ये तलवार वाले... नाक के रखवाले


केमिकल लोचा- संदर्भ :- गांधीगिरी


कुछ दिन से ढंग से मैं सो नहीं पाया

रात बदली करवट तो बापू को पाया



मैं बोला, बापू कैसे मेरा ख्याल आया?

कुछ दिन से हूं आहत, यह मर्म कैसे पाया?

पलट के बोले बापू, बस यूं ही चला आया

चेहरा देखा बापू का तो मैं कुछ घबराया

ये चोट कैसी बापू? बैचैन हो मैं अकुलाया

कुछ नहीं है बेटा, कह बापू ने बहलाया

मेरी जिद के आगे अधिक न टिक पाया



बापू बोले,

''देश के कुछ लोग हैं जो रात दिन सताते हैं

मक्खियों की तरह मेरी नाक पर भिनभिनाते हैं ''



मैं बेचैन हो गया, रहा न खुद पे काबू

अंग्रेजों को हराने वाले, मक्खियों से चोटिल बापू ?



बापू बोले,

''अरे नहीं इन मक्खियों के आगे कौन हारा है ,

मेरा हाल तो मेरे स्वयंभू रक्षकों ने बिगाड़ा है

जब भी कोई मक्खी मेरी नाक पर बैठी देख लेते हैं

तो मेरी अहिंसक नीतियों की रक्षा के लिये

झट से तलवार निकाल लेते हैं

झट से तलवार निकाल लेते हैं.''


अलग था ओ पी नैय्यर का संगीत

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ओ पी नैय्यर एकदम अलग प्रकार का संगीत देते थे। उनके गीत सुनते ही पहचान में आ जाता था कि यह ओ पी नैय्यर का ही संगीत है। बचपन से ही रेडियो विविध भारती पर उनके सैंकड़ों गाने सुने। उनके संगीत में पंजाबी लोकसंगीत की महक तथा जोश था।

विकिपीडिया पर अंग्रेजी में उनपर लिखे लेख का हिंदी अनुवाद मैंने किया है तथा उसे हिंदी विकिपीडिया पर भी यहां डाल दिया है। विकिपीडिया पर छोटे मोटे बदलाव तो मैंने पहले किये हैं मगर इस प्रकार का लेख पहली बार लिखा है।

ओंकार प्रसाद नैय्यर

ओ पी नैय्यर (जनवरी १६, १९२६ - जनवरी २८, २००७) हिन्दी फिल्मों के एक प्रसिद्ध संगीतकार थे जो लाहौर में पैदा हुए थे तथा अपने चुलबुले संगीत के लिये जाने जाते थे।

ओ पी नैय्यर ने अपना फिल्मी सफर शुरू किया १९४९ में कनीज फिल्म में पार्श्व संगीत के साथ। इसके बाद उन्होंने आसमान(१९५२) को संगीत दिया। गुरुदत्त की आरपार (१९५४) उनकी पहली हिट फिल्म थी। इसके बाद गुरुदत्त के साथ इनकी बनी जोड़ी ने मि्स्टर एडं मिसेज ५५ तथा सी आई डी जैसी फिल्में दीं। नैय्यर मेरे सनम में अपने संगीत को एक नयी ऊंचाईयों पर ले गये जब उन्होंने जाईये आप कहां जायेंगे तथा पुकारता चला हूं मैं जैसे गाने दिये। उन्होंने गीतादत्त, आशा भोंसले तथा मों रफी के साथ काम करते हुए उनके कैरियर को नयी ऊंचाईयों पर पहुंचाया। उन्होंने कभी लता जी के साथ काम नहीं किया।

उनकी कुछ मशहूर फिल्में

आरपार

नया दौर

तुमसा नहीं देखा

कश्मीर की कली

मेरे सनम

एक मुसाफिर एक हसीना


उनके कुछ अच्छे गीत यहां मिले


जहां आम आदमी देते हैं टैक्स और अमीर बच कर निकलते हैं

हट सकती है करों में छूट - २हमारे देश में यही होता है कि आम आदमी को तो टैक्स देने पड़ते है और अमीर कई तरह की छूटों का लाभ लेकर टैक्स देने से बच निकलते हैं।

सर्विस टैक्स एक ऐसा टैक्स है जो कि सरकार ने लगभग 95 प्रकार की सेवाओं पर लगाया हुआ है। इनमें कई सेवाएं जैसे कि मोबाईल तथा फिक्सड फोन, कुरियर, तार भेजना, केबल, स्कूटर का बीमा, रेल टिकट एजेंट, ड्राईक्लीनिंग जैसी अन्य कई सेवाएं ऐसी हैं जो कि आम आदमी के प्रयोग की हैं। यदि आप माह में पांच हजार रुपये इन 95 सेवाओं पर खर्चते हैं तो 12.24% की दर से 612 रु हर माह सरकार को सर्विस टैक्स देते हैं। यानि साल में 7344 रु। हैरानी की बात यह है कि जहां कम्पनियों और अमीरों पर लगने वाले टैक्स घट रहे हैं, सर्विस टैक्स जो कि 1994 में केवल 5% की दर से शुरू किया गया था, बढ़ कर 12.24% हो गया। यही नहीं लगातार कर योग्य सेवाओं का दायरा भी बढता जा रहा है। अब तो शायद ही कोई सेवा बची हो जो कि करों के दायरे में न आई हो।

जैसा कि मैंने अपने पिछले लेख हट सकती है करों में छूट में लिखा था 2006-07 में सरकार को विभिन्न छूटों से राजस्व हानि हुई 1,58,661 करोड़ रुपये। इसमें से बहुत बड़ा भाग बचाया बड़ी कम्पनियों ने। निजी करदाताओं को दी जाने वाली छूट से हुई हानी केवल 11,695 करोड़ रुपये ही थी।

निजी करदाताओं को जो छूट मिलती हैं उनमें शामिल हैं गृह ऋण पर दी जाने वाली छूट, विभिन्न बचत योजनाओं में निवेश पर छूट तथा कृषि आय पर छूट।

कृषि आय पर दी जाने वाली छूट को शायद ही सरकार छेड़ पाये। आने वाले राज्यों के चुनावों को देखते हुए तो यह और भी कठिन लगता है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर अलग से एक लेख लिखा जा सकता है, वैसे साथी चिट्ठाकर इस बारे में क्या सोचते हैं यह जानना रुचिकर होगा।

हाउसिंग लोन पर करों में छूट देने से हाउसिंग को बढ़ावा मिलता है। इससे अर्थव्यव्स्था के मूल घटकों जैसे कि सीमेंट तथा स्टील क्षेत्रों के साथ साथ बैंकिंग को भी बढ़ावा मिलता है। कुछ हजार करोड़ बचाने के लिये हाउसिंग बूम को रोकने का काम सरकार कर पाती है या नहीं आने वाले बजट में यह देखना रुचिकर होगा।

छोटे करदाताओं को बचत योजनाओं में निवेश पर दी जाने वाली छूट नौकरीपेशा लोगों के लिये परेशानी का कारण हो सकती है। हो सकता है कि अभी निवेश करने पर मिलने वाली छूट जारी रहे मगर इन निवेशों में मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर टैक्स लगना शुरू हो जाये।

यानि लगता है कि कुल मिला सरकार को अधिक से अधिक टैक्स जुटाने के लिये आम आदमी ही मिलेगा तथा बड़े लोग एवम कम्पनियां बचते ही रहेंगे।

दुनिया में कई देश हैं जहां टैक्स या तो हैं ही नहीं अथवा इतने कम हैं कि इन देशों को टैक्स हैवन कहा जाता है। इनके बारे में अंग्रेजी विकीपीडिया पर यहां पढ़ें।

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मानव, बुब्बू और टिम्मी

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बच्चों की बातें भी कितनी मासूम होती हैं, हम बड़ों की दुनिया से एकदम अलग। मानव मेरा सात वर्षिय बेटा है। बुब्बू उसका कबूतर भाई है तथा छोटा सा पिल्ला टिम्मी हमारे परिवार का सदस्य। छोटा सा पिल्ला टिम्मी कोई बीस पच्चीस दिन पहले न जाने कहां से आकर हमारे अहाते में घुस गया। बच्चों को तो जैसे खेल ही मिल गया। एक पुराना लकड़ी का दराज उसका कमरा बन गया तथा एक पुरानी शॉल उसका बिस्तर। एक प्लास्टिक का कटोरा उसका बर्तन। मैंने देखा तो मुझे यह सब पसंद नहीं आया। मुझे लगा कि यह कुत्ता घर में जगह जगह गंदगी करेगा। मगर बच्चों का दिल नहीं तोड़ना चाहता था। फिर मेरी पत्नी ने भी कहा कि सर्दी बहुत है, छोटी सी जान है, यहीं कोने में पड़ा रहेगा और फिर इसे बाहर भी निकाल दिया तो यह इतना छोटा है कि बंद गेट के नीचे से भी घुस आयेगा। जब थोड़ा बड़ा होगा तो निकाल देंगे।

मगर कमाल तो तब हो गया जब मानव ने उसका नामकरण कर दिया टिम्मी भाटिया। इतना ही नहीं, वह पड़ोस में सब को बता भी आया कि हमारे डॉगी का नाम है टिम्मी भाटिया। मैंने उसे डांटा कि यह कुत्ता भाटिया कैसे हो गया तो जवाब मिला कि हमारे घर में जो भी रहता है सब के नाम में भाटिया है तो टिम्मी भी तो हमारे घर में ही रहता है। उसके इस मासूम से जवाब ने मुझे निरुत्तर कर दिया। फिर 13 जनवरी को आयी लोहड़ी। बच्चे जिद्द करने लगे कि लोहड़ी जलाई जाये मगर मुझे दूसरी मंजिल की छत पर पड़ीं मोटी तथा भारी लकड़ियों को उठा कर नीचे लाने में आलस आ रहा था। मैंने बहाना बनाया कि लोहड़ी तो वो लोग मनाते हैं जिनके घर में नया नया बेबी आया हो। "हमारे घर में भी तो टिम्मी आया है, हम उसकी लोहड़ी मनायेंगे।" मैं फिर निरुत्तर हो गया था।

लकड़ियां उठाने छत पर गये तो एक और सरप्राईज मेरा इंतजार कर रहा था। "मेरे भाई का ख्याल रखना, लकड़ियां उसे लग न जायें।" मेरा माथा ठनका। अब यह भाई कहां से आ गया। "बुब्बू मेरा भाई है।" "वो पिजन जो लकड़ियों के पास रहता है वो मेरा भाई है, उसका नाम है बुब्बू।" मानव अपने सभी दोस्तों को भाई कहता है। (बिल्कुल जैसे हम चिट्ठाकारों को भाई बुलाते हैं।)

बच्चों के मन बड़ों की तरह नहीं होते। वे पक्षियों तथा पशुओं से भी रिश्ता गढ़ लेते हैं। हम बड़े उनको व्यावहारिक बनाने के चक्कर में इतने अव्यावहारिक हो जाते हैं कि जब वो बुब्बू की बात करते हैं तो हम उन्हें बुक्स और होमवर्क की याद दिलाते हैं और जब वे टिम्मी की बात करना चाहते हैं तो हम उन्हे टर्म एग्जाम्स की याद दिलाते हैं।

लोहड़ी की रात टिम्मी की हमारे घर में आखिरी रात थी। अगले दिन एक सज्जन उसे बोरे में डाल कर कहीं दूर छोड़ आये। मानव जब स्कूल से आया तो उसे यह बात पता चली। मगर विश्वास नहीं हुआ। एक बार गली का चक्कर भी लगा आया टिम्मी को खोजने के लिये मगर निराश हो लौट आया।

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बच्चा तो टिम्मी को शायद भूल गया, मगर आज मुझे टिम्मी याद आ गया जब मैं आउटर रिंग रोड पर मंगोल पुरी के पास से गुजर रहा था।
आज फिर वही हुआ जो हमेशा होता है। दिल्ली में आउटर रिंग रोड पर मंगोल पुरी से गुजरते हुए इतनी बदबू आती है कि नाक सड़ जाये। शायद भारत के हर शहर मैं इस तरह की कोई जगह आपको मिल जायेंगी। वहां रहने वाले सुबह सुबह अपनी प्रकृतिक जरूरतों का निपटारा खुले में ही कर लेते हैं और इसका पता हर आने जाने वाले को पूरे दिन वहां की हवा से लगता रहता है। आज तो जब मैं वहां से गुजरा तो हमारे रेडियो मिर्ची को भी पता चल गया तभी तो फट उन्होंने गीत लगा दिया 'क्रेजी किया रे....।"

हमारी सरकारें शहरों के विस्तार तो कर रही हैं मगर सार्वजनिक सुविधाओं के नाम पर न तो गरीबों को कोई सेवा देतीं हैं और न ही लोगों को इतनी तमीज है कि जहां हम रहते हैं कम से कम उस जगह को तो गंदा न करें।

मुझे किसी जानवर को पालने का अनुभव नहीं है। मैं टिम्मी को अपने घर नहीं रखना चाहता था क्योंकि मुझे डर था कि वह घर को गंदा करेगा मगर टिम्मी जितने दिन भी हमारे घर रहा, उसने वहां गंदा नहीं किया। यह सिविक सेंस क्या हम छोटे से टिम्मी से सीखेंगे?



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क्या इतनी सिंपल सी बात गोवरंमेंट को समझ नहीं आती?
….फिर भी मेरा भारत महान
मेरा मन धक से रह जाता है…….


इस ब्राउजर से हिंदी की होगी - प्रगति

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फायरफॉक्स पर अधारित हिंदी का आधुनिक ब्राउजर है प्रगति
पूरी तरह के इस हिंदी ब्राउजर की खूबी है इसका ऑनलाईन टाईपराईटर जो कि हिंदी लिखने वालें के लिये एक सौगात की तरह हैं। अब अलग से किसी टाईपराईटर टूल की जरूरत नहीं, इस ब्राउजर में ही हिंदी टाईपराईटर है जो कि एक क्लिक से प्रगट होता है।

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एक खूबसूरत सा नन्हा सा पाई मिनू है जो स्क्रीन पर विजेट की तरह तैरता रहता है।

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हिंदी शब्दकोश बीच में ही सम्मिलित है।
अंग्रेजी शब्दों के हिंदी अर्थ जानने के लिये अंग्रेजी शब्दों पर सिर्फ क्लिक करें और हिंदी अर्थ हाजिर है।
एक बार आजमा कर देखें।


हट सकती है करों में छूट







जल्द ही बजट आने वाला है। बजट के आने तक हम चर्चा करेंगे कि बजट में क्या होने की संभावना है और यह समझने की कोशिश करेंगे कि इसका हमारे ऊपर क्या असर हो सकता है एक निवेशक के रूप में, एक करदाता के रूप में तथा एक उपभोक्ता के रूप में। 'आईना' के इन पन्नों पर हम बजट तक इस सब की चर्चा करेंगे तथा बजट के बाद कोशिश करेंगे वास्तविक बजट प्रस्तावों को समझने की। बजट में क्या होगा इसका पहले से अनुमान लगाना बहुत कठिन होता है मगर प्रधान मंत्री तथा वित्त मंत्री के होंठों को पढ़ कर संभावित बदलावों के अनुमान लगाये जा सकते हैं।

प्रधान मंत्री जी ने हाल ही में कहा कि करों को तर्क संगत बनाने के लिये करों में दी जाने वाली छूटों को हटाने का समय आ गया है। इससे हम यह अंदाजा लगा सकते हैं कि करों में दी जाने वाली भिन्न प्रकार की कर रियायतें बजट में हट सकती हैं। बजट से पहले दिये जाने वाले एस प्रकार के बयानों के केवल शाब्दिक अर्थों को ही नहीं समझना चाहिये अपितु इससे जुड़े अन्य पहलूओं पर भी विचार किया जाना चाहिये। जबकी बजट को पूर्णयता गोपनीय रखा जाता है, बजट पूर्व इस प्रकार की इशारेबाजी के कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। हो सकता है कि सरकार कुछ बड़े परिवर्तन करना चाहती है और अचानक हुई घोषणा से लोगों को अप्रत्याशित झटका न लगे इसलियये यह इशारा किया गया। कई बार इस प्रकार के बयान लोगों कि राय जानने के लिये भी दिये जाते हैं जिससे अंतिम फैसला लेने में लोगों कि राय को भी शामिल किया जा सके। (वैसे सरकारें तब तक आमराय को इतना महत्व नहीं देतीं जबतक कि इससे उन्हें कोई राजनैतिक लाभ न हो) । क्योंकि आम चुनाव अभी दो वर्ष दूर हैं, तो किसी लोक लुभावन बजट की उम्मीद वित्त मंत्री जी से न करें। इसके विपरीत सरकार के पास यह आखिरी मौका होगा कुछ कड़वे निर्णय लेने का।

यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि सरकारें यदि कोई अच्छी घॊषणा करनी हो तो छिपा कर रखती हैं तथा बजट से पहले हमेशा इस प्रकार के बयान देने से बचतीं हैं जिनसे आम लोगों को अथवा उद्योगों या पूंजी बाजारों को बजट से बहुत अधिक सकरात्मक उम्मीदें हो जायें, क्यों कि अगर बजट इन सब की उम्मीदों पर खरा न उतरे (और ऐसा हमेशा होता है) तो इसकी नकरात्मक प्रतिक्रिया (जैसे शेयर बाजार में गिरावट) भी हो सकती है।

तो आइये प्रधानमंत्री जी कि इस बात को समझें और यदि ऐसा हुआ तो इसका क्या असर होगा इसे भी समझने की कोशिश करें। सबसे पहले उद्योगों द्वारा दिये जाने वाले करों की बात करते हैं। पिछले वर्ष वित्तमंत्री जी ने बजट पेश करते हुए करों में 19.3% की वृद्धी का अनुमान लगाया था। आगामी 28 फरवरी को जब वित्तमंत्री जी बजट पेश करेंगे तो अपने ही अनुमानों से 20.000 करोड़ रु अघिक एकत्र कर चुके होंगे। यह सब संभव होगा अर्थवयवस्था में होते तेज विकास के कारण। अब यदि सरकार इतना अधिक धन इकट्ठा कर रही है तो करों में छूट वापिस क्यों ली जा रही है। ऐसा लगता है कि सरकार छूटों को हटा कर करों की दरों को भी कम करना चाहती है जिससे करों की गणना आसान हो जाये तथा दरें तर्कसंगत और इसके साथ ही कंपनियां करों मे छूट की आड़ में टैक्स देने से बचती न रहें।

2006-07 में करों से राजस्व आय थी 3,17,733 करोड़ रुपये तथा विभिन्न छूटों से राजस्व हानि थी 1,58,661 करोड़ रुपये। यानि लगभग 50%|
करों से छूट हटा लेने का अर्थ होगा कंपनियां अपने लाभ से सरकार को अधिक कर देंगी जिससे उनके पास शेयरधरकों को दिये जाने वाले लभांश में कमी होगी। इसका अधिक असर बड़ी कंपनियों पर पड़ेगा।

करों की दरों में कमी का अर्थ होगा कंपनियों के पास लभांश देने के लिये तथा विस्तार करने के लिये अधिक धन। इसका व्यापक सकरात्मक असर होगा तथा उम्मीद है कि बाजार हर्ष के साथ इसका स्वागत करेंगे।
इससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी कमी आने की संभावना है।

अगले लेख में हम चर्चा करेंगे निजी आयकर में छूट के हटने से होने वाले प्रभावों की ।

(आंकड़े आज की टाइम्स ऑफ ईंडिया से)


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सपने देखने वालों के लिये - गुरू


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एक बार एक पुस्तक में पढ़ा था "If no one is laughing on your dreams, your dreams are not big enough." यह वाक्य मुझे हमेशा याद रहा। गुरु फिल्म में गांव का एक लड़का देश की सबसे बड़ी कम्पनी बनाने का सपना देखता है। जैसा कि गुलजार ने फिल्म के एक गीत में लिखा है:जागे है देर तक हमें
कुछ देर सोने दो
थोडी सी रात और है
सुबह तो होने दो
आधे-अधुरे ख्वाब
जो पुरे नहो सके
इक बार फिर से
नींद मे वो ख्वाब बोने दो....
ख्वाब कभी पूरे नहीं हो पाते, जब आप देश की सबसे बड़ी कम्पनी बनाने का ख्वाब देखते हैं, एक बहुत बड़ा सपना होता है यह और जब आप इसे छू लेते हैं तो आपका सपना होता है उसे दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी बनाना।बहुत ही रोमांचकारी लगता है उस इतिहास पर फिल्म देखना जिस इतिहास को आपने स्वंय देखा हो। धीरू भाई अंबानी की जिंदगी पर बनी फिल्म 'गुरू' में आपको असल जिंदगी में घटा सब कुछ मिलेगा, स्टेडियम में होती कम्पनी की एजीएम, इंडियन एक्सप्रैस, गोयनका, शौरी तथा वाडिया। अंबानी को हीरो बनाने का एक बोल्ड सपना मनिरत्नम ने भी देखा। फिल्म में सरकारी लाईसेंस राज तथा भ्रष्टाचार से लड़ाई में एक्साईज तथा अन्य करों की चोरी को जायज भी दिखाने की कोशिश की गयी है। जहां आर्थिक सुधारों से पहले तक पूंजीपतियों को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता था तथा मुनाफा एक घिनौना शब्द था, वहां गांव के एक कम पढ़े लिखे लड़के के इन सपनों की कैसी हंसी उड़ाई जाती है मगर गुरु हिम्मत नहीं हारते तथा पलट कर पूछते हैं, "क्यों हमें तीसरी दुनिया का देश कहा जाता है, क्यों नहीं हम भी पहली दुनिया का देश बन सकते?"

लोगों को खींचने के लिये फिल्म में गुलजार के गीत तथा ए आर रेहमान का संगीत तो है ही, मल्लिका शेहरावत का आईटम सांग भी है (यदि इसे देखना चाहते हैं तो थियेटर टाइम से पहुंचियेगा, पांच मिनट की देरी हुई तो आप इसे मिस कर देंगे) फिर भी यदि यह फिल्म चली तो अभिषेक के अभिनय की वजह से चलेगी। आज के समय का कोई अभिनेता अभिनय की उस बुलंदी को नहीं छू सकता जिसे अभिषेक ने सहजता से अभिनीत किया है गुरू में । फिल्म में विद्या बालन भी हैं एक मासूम से रोल में। पचास के दशक का फिल्मांकन जबर्दस्त है। यदि आप सपना देखते हैं तो यह फिल्म देख कर आइये, मुमकिन है कि आपको अपना सपना पूरा करना बहुत आसान लगने लगेगा और उसे पूरा करने की एक नयी हिम्मत भी आपको मिलेगी।

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गुरू: अनदेखे सीन

गुरू: अनदेखे सीन 2

गुरू : अनदेखे सीन 3

गुरू : अनदेखे सीन 4


धुंधलकों में छिपा सच
ओये गुरू……


यह भी है हमारा भारत

15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितनों को साफ पानी
यह एक विडंबना ही है कि पिछले 15 वर्षों में जहां हमारी अर्थव्यवस्था ने नयी नयी ऊंचाईयों को छुआ है वहीं इस अवधि में कृषि क्षेत्र लु्ड़कता चला गया। यह क्षेत्र इतनी बुरी तरह पिछड़ा कि इस वर्ष हमें रिकार्ड 60 लाख टन गैहूं आयात करना पड़ेगा। हमें बहुत जल्द जाग जाना होगा। कृषी क्षेत्र में सुधारों की तत्काल जरुरत है जिसमें भूमी सुधार, सिंचाई, किसानों को नयी तकनीक की जानकारी तथा ऋण शामिल है। इस पर तुरंत ध्यान न दिया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। साठ प्रतिशत आबादी जो कि कृषि पर आधारित है का हिस्सा अर्थ्व्यवस्था में लगातार घटता चला जा रहा है जिससे देश में अमीरी और गरीबी में दूरी बढ़्ती चली जा रही है क्योंकि सेवा क्षेत्र में हो रहे तेज विकास के कारण मध्य वर्ग बहुत तेजी से विकास कर रहा है। यह सच है कि आर्थिक सुधारों ने लाखों पढ़े लिखे भारतीयों को लाभ पहुंचाया है मगर अभी भी बहुत बड़े वर्ग तक इसका असर नहीं पहुंचा है। साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा शिक्षा इनके लिये सपना ही है। कुछ उदाहरण देखिये:

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प्राईमरी स्कूलों के केवल 25% टीचर ही ग्रेजुएट है।
केवल 28 % स्कूलों में बिजली है तथा आधे से ज्यादा स्कूलों में दो से ज्यादा टीचर या दो से ज्यादा क्लासरूम नहीं हैं।
56% ग्रामीण घरों में बिजली नहीं है।
1,20,000 गांवों को अभी बिजली का बल्ब देखना बाकी है।
उड़ीसा के 80% गांवों में बिजली नहीं है।
देश में टीबी, एच आई वी मरीज तो बढ़ ही रहे हैं, कुपोषन के शिकार बच्चे तथा महिलायें भी बढ़ रही हैं।
केवल 38% हेल्थ सेंटरों के पास ही पूरा स्टाफ है तथा केवल 31% के पास इलाज के लिये जरूरी सामान।
पीने का पानी एक चौथाई ग्रामीणों की पहुंच से बाहर है।
मुम्बई की 54 % आबादी स्लम में रह्ती है।

एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में जहां सूरज की रोशनी नहीं जाती क्योंकि घर एक दूसरे के इतने नजदीक बने है, जिसकी गलियों से आप बिना बांहों को सिकोड़े निकल नहीं सकते, जहां एक टायलेट को औसतन 1440 लोग इस्तेमाल करते हैं ऐसी जगह पर 10 X 10 की झोपड़ी का किराया 1500 रु महीना है।

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फिर भी लोग गांवों को छोड़ छोड़ कर शहरों को पलायन कर रहे हैं और इन स्लम्स पर और दबाव बना रहे हैं।

अब बताइये गरीब क्या करे? उन गांवों मे रहे जहां न रोजगार है, न बिजली है, न पानी है, न शिक्षा और न स्वास्थ्य या शाहरों में आकर इन स्लम्स में रहे?

चीन ने जब आर्थिक सुधार शुरु किये उससे पहले अपने हर नागरीक को रोटी कपड़ा और मकान दिया। हम जो शहरों में कमा रहे हैं उससे शहर भी नहीं सुधार पा रहे, गांवों की तो बात ही क्या।

अब बताइये, क्या हम सही जा रहे हैं?

(लेख के आंकड़े तथा चित्र बिजनेस टुडे के ताजा अंक से)

इस लेख का पहला भाग
15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल


15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितने मोबाईल

बिजनेस टुडे पत्रिका के ताजा अंक में 15 वर्षों के आर्थिक सुधारों पर विशेष सामग्री दी गई है। आर्थिक सुधारों का विस्तार से अध्ययन किया गया है तथा इसके सामाजिक असर को भी बखूबी उठाया गया है।
संभाल कर रखने लायक 282 पेज का यह अंक 15 रु का है। बिजनेस टुडे के इसी अंक से चुन कर कुछ मजेदार आंकड़े यहां दे रहा हूं:


इन 15 वर्षों में प्रति व्यक्ति आय 9193 रु से बढ़ कर 15357 रु हो गयी।
जीडीपी में कृषी का हिस्सा 28.52% से घट कर 17 % रह गया।
निर्यात 17856 मिलियन डालर से बढ़ कर 102725 मिलियन डालर हुआ।
जीडीपी विकास दर 1.3 % से बढ़ कर 8.4 % हुई।
विदेशी मुद्रा कोष 1.1 बिलियन डालर से बढ़ कर 156 बिलियन डालर हुआ
गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का प्रतिशत 38 % से घट कर 22 % हुआ।
मुद्रास्फीति 16.9% से घट कर 5.3% हुई।
शेयर बाजार पूंजी 90800 करोड़ रु से बढ़ कर 35,00,000 करोड़ रु हुई।
विदेशी निवेश FDI 133 मिलियन डालर से बढ़ कर 20243 मिलियन डालर हुई।
आईटी एक्सपोर्ट 250 करोड़ रु से बढ़ कर 105300 करोड़ रु हुआ।

देश में इस समय प्रति 1000 आबादी पर 18 कम्यूटर हैं।
देश में इस समय (अक्तूबर 2006 तक) 13.6 करोड़ मोबाईल, 11.2 करोड़ टीवी, 3.7 करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता, 6.8 करोड़ केबल कनेक्शन हैं।
देश में इस साल अप्रेल से नवंबर तक 53 लाख दोपहिया तथा 4.6 लाख कारें बिकीं।
इतने अच्छे अच्छे आंकड़े देख कर हो सकता है कि आप की आंखें खुशी से चमक उठी हों मगर यह केवल एक तरफ की सच्चाई है।

कल इस लेख के दूसरे भाग '15 वर्षों के आर्थिक सुधार- कितनों को साफ पानी' में लिखूंगा सामाजिक सच्चाईयां तथा किसानों एवम गरीबों का हाल। कितने लोग साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं तथा शिक्षा से अभी भी वंचित हैं क्योंकि इतना कुछ होने के बावजूद देश में 35 % लोग केवल 45 रु प्रति दिन की कमाई पर जीते हैं तथा अन्य 45 % केवल 45 रु से 90 रु की दिहाड़ी पर।

अपने बच्चे को जब हम पचास रु जेब खर्च देते हैं तो क्या कभी इस बात के लिये सोचते हैं?

मिलियन = 10 लाख
बिलियन = 100 करोड़ = एक अरब
डालर = लगभग 45 रु


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ओ मैडम जी बचाओ !

"नमस्कार दर्शको,
आज हमारे बीच हैं सरदार मन्नू भाई। आपको हमारा पिछली बार मूषकर जी का लिया हुआ इंटरव्यू तो याद ही होगा, उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम पेश कर रहे हैं सरदार मन्नू भाई जी से एक इंटरव्यू।"

"नमस्ते मन्नू जी"
"नमस्ते जी नमस्ते !"
"सबसे पहले आप यह बताईये कि आप लोगों ने वंदे मातरम को लेकर इतना बवाल मचाया मगर जब वंदे मातरम गाने का असली दिन आया तो आपकी टीम के सभी सदस्य गायब हो गये?"
"ओ मैं तो जी रोज ही वंदे मातरम बोलता रैंदा वां। जाब भी मैडम जी का फोन आंदा हैं मैं तां गुड मार्निंग या नमस्ते दी जगह वंदे मातरम ही बोलदा वां। (हाथ जोड़ कर, आंखे मूंदते हुए बोलते हैं) मैडम जी वंदे मातरम ! आखिर यह साब उनकी वजह से ही तो है। (फिर से भाव विभोर होते हुए) वंदे मातरम !"

"आप आजकल कम गिनती वालों के बारे में बहुत बात करते हैं, कभी रिजर्वेशन देने की बात करते हैं तो कभी रिसोर्सेस पर पहला अधिकार देने की बात करते हैं जबकी पचास सालों में आपकी टीम ने उनके लिये कुछ नहीं किया?"
"हुण वी असी कुज्ज नहीं कार रहे, हम तो सिर्फ कह ही रहे हैं। चुनावों ताक्क !"
"और चुनावों के बाद?"
"अगले चुनावों ताक्क इंतजार करेंगे फिर यही कुछ बोलने लगेंगे !"

"आजकल कुछ आर्थिक सुधारों पर गति नहीं आ रही है?"
"ओ जी मैं आपको अंदर दी गल दस्सां ! साडे मिस्टर पी दमड़ियम आपना लैपटॉप ले कर बांद कमरे विच पूरी सकीम बणा रहे नें। बजट तो पैलां कुझ नहीं दसना नहीं तो लाल झंडे वाले शोर मचाने लाग जान गे। "
"और यदि बजट के बाद उन्होंने शोर मचाया तो।"
"ओ ते जी मैडम जी संभाल लैणगे। बाकी थोड़ा कुछ बजट विच असी कोसमैटिक चेंज वी कर दयांगे। ओ वी खुश ते असी वी खुश।"

"दर्शको मन्नू जी से हमारा इंटरव्यू जारी रहेगा ब्रेक के बाद। ब्रेक पर जाने से पहले आपको बता दें कि हमारे अगले कार्यक्रम के लिये स्टूडियो में आ रहे हैं साहनिया जी और राहकुल जी । तो मिलते हैं ब्रेक के बाद।"

(ब्रेक के बाद)

"अरे मन्नू जी आप हाथ जोड़ कर खड़े क्यों हो गये?"
"तुस्सी तो हुणे केहा कि मैडम ते बाबा स्टूडियो विच आ रहे नें।"
"अरे नहीं नहीं मन्नू जी आप गलत समझ गये। हमारा अगला कार्यक्रम खेलों का है तथा उसमें टेनिस खिलाड़ी साहनिया भिड़जा तथा क्रिकेट खिलाड़ी राहकुल दिवारगिरी आ रहे हैं, आपके मैडम और बाबा नहीं।"
(बैठ जाते हैं, चेहरे पर थोड़ा चैन आता है मगर अब कुछ असहज हो गये हैं)

"अच्छा आपने जो मिस्टर खुश के साथ नो क्लियर डील की उसके बारे में कुछ बताइये।"
"............!" (अनसुना कर देते हैं)

"आपको कैसे लगा कि चूहों को पकड़ने में मूषकर जी हमारी सयाहता करेंगे?"
"............!"(बगलें झांकने लगते हैं)

"निठारी के उत्तम प्रदेश में अगर हालत इतने ही खराब हैं तो आप अपना हाथ वहां से खींच क्यों नहीं लेते?"
"............!" (कुछ कुछ घबराने लगते हैं)

"एसइजेड पर मचते शोर तथा किसानों की आत्महत्यांओ पर....?"
."............!" (रुआंसे से हो जाते हैं)

"लोगों को मॉल और मोबाइल चाहियें या पानी और बिजली....?"
(जोर से बिफर पड़ते हैं) "ओ मैडम जी बचाओ ! मैणूं कित्थे फंसा दित्ता......... !"




पूर्व में लिये गये इंटरव्यू
मूषकर जी का इंटरव्यू


अच्छे चिट्ठाकारों के गुण

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ब्लागिंग के बारे में वर्डप्रैस वालों का एक लेख पढ़ा। मुझे अच्छा लगा और लगा कि इस लेख से बहुत कुछ सीखा जा सकता है तो यहां उसके मुख्य बिंदुओं को हिंदी में लिख रहा हूं। मूल अंग्रेजी लेख आप यहां पढ़ सकते हैं।

1. अच्छे चिट्ठाकार अपने पाठकों की इज्जत करते हैं। वे आपको यूं ही नहीं समझते। वे आपकी टिप्पणियों का जवाब देते हैं। वे अपने वादे पूरे करते हैं और यदि कोइ वादा पूरा न कर पायें तो इसका कारण अवशय बताते हैं। (मैं निजी तौर पर ऐसी जगहों पर टिप्पणी करने से हमेशा बचता हूं जहां कभी इस आशय की चेतावनी लिखी हो कि कोई मेरे विचारों के विरूद्ध यहां टिप्पणी न करे)।
2. अच्छे चिट्ठाकार आपको अपनी पहली लाईन में ही अपनी ओर खींच लेते हैं। थोड़े से कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाईये, आप भी यह कर सकते हैं। इस प्रकार से शुरुआत कभी मत कीजिये: माफ कीजिये मैं बहुत दिनों से व्यस्त था, कुछ लिखने को ही न था, मेरे पास क्या चिट्ठा लिखने के अलावा कुछ काम नहीं ? क्या लिखूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा ! अच्छे चिट्ठाकार के पास हमेशा आपको कुछ कहने के लिये होगा और यही आपको पढ़ने पर मजबूर कर देगा।
3. अच्छे चिट्ठाकार अपनी भाषा के जानकार होते हैं, उनकी भाषा स्पष्ट और सीधी तथा व्याकरण सधा होता है। अपनी भाषा से ही वे समझदारी की झलक देते हैं।
4. अच्छे चिट्ठाकार खुले दिल के होते हैं। वे जानते हैं कि हर चिट्ठे का अपना एक स्थान है। जो चिट्ठे उन्हे अच्छे लगते हैं वे उनका लिंक अपने चिट्ठे पर देते हैं, बिना यह देखे कि दूसरा चिट्ठा उनसे छोटा है या बड़ा। नया या पुराना।
5. अच्छे चिट्ठाकार हमेशा कुछ नया सीखते रहते हैं। वे दूसरों के चिट्ठे पढ़ते हैं और उनसे सीखते हैं। वे नयी और अच्छी पुस्तकें पढ़ते हैं। कई बार आप जो पुस्तक पढ़ते हैं उसी तरह से लिखने भी लगते हैं। वे नया सीखने और नया करने को हमेशा तत्पर रहते हैं।
6. अच्छे चिट्ठाकार जानते हैं कि वे एक चिट्ठा समूह के सदस्य हैं। वे इस समूह में दूसरों की मदद करते हैं। नये लोगों का स्वागत करते हैं, उनका उत्साह बढ़ाते हैं तथा उनकी सहायता करते हैं।

तो भाइयो यह तो था दूसरों का लिखा लेख जिसका मैंने हिंदी में अनुवाद किया। शीघ्र ही यह लिखूंगा कि क्या क्या करने से 'आईना' पर लगने वाले हिट्स की संख्या बढ़ी। तब तक आप भी बताइये ना कि नारद के अलावा कहां से आते हैं आपके पास ज्यादातर हिट्स और कैसे किया आपने इसका जुगाड़ तथा आप के पास क्या सुझाव हैं अच्छे चिट्ठाकार बनने के लिये?


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वर्डप्रैस पर उभरता 'आईना'

कल यानि 6 जनवरी 2007 को 'आईना' वर्डप्रैस के सभी भाषाओं के 5.75 लाख चिट्ठों में उभरते चिट्ठों यानि "Blogs of the day- growing blogs" में 69 वें नंबर पर था। सभी 'आईना' पढ़ने वालों को धन्यवाद।


पुनर्जन्म हो यदि मेरा !

आपने अमिताभ जी को उत्तरप्रदेश के लिये एक विज्ञापन में बोलते हुए देखा होगा। यदि यही विज्ञापन उन बच्चों में से कोई बोलता जो नोएडा के निठारी गांव में दरिंदों द्वारा मारे गये तो शायद कुछ यूं बोलता:



पुनर्जन्म हो यदि मेरा
न कभी हो यमुना के तट पर
नोएडा शहर की माटी पर
हड्डियां दबी हैं सड़कों पर
जान के दुश्मन लपक पड़े
काम पे जाते लड़कों पर
पढ़ने जाती हर लड़की पर
निठारी के आंगन और खिड़की पर
हड्डियां नाली और सीवरों पर
बच्चों के बिकते लिवरों पर
कितनों का आंगन उजड़ गया
एक काला सूरज निगल गया
पुनर्जन्म हो यदि मेरा
न कभी हो यमुना के तट पर


इमेज में लिखी हिंदी को एडिट करने वाला साफ्टवेयर

पिछले दिनों फुरसतिया जी ने लिखा था कि क्या कोई ऐसा साफ्टवेयर या जुगाड़ नहीं है जिससे इमेज से टेक्स्ट को अलग कर सकें जिससे टाईपिंग का झंझट खत्म हो सके? आज जब नेट पर कुछ सर्च कर रहा था तो पता चला कि इस तरह के प्रोग्राम को OCR (Optical Character Recognition) कहते हैं। जब मैंने हिंदी के ओसीआर कि खोज की तो अपने भारत सरकार की साईट पर बहुत से काम के साफट्वेयर मिले जिनमें हिंदी ओसीआर भी मिल गया। हो सकता है कि पुराने चिट्ठाकारों को इसकी जानकारी भी हो।
इस प्रोग्राम में किसी भी इमेज में शामिल हिंदी टेक्स्ट को अलग करके टेक्स्ट फाईल में सेव कर सकते हैं। मैंने इसे डाउनलोड कर के चलाया तथा एक रागदरबारी के पेज से टेक्स्ट को अलग भी किया मगर नतीजे में जो नजर आ रहा है वह ठीक नहीं है। क्या कोई भाई इसके आगे का तरीका जानता है जिससे वाकई टाइपिंग के झंझट से छुटकारा मिल सके?


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समझो हो ही गया.....

ऐ भाई
भाई बहुत खुश लग रह हो भाई
बात क्या है
ऐ भाई हुआ क्या- २
ऐ भाई बोल न यार हुआ क्या

कार्ड छपवा ले
ऐ भाई हुआ क्या
सूट सिलवा ले
समझो हो ही गया
बोला न
समझो हो ही गया - ३
ऐ भाई रिवर्स में काहे को स्टोरी सुना रहा है ये स्टार्टिंग से सुना ना तुम बिलाग बनाके क्या बन गया?
अरे बिलाग मत पूछ यह पूछ कि चिट्ठा बनाके क्या बन गया?

क्या बन गया भाई?
अरे उदीयमान चिट्ठाकार बन गया यार....
ऐ भाई साईड्कार सुना, कलाकार सुना, बेकार सुना, डकार भी सुना
ये चिट्ठाकार क्या होता हैं?

अरे जो चिट्ठा लिखते है यार
तरकश पर चुन रहे उदीयमान चिट्ठाकार
टाप टेन में आया अपना भी नाम यार
भाई कम्प्यूटर पर हिंदी लिखना भोत मुश्किल है
कैसे मैनेज किया?

अरे अक्षरग्राम पर जा के इक चटका जब लगाया
मुझको चिट्ठा लिखने का आईडिया फिर आया
वंदेमातरम का आईना पर पोस्ट इक लगाया
अरे भाई तू तो जीनियस है
फिर क्या हुआ?

कभी टिप्पणी इधर कभी टिप्पणी उधर
समीर भाई बोला इतने साल थे किधर
ऐसे हो गया भाई?
अरे समझो हो ही गया
समझो हो ही गया -२
उसके बाद तुम चिट्ठे पर क्या लिखा कविता?
नही रे
जैपनिस हाईकु?
नही रे मुन्ना सर्किट की कहानी
मुन्ना सर्किट काहे कु
मुन्ना सर्किट का किस्सा
मैने आईना पर जब सुनाया
आईना हुआ पापुलर हर कोई पढ़ने आया
भाई फिर क्या हुआ?
सब ने किया शोर
बोले लिखो थोड़ा और
किस्सा पसन्द आया मामू लिखो वन्स मोर
अरे भाई तेरे को मामु बोल डाला फिर क्या हुआ?
प्यार से सब ने मुझको ऐसे गले लगाया
क्या बताऊं सरकिट अरे कितना मजा आया
अरे समझो हो ही गया
समझो हो ही गया -२
तो भाई दे रहे हो न वोट?


नव वर्ष मंगलमय हो

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नव वर्ष पर लिखे गये
वर्ष 2007 होगा भारत का
ओये गुरू……