गुलजार साहब का 'झूम बराबर झूम' और 'टिकट टू हॉलिवूड'

गुलजार साहब जब गीत लिखते हैं तो कई बार बोल पकड़ में नहीं आते। खास कर जब संगीत ए आर रहमान या शंकर एहसान लोय का हो।


गुलजार साहब कभी कभी सीधे से वाक्य में पंजाबी का शब्द ऐसे फिट कर देते हैं कि कई बार पूरे वाक्य का अर्थ समझ में नहीं आता है।


कई बार दिल किया कि इस तरह के वाक्यों को गीतों के बीच से एकत्र कर उनके अर्थ लिखे जायें। आप सब से अनुरोध है कि इस तरह के वाक्य सुझाएं जो गुलजार साहब के गीतों में आते हैं मगर आप हमेशा यही सोचते रहे कि इनका अर्थ क्या है। आज  यहां नीरज भाई की फरमाइश पर गुलजार साहब का नया गीत 'झूम बराबर झूम' दे रहे हैं।


ओ आजा आजा रब्बा इश्के दी खोल गुत्थियां



घाट्ट ना मुनाफे अनमोल गुत्थियां

ते लागी लागी जो लगावे ना लगे आशिकी


उड़ती उड़ती अखियों के लड़ गये पेचे लड़ गये वे


गीत लगा के झूम झूम झूम



झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम
झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम

कब लगे कहां रब्ब जाने


जब लगे जहां सब जाने, रब्बा....



रब्बा हर चोट मजा देती है
जीने की सजा देती है, रब्बा..

झूठी मूठी बातें सुनके
गुनगुनाती आंखे सुनके

जलावे बुझावे, बुझावे जलावे ओये मोमबत्तियां


उड़ती उड़ती अखियों के



लड़गये पेचे लड़ गये वे
गीत लगा के झूम झूम झूम

झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम


झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम



ये इश्क पुराना पापी
हर बार खता करता है, रब्बा....

हर बार बचाता हूं मैं
हर बार ये जा मरता है, रब्बा....

हो पास कोई आ गया तो
रास कोइ आ गया तो

बार बार कल्रेजे पे ना मार अखियां


उड़ती उड़ती अखियों के



लड़ गये पेचे लड़ गये वे
गीत लगा के झूम झूम झूम

झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर


ओ आजा रब्बा इश्के दी खोल गुत्थियां



घाट्ट ना मुनाफे अनमोल गुत्थिया
ते लागी लागी जो लगावे ना लगे आशिकी

उड़ती उड़ती अखियों के



लड़ गये पेचे लड़ गये वे
गीत लगा के झूम झूम झूम

झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम


झूम बराबर झूम बराबर झूम बराबर झूम


यहां इन पंक्तियों को देखें


ओ आजा रब्बा इश्के दी खोल गुत्थियां



घाट्ट ना मुनाफे अनमोल गुत्थिया
गुत्थी थैली को कहते हैं, इश्क की थैली खुलती है तो घाटा नहीं होता मुनाफा ही मुनाफा है क्योंकि यह थैली अनमोल है।

इस गीत को यहां सुन सकते हैं।


अब इसी फिल्म के एक और गीत के कुछ शब्दों की ओर ध्यान दीजिये अंग्रेजी हिंदी और पंजाबी का क्या तड़का लगाया है


ओस में घोली मिंट की गोली निरी खुशबू बीबा


कन्नी से काटे मांझे की डोरी


काटेगी तूं बीबा


औना पौना ही सही


दिल का कोना ही सही


लौटा दे मेरा टिकट टू हालीवूड


जमीं से दो इंच ऊपर


हवा पे चलती है तूं


कहीं पैरों का निशान जो पड़े तो झुकूं


शहर के उस मोड़ पर


जहां से तूं पास हो


कहे तो मैं जिंदगी भर वहीं पे रुकूं


लौटा दे मेरा टिकट टू हालीवूड....


 पूरा गीत यहां सुन सकते हैं।





13 comments:

नीरज दीवान June 5, 2007 3:30 AM

धन्यवाद जगदीश भैया.. बहोत बहोत शुक्रिया.. मुझे यह गीत पसंद आया.. अच्छा होता कि यशराज फ़िल्म्स को सदबुद्धि आए और दलरे मेहंदी की आवाज़ में यह गीत सुनने मिले.

रहमान और शंकर-लाय-एहसान को खूब कसरत करनी पड़ती है फोक म्यूज़िक पर.. इसके उलट विशाल भारद्वाज ऐसे संगीतकार हैं जो गुलज़ार साहब के बोलों को बढ़िया तरीक़े से सुर देते हैं.. झूम बराबर झूम, कजरारे तेरे नैना, बीड़ी जलइले, मितवा, सलाम करने की आरज़ू .. जैसे कमर्शियल हिट्स देने में गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे निष्णात प्रतिभा के धनी इन दिनों बाज़ारोन्मुखी हो गए हैं.. जिस वजह से उनकी ग़ज़लो में तरावट दिख नहीं रही है.. पिछले पांच सालों से अकाल सा पड़ा है बढ़िया नज़म और ग़ज़लों का.. हालांकि दोनों गीतकार कमर्शियली हिट हो रहे हैं किंतु इस भागदौड़ में उनके ख़्यालात अब मासूमियत न रख पाए.. अच्छा होगा कि वे कुछ आराम कर लें. ये दोनों बेहद रचनात्मक लोग हैं.. दोनों ने साबित किया है कि उनसे बेहतर होने में बाक़ियों को लंबी जुगत लगानी होगी.. प्रसून जोशी मुझे आगे आते दिख रहे हैं.. विशाल तो खुद गीतकार भी है.. दुआ करेंगे कि अब जावेद और गुलज़ार कुछ अरसे आराम करें और महज़ ऊर्दू अदब तक सिमट जाएं.

yunus June 5, 2007 1:34 PM

अच्‍छा लगा गुलज़ार के ये बोल पढ़कर । अगर आप लिखते नहीं तो हमारी समझ से बाहर की बात थी । हां नीरज की ये बात शायद अर्धसत्‍य है कि गुलज़ार और जावेद साहब कमर्शियली हिट हो रहे हैं लेकिन ग़ज़ल या नज्‍में अच्‍छी नहीं दे रहे । दरअसल मौक़े कहां हैं आजकल फिल्‍मों से हटकर कुछ अच्‍छा देने के । बहरहाल फिर कभी इस विषय पर चर्चा होगी । नीरज जी मुझे थोड़ा सा संशय हो रहा है । विशाल गीतकार कहां हैं, वे तो सिर्फ संगीतकार और निर्देशक हैं । हां एकाध गीत लिख डाला हो तो अलग बात है, वरना वो तो गुलज़ार से ही लिखवाते हैं । एक बात और कहने की इच्‍छ हो रही है, गुलज़ार ने फिल्‍म ओंकारा में दो तीन नॉन कमर्शियल और बेहतरीन गीत दिये हैं । जिनमें से एक है लक्‍कड़, दूसरा नैनों की मत मानियो नैना डस लेंगे और तीसरा है जग जा अरी जग जा । और चौथा ओ साथी रे । इन गानों को बीड़ी जलईले और नमक जैसे गानों की लोकप्रियता खा गई । थोड़े बौद्धिक थे ये गीत । मनीष के चिट्ठे पर इन गानों की बात की गयी है ।

पंकज बेंगाणी,  June 5, 2007 2:31 PM

नीरज दादा की बात से पुरा सहमत नही हुँ.. मुझे नही लगता कि बढती हुई व्यवसायिकता से गुलजार जैसे महान फनकार की लेखनी में कोई फर्क आया होगा.


आपकी बात सही है कि अमुमन गुलजार के लिखे गीत पहली दुसरी बार सुनने पर समझ नहीं आते.. लेकिन देर से ही सही जब भी समझ में आते हैं तब एक ही शब्द मुँह से निकलता है - वाह!!

Rajesh Roshan June 5, 2007 5:19 PM

पहले तो जगदीश जी का शुक्रिया । उन्होने गाने के बोल जो लिख के दिए । वैसे मैं भी नीरज जी कि बातो से सहमत नही हु । गुलज़ार ने जो भी लिखा है अपने हिसाब से या फिर फिल्म में गाने के situation के हिसाब से । साथिया, ओंकरा, दिल से में उन्होने जो गीत लिखा है वो लोगो ने हाथो हाथ लिया है । फिल्म जानेमन के गाने भी बडे अच्छे हैं । मरासिम आज भी मेरे पसंदीदा ग़ज़ल अल्बम में से एक है । :)

Amit June 5, 2007 5:56 PM

मैं नीरज भाई से सहमत भी हूँ और नहीं भी, मतलब पूर्ण रूप से सहमत नहीं हूँ। कुछ गीतों में लगा कि गुलज़ार साहब ने अपनी क्वालिटी गिरा दी लेकिन फिर एकदम से ही अगले गीतों में क्वालिटी वापस अपने स्तर से ऊपर। अब उतार-चढ़ाव तो आते रहते हैं, इसलिए ये नहीं कह सकते कि बज़ारवाद के चलते गुलज़ार साहब के गीतों का स्टैन्डर्ड डाउन हो गया है।

sajeev June 5, 2007 6:01 PM

सब से पहले तो धन्येवाद जगदीश का इन दोनो गीतों के सुन्दर शब्दों को सब तक पहुँचाने का ... नीरज जी की बातो से मैं भी सहमत नही , गुलज़ार साब ही हैं जिन के कारन आज भी इन गीतों में इतना शब्द सौदर्य नज़र आता है। ओम्कारा के जिन गीतों का यूनुस जी ने जिक्र किया है वो किसी बहतरीन साहित्यिक रचना से कम नही है। फिल्मी गीत्कारी बेहद मुश्किल काम है, बहुत से व्यवसायिक बातो का ध्यान रखना पड़ता है ऐसे में गुलज़ार जी और जावेद जी को साहित्यिक दायरों में सीमित रखने की बात नही जच्ती ..... हाँ , प्रसून और स्वानंद अच्छा लिख रहे हैं...और बहुत जल्द ये नाचीज़ भी अपने गीत लेकर आप तक आयेगा

नीरज दीवान June 6, 2007 12:53 AM

बहस मेरी ही टीप पर छि़ड़ी है तो मुझे प्रतिटीप का अवसर देख रहा हूं..

मेरा साफ़ मानना है कि हरेक प्रतिभा को अपने दोहराव से बचना चाहिए. लंबी दौड़ के बाद कुछ पल विराम मौलिक विचारों को जन्म देता है.. नदी की तरह विचार प्रवाहमान होने चाहिए.. ना कि तालाब की तरह एक जगह जमकर बैठा जाए. मेरा दो महान गीतकारों से सिर्फ़ इतना अनुरोध था कि कुछ हफ्तें लेखनी को विराम दें.

मैंने यह कहां कहा कि दोनों गीतकार फिल्मी गीत का स्तर गिराने लगे हैं.. वे अपने मयार से नीचे नहीं आए हैं.. यक़ीनी तौर पर वे बेहतर फ़िल्मी गीत दे रहे हैं. ज़ाहिर है झूम बराबर झूम के इस गाने की फ़रमाइश तो मैने ही की थी.. तो क्या आपको लगता है कि मैं इनके गीतो में गिरता स्तर देख रहा हूं???

मेरा आशय ग़ज़ल को लेकर था.. तरकश की कुछ रचनाएं संगम में सुनीं थी.. उसके पहले सिलसिला एलबम में मैने जावेद अख़्तर को सुना.. इसी तरह गुलज़ार साहब के मरासिम में जो बात थी वो नए एलबम में कहा है.. मेरी चिता फ़िल्मी गीतों से बाबस्ता नही है.. मैं ग़ज़लों की दुनिया में तरावट का इंतज़ार कर रहा हूं..

समीर लाल June 6, 2007 8:03 AM

जगदीश भाई, गीत समझाने के लिये आभार..हम इस रुप में कभी न समझ पाते.

Manish June 6, 2007 4:54 PM

झुम बराबर झूम का टाइटल गीत कुछ झूम पैदा करता है पर बाकी एलबम मुझे कुछ खास जंचा नहीं अब तक। बहुत शुक्रिया गीत के बोलों को हमारे सामने रखने के लिए।

DR PRABHAT TANDON June 10, 2007 11:38 AM

मै भी यूनूस भाई से सहमत हूँ , इस दौर मे गीत लिखे नही जबरन अपनी मरजी से लिखवाये और गवाये जाते हैं तो इन कलाकारों का दोष उतना नहीं दिखता .

Himanshu kakkar,  July 17, 2007 5:45 PM

Hi Jagdish, i do agree with you that it is at times difficult to understand the words in Gulzar's lyrics for some people...... but i love it. I come from a punjabi family, so for me it is not that difficult.... .....But I would say, he is not only expert in using Punjabi words but all the folk languages prevailent in Punjab, Himachal, Jammu, and recently used UP's folk words in songs of Omkara as well......... so hats off to him......Aapko pata hoga ki Maachis ke songs mein Gulzar saab ne Dogri language use ki thi......... he is definitely a genious..........His daughter was telling in an interview that even today he regularly writes for 4 hours a day......... its amazing.........

आइये समझें गुलजार को : मैंडा यार मिला दे…. « आईना July 20, 2007 3:07 AM

[...] गुलजार साहब का ‘झूम बराबर झूम’ और ‘टिक... [...]

विकास,  September 8, 2007 2:45 AM

गुलज़ार के अनमोल गीत के बोल समझाने के लिए धन्यवाद

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