क्षेत्रिय चिट्ठाकारिता पर इंडियन एक्सप्रैस में
>> Apr 8, 2007
क्षेत्रिय चिट्ठाकारिता पर आज के इंडियन एक्सप्रैस के दिल्ली संस्करण में एक लेख छपा है।
पढ़ने के लिये इमेज पर क्लिक करें।
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9 comments:
समाचार पढ़कर तो अच्छा लगा मगर क्षोभ भी हुआ कि हिन्दी भाषा को रीजनल भाषा कहकर ये इंडियन एक्सप्रेस वाले चिल्ला रहे हैं और आश्चर्यजनक रूप से हम अपना सीना भी चौड़ा कर रहे हैं। अरे यार! कुछ भी हो छपे तो! उधर अमर उजाला नई हिन्दी (हिंगलिश) को बोलने के अनुसार वैश्विक रूप से नं॰ १ बनाने के फ़िराक में हैं, इधर रश्मि कुमार ने इसे हाशिए पर रख दिया। वाह मीडिया वाह!
पता नहीं कि हंसू या रोऊं - हिन्दी रीजनल भाषा है भगवान का शुक्रिया कि हम अखबार वालों जितने ज्ञानी न हुए।
हाँ स्कैन की गई इमेज उपलब्ध कराने का बहुत शुक्रिया जगदीश भाई। इसका लिंक सर्वज्ञ पर डाल दिया है। आपसे अनुरोध है कि आगे भी ऐसे लेखों की इमेज उपलब्ध करवाते रहें और सर्वज्ञ पर ब्लॉग वाले पन्ने पर इस सैक्शन में डाल दें।
सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि मुख्यधारा के मीडियाकर्मियों से हर किसी विषय पर लिख देने की अपेक्षा उनके संपादक करते हैं। रश्मि ने जब मुझसे देर रात संपर्क किया था तब वे डेडलाईन की वजह से ये लेख जल्द से जल्द लिखना चाहती थीं, उन्होंने मुझे ईमानदारी से ये भी कहा कि विषय सुझा कर उन्होंने अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली चुंकि संपादकजी ने रविवार के लिये ही लेख माँग लिया। इस जल्दबाज़ी में ज़रूरी तथ्यों का दरकिनार हो जाना आश्चर्य की बात नहीं। लेख में नारद का पता ग़लत लिखा है, यानि लेखिका साईट पर गईं तक नहीं, ईंडीब्लॉगिज़ का शुरु होना २००४ में लिखा है जबकि सही वर्ष है २००३, हिन्दी के बाद कन्नड़ के सर्वाधिक भाषाई ब्लॉग बताये गये जबकि हम सब जानते हैं कि जब हिन्दी के जमा ५ ब्लॉग थे तब ही तमिल के २५० ३०० चिट्ठे बन चुके थे, मराठी भी काफी आगे है। मैंने अपने कहे और लिखित जवाब में भारतीय भाषा के चिट्ठों के लिये ईंडिक ब्लॉग शब्द का प्रयोग किया और ईंडीब्लॉगिज़ पर तो हम हमेशा ये शब्द ही इस्तेमाल करते हैं पर चुंकि लेख ही क्षेत्रिय चिट्ठों के हिसाब से बनाना था तो शब्दों में बदलाव मैं भी नहीं ला पाया, खैर ये उम्मीद करना बेमानी है कि छोटे से लेख में वे मेरी सारी बताईं बातें छापतीं।
मेरा अब ये स्पष्ट विचार बन चुका है कि जब तक ये लेख समुदाय का ही कोई व्यक्ति न लिखे तथ्यात्मक त्रुटिहीनता की अपेक्षा रखना ज्यादती होगी। हमें बस यही सोच कर संतोष करना चाहिये कि ज़िक्र तो हुआ।
ईपेपर से लिया लेख का चित्र भी मैं फ्लिकर पर रख रहा हूं।
हिन्दी क्षेत्रिय भाषा!!
कोई बात नहीं भाषा तो माना :)
धन्यवाद भाटीयाजी.
इन पत्रकारो को ज्यादा कुछ पता नही है, और वे पता करना भी नही चाहते. यहाँ के स्थानीय समाचार पत्रो मे आजकल गुजराती चिट्ठाकारीता पर लेख आते रहते हैं.. उनमे कभी तरकश को गुजराती ब्लोग बता दिया जाता है.. क्या करे इनका अब . ;-)
इमेज है ही नहीं तो फिर किलक कहां करें ;(
कृपया इसको मेल करदें तो साहब आपकी मेहरबानी :)
अब क्या कहें..!! :)
मैं राजस्थानी भाषा पर अपना लिखा लेख भेजना चाहता हूं कोई वेब ब्लॉग इसे दिखाएगा
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