बोला कि ताकत वाले का विरोध होना चाहिये और जो सबसे कमजोर हो हमें उसके साथ खड़े होना चाहिये, हमेशाईच ! बस इतनी सी बात जाके मिस्टर खुश को समझानी है।"


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हिंदी को बचाता याहू या हिंदी बचाती याहू को

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जिस दिन से हिंदी याहू शुरू हुआ, मेरा होमपेज बन गया। शुरू से ही साईट पर हिंदी में पढ़ने को इतना कुछ है कि आप पढ़ते पढ़्ते थक जायें साईट के पन्ने खत्म नहीं होते। हर्ष की बात यह है कि यहां केवल हिंदी के समाचार ही नहीं हैं, खाना खजाना, सेहत, मनोरंजन तथा हिंदी साहित्य का अलग विभाग सृजन संसार भी है। मुख्य रूप से मैं सृजन संसार के बारे में आप सब को बताना चाहता हूं। मगर इससे पहले यह और बता दूं कि जैसा कि जीतू भाई ने भी बताया याहू के नये याहू आवर सिटी के पेज पर हिंदी चिट्ठों की फीड भी दी जा रही है।

याहू हिंदी पर समाचारों के बारे में मैं यही बताना चाहुंगा कि लगता है कि हिंदी में समाचार लगभग उसी गति से आ रहे हैं जिस गति से इंगलिश समाचार। कल जब इस्लामाबाद हवाईअड्डे पर आत्मघाती हमला हुआ तो जब तक यह समाचार एन डी टी वी पर ब्रेक होता उससे पहले ही इस समाचार को मैं याहू हिंदी पर पढ़ चुका था।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि याहू हिंदी का जो हिस्सा मुझे सबसे ज्यादा भा रहा है वो है हिंदी साहित्य पर आधारित सृजन संसार। यहां आपको अच्छा और स्तरीय साहित्य मिलेगा जिसमें हैं कहानियां, खासकर लघु कथाएं, कवितायें, पूस्तक समीक्षा तथा अत्मकथात्मक अपना लेखन। मगर कई जगहों पर लेखकों का नाम न देख कर आश्चर्य होता है।

अपना लेखन में मुझे मेरी मनपसंद लेखिका अमृता प्रीतम की आत्मकथा रसीदी टिकट का एक हिस्सा मिल गया, इसका एक अंश आपके लिये यहां प्रस्तुत है:

घर में पिताजी के सिवाय कोई नहीं था- वे भी लेखक जो सारी रात जागते थे, लिखते थे और सारे दिन सोते थे। माँ जीवित होतीं तो शायद सोलहवाँ साल और तरह से आता- परिचितों की तरह, सहेलियों की तरह। पर माँ की गैर हाजिरी के कारण जिंदगी में से बहुत कुछ गैर हाजिरी हो गया था। आसपास के अच्छे-बुरे प्रभावों से बचाने के लिए पिता को इसमें ही सुरक्षा समझ में आई थी कि मेरा कोई परिचित न हो, न स्कूल की कोई लड़की, न पड़ोस का कोई लड़का।

सोलहवाँ बरस भी इसी गिनती में शामिल था और मेरा ख्याल है, इसीलिए वह सीधी तरह का घर का दरवाजा खटखटाकर नहीं आया था, चोरों की तरह आया था।



आगे देखिये

कहते हैं ऋषियों की समाधि भंग करने के लिए जो अप्सराएँ आती थीं, उनमें राजा इंद्र की साजिश होती थी। मेरा सोलहवाँ साल भी अवश्य ही ईश्वर की साजिश रहा होगा, क्योंकि इसने मेरे बचपन की समाधि तोड़ दी थी। मैं कविताएँ लिखने लगी थी और हर कविता मुझे वर्जित इच्छा की तरह लगती थी। किसी ऋषि की समाधि टूट जाए तो भटकने का शाप उसके पीछे पड़ जाता है- 'सोचों' का शाप मेरे पीछे पड़ गया...


इसी प्रकार मिला गुलजार साहब की पुस्तक रावीपार से उनका आत्मकथात्मक अंश जहां गुलजार साहब अपने लेखन के बारे में बता रहे हैं। आप भी देखिये:

कभी नज्म कहके खून थूक लिया और कभी अफसाना लिखकर जख्म पर पट्टी बाँध ली। मगर एक बात है, नज्म हो या अफसाना, उनसे इलाज नहीं होता। वह आह भी है, चीख भी, दुहाई भी। मगर इंसानी दर्दों का इलाज नहीं है। वह सिर्फ इन्सानी दर्दों को ममिया के रख देते हैं, ताकि आने वाली सदियों के लिए सनद रहे।

इसके अलावा कई कवितायें भी हैं। यूं तो कविताओं में अपना हाथ कुछ तंग ही है मगर पढ़ कर समझने की कोशिश जरूर करता हूं। एक कविता मिली बिटिया मुर्मू के लिए कविता लेखक का नाम नहीं है पर कविता अच्छी लगी:

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बिटिया मुर्मू के लिए कविता

उठो कि अपने अँधेरे के खिलाफ उठो
उठो अपने पीछे चल रही साजिश के खिलाफ

उठो कि तुम जहाँ हो वहाँ से उठो
जैसे तूफान से बवंडर उठता है
उठती है जैसी राख में दबी चिंगारी
देखो! अपनी बस्ती के सीमान्त पर
जहाँ धराशायी हो रहे हैं पेड़
कुल्हाड़ियों के सामने असहाय
रोज नंगी होती बस्तियाँ
एक रोज माँगेगी तुमसे तुम्हारी खामोशी का जवाब

सोचो-
तुम्हारे पसीने से पुष्ट हुए दाने एक दिन लौटते हैं
तुम्हारा मुँह चिढ़ाते तुम्हारी ही बस्ती की दुकानों पर
कैसा लगता है तुम्हें
जब तुम्हारी ही चीजें तुम्हारी पहुँच से दूर होती दिखती हैं....


इबे डॉट कॉम, टाईम्सजॉब डॉट कॉम, ईंडियाप्रॉपर्टीस डॉट कॉम तथा अन्य कई साईटों एवम उत्पादों के विज्ञापनों के बीच याहू की साईट पर इस तरह का हिंदी साहित्य देख एक आनंद मिश्रित आश्चर्य होता है।

राजेश जोशी जी की एक कविता बचाना भी है यहां:

बचाना

एक औरत हथेलियों की ओट में
दिए की काँपती लौ को बुझाने से बचा रही है

एक बहुत बूढ़ी औरत कमजोर आवाज में गुनगुनाते हुए
अपनी छोटी बहू को अपनी माँ से सुना गीत
सुना रही है

एक बच्चा पानी में गिरे पड़े चींटे को
एक हरी पत्ती पर उठाने की कोशिश कर रहा है
एक आदमी एलबम में अपने परिजनों के फोटो लगाते हुए
अपने बेटे को उसके दादा दादी और नाना नानी के
किस्से सुना रहा है।


अब इसका निश्चय तो आप ही कीजिये कि यहां याहू बचा रहा है हिंदी को या हिंदी बचा रही है याहू को। इतना तय है कि हिंदी को तो देर सवेर अपना स्थान इंटेरनेट पर मिल ही जायेगा क्योंकि याहू जैसी साईटों को भी अपना काम धंधा फैलाने के लिये हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के सहारे की बहुत जरूरत है।

अपने को तो यही खुशी है कि करोड़ो पेजों के इंटेरनेट पर जहां हिंदी चिट्ठों के अलावा हमें समझ नहीं आता था कि कहां जायें, अब लगता है कि हिंदी का आकाश मिल गया है उड़ान भरने के लिये।


सफल हुई मुन्नाभाई की गांधीगिरी

आखिरकार हम सब का विरोध रंग लाया।
रीडिफ ने आकर्ष मेहरोत्रा का ब्लाग हटा दिया है।
सभी चिट्ठाकारों का में दिल से धन्यवाद कहना चाहता हूं जिनके सहयोग से यह सब हुआ।
रीडिफ्लैंड के संदीप जी को भी उनके सहयोग के लिये धन्यवाद देना चाहता हूं।

यह ठीक है कि हम लोग चिट्ठाकारिता धनार्जन के लिये नहीं करते। यह भी सच है कि एक बार जो लोगों को लिख कर दे दिया वो उनका हो गया| मेरे कई लेखों के लिंक लोगों ने अपने ब्लाग पर दिये हैं। मेरे कई लेख भी मेरे ही नाम से प्रकशित भी किये गये। उदाहरण के लिये यहां देखिये। मगर कोई कापी करके अपने नाम से छाप दे तो इसका विरोध होना ही चाहिये और सम्मानपूर्वक तरीके से ब्लाग लेखक को अथवा ब्लाग होस्ट को निवेदन करना चाहिये।

अधिकतर मामलों में यह तरीका काम कर जाता है।

एक बार फिर से आप सब का धन्यवाद।


जहां चिट्ठाकारों की ख्याति ज्यादा है अमिताभ और शाहरुख से

यूं ही बैठे बैठे गुगल पर हिंदी में कुछ नाम सर्च किये तो बहुत मजेदार परिणाम सामने आये। हमारे दोनो टिप्पणी किंग समीर भाई तथा संजय भाई के नाम हिंदी में इंटेरनेट पर सोनिया गांधी से भी ज्यादा हैं। बहुत से चिट्ठाकारों के नाम अमिताभ बच्चन से भी ज्यादा हैं। शाहरुख तो चिट्ठाकारों के समक्ष कहीं टिक ही नहीं रहे। और कौन कहेगा कि एश्वर्या देश भर की चहेती हैं। बाकि परिणाम आप स्वंय ही देख लीजिये, सीधे गुगल से ही कापी पेस्ट किया है:


56,500 for मनमोहन सिंह
26,000 for समीर लाल.
21,300 for संजय बेंगाणी
17,500 for सोनिया गांधी.
17,300 for अनूप शुक्ला
14,200 for जीतू.
13,600 for अमिताभ बच्चन
13,500 for जगदीश भाटिया.
11,300 for रवि रतलामी (67,200 for रवि)
10,400 for ऐश्वर्या राय.
9,770 for सृजन शिल्पी
9,280 for शाहरुख.


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और अब मुन्नाभाई के साथ भाईगिरी

लो भई, अब मुन्नाभाई के साथ ही भाईगिरी हो गई। यानि अपने मुन्नाभाई पर भी हाथ साफ कर लिया एक ब्लागर ने। रीडिफ पर यह ब्लागर हैं इलाहाबाद के आकर्ष मेहरोत्रा। असली माल यहां है और चोरी किया गया माल यहां है। मुझे खुशी है कि मेरे लिखे को चुराने लायक मुल्यवान समझा गया।


भाई लोग सलाह दें कि इनका क्या किया जाये। मैंने वहां दिये संपर्क के लिंक पर भी आकर्ष को इसे हटा लेने के लिये लिखा है।

इस सब को रोकने के लिये हम सबको मिल कर ही कुछ करना पड़ेगा ऐसा मेरा सोचना है।

भाई आकर्ष से मेरा फिर अनुरोध है कि वे इसे वहां से फौरन हटा लें। क्योंकि न तो उन्होंने इसकी अनुमति लेना जरूरी समझा और न ही मेरा नाम लिखना जरूरी समझा जबकि मेरा इमेल पता मेरे चिट्ठे आईना पर बड़े अक्षरों में उपलब्ध है।


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विंडोस विस्टा पर एक नजर

विंडोस विस्टा की उपयोगिता पर सवाल उठाता हिंदी में एक मजेदार लेख आज के नवभारत टाईम्स में छपा है 'इस खिड़की से क्या नजर आता है?' पढ़ने के लायक लेख है।संजय वर्मा ने अपने इस लेख में विंडोस विस्टा की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए लिखा है:
"बदलाव के जो ट्रेंड विस्टा की अग्निपरीक्षा साबित हो सकते हैं, उनमें पहला यह है कि आज बाजार में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर बहुतायत में उपलब्ध हैं। ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर विंडोज और ऑफिस सिस्टमों की तरह ही कंप्यूटर को मौजूदा जरूरतों के मुताबिक चलाने वाले ऐसे औजार हैं, जिन्हें किसी एक कंपनी ने नहीं, बल्कि स्वैच्छिक समूहों या व्यक्तियों ने डिवेलप किया है। इनकी सबसे बड़ी खासियत एक तो इनका बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध होना है, और दूसरे, जरूरतों के मुताबिक इनमें तब्दीली मुमकिन है। मजे की बात तो यह है कि आईबीएम जैसी कंपनी इन मुफ्त ऑपरेटिंग सिस्टमों को सपोर्ट करने वाली तकनीकें बेचकर इनके प्रयोग को बढ़ावा ही दे रही है। ऐसा सबसे प्रचलित ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर है 'अपाचे'। इसी तरह 'लीनक्स' ऑपरेटिंग सिस्टम भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में लाया जा रहा है।

इसलिए विस्टा के लॉन्च के साथ ही बरसों पुरानी वह बहस फिर जिंदा हो गई है कि क्या ओपन सोर्स के सामने क्लोज्ड सोर्स ऑपरेटिंग सिस्टम (क्लोज्ड सोर्स का अर्थ है वैसा सॉफ्टवेयर, जिसमें कोई तब्दीली सिर्फ उसकी निर्माता कंपनी ही कर पाए) टिक पाएगा?"

वे आगे लिखते हैं:

"विस्टा की राह में एक बड़ी बाधा और है, और वह यह बताई जा रही है कि इस बीच कंप्यूटर की दुनिया में आए बदलावों को शायद माइक्रोसॉफ्ट नहीं पढ़ पाया है। हाल तक कहा जाता था कि जो पर्सनल कंप्यूटर अपने भीतर इंस्टॉल (समाहित) सॉफ्टवेयर पर चलता है और जिसके लिए नेटवर्किंग एक अ-महत्वपूर्ण चीज है, वह एक उम्दा कंप्यूटर हो सकता है। नेटवर्किंग की जरूरतों के सीमित रहते और वायरसों के हमले को संभाल पाने वाले पुख्ता इंतजामों के अभाव में माइक्रोसॉफ्ट के उत्पादों का विशाल बाजार बना, पर अब समूचा परिदृश्य उलट गया है। यानी नेटवर्किंग अहम हो गई है और यह कतई जरूरी नहीं रहा कि कंप्यूटर अपने भीतर हार्ड डिस्क पर मौजूद सॉफ्टवेयरों का मोहताज बना रहे।"

"....विस्टा की धूमधाम माइक्रोसॉफ्ट के लिए नया जीवन साबित होगी या बदलाव के लिए नया मौका जुटाएगी, इस सवाल के जवाब का सभी को बेसब्री से इंतजार रहेगा। "

पूरा लेख आप यहां पढ़ सकते हैं।

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कांच जैसा पारदर्शी इंटरफेस

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सटासट सर्च

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3 डी इंटरफेस

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साईडबार और गजेट्स

विंडोस विस्टा पर अंग्रेजी रिव्यू यहां पढ़ सकते हैं।