वर्ष 2007 होगा भारत का

आइये 2007 का स्वागत करें भारत की चमकती हुई तस्वीर से। आने वाले साल का स्वागत किया है आज के इकानामिक टाइम्स ने पक्के तौर पर समय हमारा है की उद्घोषणा के साथ। लेख में लिखा है
जिस तरह से आगे बढ़ते हुए अरबों डालर के सौदे हमारी कंपनियां कर रही हैं और अपने ब्रांडों की पहुंच को दुनिया भर में हर ओर फैला रही हैं हैरान न हों यदि विश्व बाजार के प्रतीक टाईम स्क्येर पर केवल भारतीय ब्रांड ही चमकते दिखायी दें।

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स्वामिनाथन अय्यर के इस लेख में आगे लिखा है कि एक समय था जब दुनिया भर में भारत अव्वल नंबर था - भुखमरी में, खाद्य सहायता मांगने में, विदेशी सहायता मांगने में और ट्रांसप्येरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार - रिशवत देने में भी। पर अचानक, दो दशकों तक कुछ और राग अलापने वाले क्रेडिट सुइस जैसे विश्लेषक अब कह रहे हैं कि भारत जो कि चीन के बाद विकास गति में दूसरे नंबर पर है 2007 में चीन को पीछे छोड़ पहले नंबर पर आ जायेगा। एक देश जिसकी पहचान एक ऐसे कूंएं की तरह थी जहां जितनी भी सहायता भेजी जाये उसे पाटना मुश्किल था वही देश आज दुनिया भर में विकास की गति में सबसे आगे खड़ा है।

आज विश्व की अर्थव्यवस्था बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। विकासशील देशों की औसत विकास दर 7% है। अफ्रीका भी पिछले चार सालों से औसतन 5.3% की दर से विकास कर रहा है। ऐसी तेजी में 8-9% की विकास दर इतना मायने शायद नहीं रखती मगर भारत अब विश्व अर्थव्यवस्था के केंद्र की ओर बहुत तेजी से बढ़ रहा है और वैश्विकरण का महत्वपूर्ण भागिदार भी है। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है।

पिछले तीन वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले हमारे निर्यात का अनुपात 14.6% से उछल कर 20.5% हो गया है। दुनिया के व्यापार में हमारे निर्यात की हिस्सेदारी दोगुना हो कर 0.5% से 1% हो गयी है। विश्व भर में सेवाओं के निर्यात (इसे BPO पढ़ें) में हमारा हिस्सा भी केवल दो वर्षों में दोगुना हो कर 2.5% पर आगया हैं। भारत के लोग युरोप और अमेरिका के लोगों से लाखों की संख्या में नौकरियां छीन लेंगे यही सोच कर वहां के नेताओं की आंखें भी पत्थरा रही हैं।

यही नहीं अगर डालरों में गणना करें तो भारतीय सकल घरेलू उत्पाद पिछले तीन सालों में 16% प्रति वर्ष की जबर्दस्त तेजी से आगे बढ़ रहा है (क्योंकि डालर के मुकाबले रुपया मजबूत हो रहा है)। यदि यही विकास दर रही तो भारतीय अर्थव्यवस्था केवल 22 सालों में अमेरीकी अर्थव्यवस्था की बराबरी कर लेगी जो होगी 11 ट्रिलियन डालर।

तो तैयार हो जाइये 2007 में भारत को विश्वभर में सबसे तेज गति से विकास करते हुए देखने के लिये।


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ओये गुरू......

अनूप जी ने एक बार चिट्ठाचर्चा में लिखा था

सबेरे से बांचते रहे अखबार
चवन्नी भर सरक गया इतवार


आप सब के चिट्ठे बांचते बांचते और अपना लिखते लिखते पूरा 2006 साल ही सरक गया। आज जब साल 2006 जा रहा है तो सोचा पूरे साल के घटनाक्रम पर एक नजर डाल ली जाये। मगर कुछ याद ही नहीं आता कि 2006 में ऐसा उल्लेखनीय क्या क्या हुआ। थक कर अखबार टटोला और कुछ न्यूज चैनल देखे तो पता चला कि 2006 में क्या क्या उल्लेखनीय हुआ। मीडिया बता रहा है कि 2006 में मीका ने राखी को 'किस' कर दिया। 'बिग बॉस' में किन्हीं आर्यन और अनुपमा का कोइ लफड़ा हो गया और इसी साल में रामू ने डिसाईड कर लिया कि अपनी शोले में वे गब्बर किसे बनायेंगे और बसंती किसे बनायेंगे। सुंदरी भैंस के गुम होने जैसी अनेक घटनायें इस वर्ष में घटीं। इसके अलावा पूरा साल सामान्य रूप में गुजर गया।

हमेशा की तरह मनमोहन सोनिया की सुनते रहे और मिमियाते रहे। हमेशा की तरह राहुल बड़ी जिम्मेदारी को तैयार दिखे। मगर हमेशा की तरह कोई बड़ी जिम्मेदारी ले नहीं पाये। आडवानी प्रधानमंत्री बनने को उछलते रहे और हमेशा की तरह जोशी उनकी टांग खींचते रहे। हमेशा की तरह अटल आडवानी के साथ खड़े रहे। लालू घोटालों में बचते रहे। कम्यूनिस्ट अपना दबाव बनाते रहे मगर वित्त मंत्रालय अपना काम करता रहा। आम आदमी सपने देखता रहा और पिछड़ता रहा। पूंजीवाद समाजवाद का रूप लेकर सिंगूर में खून बहाता रहा। विदर्भ में किसान मरते रहे और मुम्बई में कुत्तों के वास्ते खाने के डिब्बों की सप्लाई की शुरुआत हुई। सामान्य तौर पर मंत्रियों, सांसदों और अभिनेताओं तथा बड़े लोगों पर मुकदमे चलते रहे और उन पर फैसले आते रहे। आतंकवादी कांड करते रहे और हमारे प्रधान मंत्री आतंकवाद रोकने के लिये पाकिस्तानी राष्ट्रपति से ही साझा कार्यक्रम बनाने का समझौता कर आये। इराकी मरते रहे और तेल के दाम चढ़ते रहे। मोबाईल हजार रुपये में मिला तो दालों की कीमत साठ रुपये और पैट्रोल पचास रुपये में बिकता रहा। प्रापर्टी के दाम हर सांस पर चढ़ते रहे और किसानों के खेत छिनते रहे। नये मॉल बनते रहे और दिल्ली में दुकानों पर सीलिंग होती रही। इस वर्ष कि शुरूआत से हमारे घर के पास से मैट्रो चलना शुरू हुई मगर दिल्ली वाले हमेशा की तरह बिजली और पानी को तरसते रहे


यूं तो समय से बड़ा कोई गुरू नहीं मगर यह साल रहा कुछ गुरूओं के नाम।

सबसे पहले गुरू शीबू सोरेन जिन्हें उनके जानने वाले गुरूजी कहते हैं। देश के इतिहास में पहली बार कोई मंत्री ह्त्या का दोषी पाया गया। पता चला है कि अब गुरू जी तिहाड़ में दूसरे कैदियों को पढ़ा रहे हैं। इसके बाद संसद में जब बीजेपी वाले चिल्ला चिल्ला कर कह रहे थे "प्रधान मंत्री जवाब दो कितने मंत्री खूनी हैं?" एकदम उसी समय कोर्ट से एक फैसला आया जिसमें बीजेपी के अपने सांसद सिद्धू गैर इरादतन हत्या के दोषी पाये गये। सिद्धू भी बात बात पर "ओये गुरू......" कहने के लिये जाने जाते हैं।

क्रिकेट में गुरू हैं गुरू ग्रेग। पूरा 2006 निकल गया प्रयोग करते करते । नतीजे शायद 2007 में आयेंगे।

एक और अपने गुरू हैं रामदेव। वादों और विवादों में दवाओं के दावे और इलाज के वादे करते रहे। वृंदा कारत से लेकर रामदौसा तक से पंगे लिये।

एक हैं अफजल गुरू। रमन जी ने बताया कि यह गुरू नहीं गूरू है। जिस दिन मैं काबुल एक्सप्रैस फिल्म देख कर आया और लिख रहा था कि हमें हर आदमी के अंदर छिपे मानवीय चेहरे को देखना चाहिये उसी वक्त एन्डीटीवी पर चलते एक सीडी में यह गुरू अपने सारे दोष स्वीकार कर रहे थे और स्वंय ही अपने उन हिमायतियों को सबक दे रहे थे जो 'अनफेयर ट्रायल' की बात करके अफजल को माफी देने की मांग कर रहे थे।


एक और गुरू की बात करना चाहूंगा जो शायद अब हम अगले साल ही देख पायेंगे। जी हां मैं मनीरत्नम की फिल्म 'गुरू' की बात कर रहा हूं। ओंकारा के बाद यदि 2006 में मैंने कोइ संगीत सुना है तो वो है 'गुरू' का संगीत। जैसा ट्रेलर्स में देखा है उससे लगता है कि यह फिल्म अभिषेक के लिये वही कर सकती है जो जंजीर ने अमिताभ के लिये किया।


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गुरू में अभिषेक




आखिर में मैं एक और गुरू का जिक्र करना चाहूंगा। वो हैं हम सब के प्रिय समीर लाल जी। वर्ष 2006 में उन्होंने चिट्ठा जगत में प्रवेश किया और छा गये और तब से लेकर हमारे दिलों पर राज कर रहे हैं। कुछ चिट्ठाकारों को उनकी कुंडलियां इतनी अच्छी लगीं कि उन्हे अपना गुरू बना लिया।

साल 2006 सरक गया है और साल 2007 आ रहा है। जो उपेक्षित और पिछड़े रह गये हैं उम्मीद करते हैं कि नया साल उनके लिये नयी खुशियां और सपने ले कर आयेगा। हंसते हुए पुराने को विदा करें और और नये का स्वागत करें।

आप सब के लिये नया वर्ष मंगलमय हो।



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'विराट' हृदय

आज के नवभारत टाइम्स के संपादकीय में छपा निम्न हृदयस्पर्शी वाकया:

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क्रिकेट की दुनिया में विराट कोहली बहुत जाना माना नाम नहीं, पर 18 साल के इस स्कूली छात्र पर दिल्ली के क्रिकेट प्रेमी बराबर नजर रखे हुए हैं। विराट कोहली में वे सभी गुण हैं, जो उन्हें बड़ा क्रिकेटर बना सकते हैं। मगर बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। दो दिन पहले उन्होंने खेल और टीम के प्रति कमिटमेंट की जो मिसाल पेश की, उसने उनके कद को बहुत ऊंचा कर दिया है। दिल्ली में रणजी मैच के दूसरे दिन रात में उनके पिता का देहांत हो गया। अगले दिन उन्हें श्मशान ले जाया जाना था। लेकिन उधर मैच में दिल्ली पर फॉलोऑन की जिल्लत उठाने का खतरा भी मंडरा रहा था। पहली पारी में कर्नाटक के 446 रनों के जवाब में दिल्ली 59 रनों पर अपने पांच बल्लेबाज खो चुकी थी। दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक विराट कोहली और पुनीत बिष्ट ने दिल्ली का स्कोर 103 रनों तक पहुंचा दिया था, मगर फॉलोऑन का खतरा टला नहीं था। जब लोगों को मालूम चला कि विराट कोहली शोक में हैं, तो उन्होंने सहज ही उन्हें मैच न खेलकर परिवारजनों के साथ रहने को कहा। लेकिन विराट कोहली पिता की मौत के सदमे के बावजूद संकट में फंसी अपनी टीम का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने पुनीत बिष्ट के साथ छठे विकेट के लिए 152 रनों की साझेदारी कर दिल्ली को फॉलोऑन से बचा लिया। विराट कोहली अंतत: 90 रन के निजी स्कोर पर अंपायर के एक गलत निर्णय के शिकार हुए। मैदान में एकाग्रता की मिसाल बने इस स्टाइलिश बल्लेबाज को देखकर शायद ही कोई दर्शक जान पाया हो कि अपने सीने में यह बालक कितना बड़ा तूफान छिपाए खेल रहा है। आउट होकर पविलियन लौटते हुए पूरी टीम का स्टैंडिंग ओवेशन पाकर हालांकि उनकी आंखों में आंसू उमड़ पड़े थे, लेकिन असल बात यह थी कि वह अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा आए थे। विराट कोहली ने पिछले साल ही दिल्ली की अंडर-17 टीम की ओर से खेलते हुए पंजाब और हिमाचल के खिलाफ दोहरे शतक लगाकर लोगों का ध्यान खींचा था और उसके बाद इंग्लैंड और पाकिस्तान के दौरे में भी उनकी बल्लेबाजी देखने वाले उनके कायल हुए थे। कोहली अगर चाहते तो पिता की मृत्यु के दुख में मैच छोड़ भी सकते थे। उन्हें कोई कुछ न कहता। लेकिन अपनी टीम और राज्य की प्रतिष्ठा को अपने निजी दुख से ऊपर रखकर उन्होंने दिखा दिया कि विकट समय आने पर सच्चे खिलाड़ी और मजबूत हो जाते हैं। यही उनकी महानता है।


धुंधलकों में छिपा सच

शशि भाई और बुल्लेशाह ने जब काबुल एक्सप्रैस के बारे में लिखा तो स्वंय को फिल्म देखने से रोक नहीं पाया।

सच कहूं तो शशि भाई की इन पंक्तियों ने फिल्म देखने को मजबूर किया।
"यह फिल्म बेहद साफ-सुथरी फिल्म. फिल्म में मानवीय संवेदनाओं की बात की गईं हैं. एक लाइन में बस यही कहना चाहुंगा कि फिल्म की शरुआत में जिस चरित्र के प्रति आपकी नफरत चरम पर होती है आखिर में उसी चरित्र की मौत पर आपकी आंखें नम होगी." तालिबान की मौत पर आंखें नम? सच जानने के लिये फिल्म देखिये। न सिर्फ फिल्म तालिबान, अमेरिका और पाकिस्तान के बारे में कई सच्चाईयों से रूबरू करवाती है, बहुत सी मानवीय संवेदनाओं से भी परिचय करवाती है। मेरी यह पोस्ट काबुल एक्सप्रैस पर नहीं, उस संवेदना पर है जो एक तालिब के लिये आंखों को नम करवा देती है।

इस इतवार द हिंदुस्तान टाईम्स में बरखा दत्त का लिखा एक लेख पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा कि हम अक्सर चीजों को काले या सफेद रंगों में देखते हैं जबकी सत्य हमेशा कहीं ग्रे एरिया में पाया जाता है। यानी सत्य वहीं कहीं छिपा होता है जहां शब्द और विचार धुंधले हो जाते हैं। आगे लिखा कि हम हमेशा अपनी बातों को extreme (चरम) पर ले जाते हैं और जो भी हमारे विचारों से मेल नहीं खाता उसे सिरे से ही नकार देते हैं।

हर आतंकी या तालिब का एक मानवीय चेहरा जरूर होता होगा। मगर समाचारों में हम जो चेहरा देखते हैं, जिस आतंकी स्वरूप से हमारा परिचय होता है उस स्वरूप में एक इंनसान को देखने की गुंजाइश ही हम नहीं छोड़ते। फिल्म में भी इसे एक स्थान पर जॉन, जो एक रिपोर्टर बने हैं, स्वीकार करते हैं कि अपनी रिपोर्ट में तालिब के इन्सानी चेहरे को वे चाह कर भी नहीं दिखा पायेंगे।

हम लोग कभी कभी उसकी बात भी सुनना नहीं चाहते जो हमारी बनी बनाई धारणाओं में फिट नहीं बैठता। हम अपने अपने सच गढ़ लेते हैं और जिंदगी भर उन्हे सच सिद्ध करने के लिये दूसरों के सच को झूठा साबित करते रहते हैं। मजे की बात यह है कि दूसरा भी यही कर रहा होता है। बुश और ओसामा भी शायद यही कर रहे हैं। हम सब भी अपने अपने स्तरों पर यही करते हैं। हम सब लोग अपने अपने पूंजीवादों, समाजवादों, धर्मों, जातियों, भाषाओं, राज्यों, राष्ट्रों, पंथों को ही सच मान अपने अपने सीनों से चिपकाये घूमते रहते हैं और कोइ जरा भी इनसे अलग विचार रखता है तो फट मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं। क्या वैचारिक तौर पर हम स्वंय किसी चरमपंथी से कुछ कम हैं?

संवेदनहीनता के एक और मामले की और ध्यान दिलाया बुल्लेशाह ने। सीएनएन आइबीएन के पत्रकार आसिफ कुरैशी ने कशमीरी पंडितों के कश्मीर छोड़ने पर एक बेहुदा किस्सा सुनाया है। कुरैशी साहब ने ऐसा मजाक किया है जिस पर हंसी भी नहीं आती, जनाब की अक्ल पर रोना जरूर आता है। क्या पत्रकारिता करते हुए आदमी इस प्रकार संवेदनहीन हो जाता है? कशमीरी पंडितों का दुख तो काले और सफेद रंगों की तरह साफ है, क्या इसे समझने के लिये भी किसी को धुंधलकों से सच खोजना होगा?


चाँदनी चौक में मेक्डॉनल्ड

आज बहुत दिनों बाद दिल्ली के चाँदनी चौक जाना हुआ। यहां आये बदलाव बहुत ही सहजता से इस बाजार में घुल मिल गये हैं। यहां नयी पहुंची मेट्रो के स्टेशन के बाहर भी वैसे ही भिखारी बैठे मिल जायेंगे जैसे पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर मिलते हैं।

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यहां देखिये चाँदनी चौक में खुले मेक्डॉनल्ड्स की तस्वीर। सामने हैं सामान उठा कर चलने वाले जिन्हे यहां झल्लीवाले कहा जाता है और कान से मैल निकालते कनमैलिये। कनमैलिये और झल्लीवाले पुरानी दिल्ली की पहचान हैं और मेक्डॉनल्ड्स को आधुनिकता (?) की निशानी कह सकते हैं। अब यह आप ही बताइये कि परंपरा ने आधुनिकता को अपनाया है या आधुनिकता ने परंपरा को?


पीएम को एक सुअर की चिट्ठी

पिछले दिनों मैं एक प्रतिभाशाली सुअर से गुड़गांव में मिलासमीर भाई ने उस सुअर की प्रतिभा को पहचाना और सिफारिश कर डाली कि उसे मंत्री पद दे दिया जाये। हाइटेक गुड़गांव में रहने वाले इस सुअर ने यह सब जान लिया और ठान लिया कि मंत्री बनने की कोशिश की जानी चाहिये। इसी दिशा में उसका लिखा एक पत्र हमारे हाथ लग गया और इस खत को यहां ज्यों का त्यों पेश किया जा रहा है।

पीएम जी,
नमस्कार,

मुझे पता चला है कि आपके पास मंत्री की कुछ पोस्ट खाली हैं, मैं स्वंय को देश सेवा के लिये इस स्थान के लिये प्रस्तुत करना चाहता हूं।
इस पोस्ट के लिये मेरी उम्मीदवारी सर्वश्रेष्ठ हो सकती है क्योंकि एक मंत्री की नियुक्ति के लिये जो भी निर्धारित योग्यताएं होनी चाहियें, मैं उस सब से परिपूर्ण हूं। अपने समर्थन में मैं कुछ तर्क नीचे दे रहा हूं:

१. दबे कुचलों का प्रतिनिधी : समाज के दबे कुचलों को प्रतिनिधित्व देने के लिये मुझसे अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं हो सकता। भला मुझसे ज्यादा दबा कुचला और कौन हो सकता है?
२. वादनिरपेक्ष : आपको बता दूं कि मैं पिछले कई वर्षों से गुड़गांव के आलिशान उद्योगों, उनके भवनों के आसपास रहा हूं और वहां के बड़े बड़े पूंजीवादी गढ़ों के बारे में अच्छा तर्जुबा ले चुका हूं और वहां का ढेरों हाईटेक कूड़ा खाया है। साथ ही समाज का सबसे दबा कुचला प्राणी होने के कारण समाजवाद का भी प्रधिनिधित्व करुंगा। इससे यह फायदा होगा कि गंगा गये तो गंगा दास और जमुना गये तो जमुना दास, और साथ ही वादनिरपेक्ष छवि भी।
३. धर्मनिरपेक्ष : असल में हमारे में कोइ धर्म वगैरह का लफड़ा ही नहीं होता। मैं तो हिन्दू मुसलमानों के मोहल्ले में पड़े कूड़े को बिना किसी राग द्वेष या जातीय-सामुदायिक संकीर्णता के हजम कर जाता हूं ।
४. प्रवासी भारतीयों में लोकप्रिय: प्रवासी भारतीयों में तो मैं इतना लोकप्रिय हूं कि वास्तव में मुझे मंत्री बनाये जाने का प्रस्ताव वहीं से आया।
५. ब्लागरों पर भी असर: समाज में विचारों का प्रवाह आजकल ब्लागस पर ही होता है इसलिये ब्लागरों की मांगों को नजरांदाज नहीं किया जा सकता। मेरी उम्मीदवारी की इच्छा इन ब्लाग्स पर ही पैदा हुई।
६. ईमानदार और बेदाग: आपका कोइ मंत्री कभी तेल के खेल में लिप्त मिलता है तो कोइ अपने ही सचिव का हत्यारा। इन लोगों की वजह से आपकी छवि भी खराब हुई है। मेरी छवि ईमानदार और बेदाग है। मुझे मंत्री बनाये जाने से आपकी छवि में भी निखार आयेगा।
७. जानवर प्रेम का संदेश: मुझे मंत्री बना कर आप जानवर प्रेमी होने का संदेश दे पायेंगे। इससे पशु प्रेमी खेमका जी जैसे कुछ सांसद भी आपके गठबंधन को ज्वाइन कर सकते हैं, इससे आपका गठबंधन और भी मजबूत होगा।

आपसे सकारात्मक जवाब के इंतजार में
आपका
एक सुअर
गुड़गांव


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मूषकर जी का इंटरव्यू


यह भी रंग विकास के

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14 वर्षिय आरती धवन अपनी अत्मविश्वास से भरी मुस्कुराहट के साथ अपने काम्पेक के काले लैपटॉप पर कभी पावर प्वाईंट पर कोइ स्लाईड दिखाती है और कभी एक्सेल पर अपने 33 वर्षिय चाचा संतोष धवन के महीने के खर्चे का हिसाब दिखाती है। गन्ने का खेत यह सब करने के लिये शायद ठीक जगह नहीं है मगर यदि आप महाराष्ट्र के बारामती में हैं तो आपको इससे अच्छी कोइ जगह नहीं मिलेगी।
नवीं कक्षा में पढ़ने वाली इस शर्मीली सी लड़की ने कम्प्यूटर केवल दो साल पहले अपने स्कूल की कम्प्यूटर लैब में देखा था। इतने से समय में आरती न सिर्फ वर्ड, एक्सेल और पावर प्वाइंट सीख गई है, उसने 30 एकड़ खेत के मालिक अपने किसान चाचा को इमेल करना और इंटरनेट चलाना भी सिखा दिया है। एक साल पहले इन लोगों ने एक डेस्कटाप कम्प्यूटर खरीदा था जिसका प्रयोग ये लोग नेट पर कृषि संबंधी जानकारी लेने के लिये करते हैं। "हम नेट पर खोजते हैं कि अंगूर की अलग अलग जातियों की अच्छी देखभाल कैसे की जाये" मुस्कुराते हुए आरती बताती है।
काम्पेक के जिस लैपटॉप को खुश होते हुए आरती दिखा रही है, वह लैपटॉप उसे उपहार में दिया इंटेल के चेयरमैन Craig Barrett ने पिछले महीने जब वो धवन के घर आये । धवन घर के आहाते में बंधी अपनी वो गाय दिखाना नहीं भूलते जिसका दूध Craig Barrett ने भी पिया।
यह है भारत के बारामती और बहुत से कई दूसरे ग्रामीण क्षेत्रों का वह सच जिस पर सहजता से विश्वास नहीं होता।
बारामती के लगभग सौ गांव मुख्यतः खेती और पशुपालन से अपना गुजारा करते हैं। यह सब गांव इंटेरनेट मय हो गये हैं। पूने से 120 किमी दूर इस तालुके में जब आप प्रवेश करते हैं तो चिकनी सड़कें आपका स्वागत करती हैं। इंटेल ने अपने अनूठे Wimax प्रोजेक्ट को लागू करने के लिये बारामती को चुना है

(बिजनेस टुडे के 17 दिसंबर अंक में छपे एक लेख के एक भाग का मेरे द्वारा किया हिंदी रूपांतर)


अमृता प्रीतम की एक कविता

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एक घटना

तेरी यादें
बहुत दिन बीते
जलावतन हुईं
जीतीं हैं या मर गयीं-
कुछ पता नहीं

सिर्फ एक बार एक घटना हुई थी
ख्यालों की रात बड़ी गहरी थी
और इतनी स्तब्ध थी
कि पत्ता भी हिले
तो बरसों के कान चौंक जाते..

फिर तीन बार लगा
जैसे कोई छाती का द्वार खटखटाये
और दबे पांव छत पर चढ़ता कोई
और नाखूनों से पिछली दीवार को कुरेदता.....

तीन बार उठ कर
मैंने सांकल टटोली
अंधेरे को जैसे एक गर्भ पीड़ा थी
वह कभी कुछ कहता
और कभी चुप होता
ज्यों अपनी आवाज को दांतों में दबाता
फिर जीती जागती एक चीज
और जीती जागती आवाज
"मैं काले कोसों से आयी हूं
प्रहरियों की आंख से इस बदन को चुराती
धीमे से आती
पता है मुझे कि तेरा दिल आबाद है
पर कहीं वीरान सूनी कोई जगह मेरे लिये?"

"सूनापन तो बहुत है,
पर तूं जलावतन है, कोई जगह नहीं,
मैं ठीक कहती हूं कोई जगह नहीं तेरे लिये,
यह मेरे मस्तक,
मेरे आका का हुक्म है!"

और फिर जैसे सारा अंधेरा कांप जाता है
वह पीछे को लौटी
पर जाने से पहले कुछ पास आयी
और मेरे वजूद को एक बार छुआ
धीरे से
ऐसे, जैसे कोई वतन की मिट्टी को छूता है.....

इक घटना

तेरियां यादां
बहोत देर होई
जलावतन होईयां
ज्युंदियां कि मोईयां
कुछ पता नईं
सिर्फ इक वारी
इक घटना वापरी

ख्यालां दी रात
बड़ी डूंगी सी
ते ऐणी चुप सी
कि पता खड़कयां वी
वरयां दे काण तरभकदे
फिर तिन वारां जापिया
छाती दा बुहा खड़किया
पोले पैर छत्त ते चड़दा
ते नऊंआ दे नाल
पिछली कांद खुर्चदा
तिण वारां उठ के मैं कुंडियां टोईयां
अंधेरे नूं जिसतरा इक गर्भपीड़ सी
ओ कदे कुझ कैंदा ते कदे चुप होंदा
ज्यूं अपणी आवाज नूं दंदा दे विच पींदा

ते फेर ज्यूंदी जागदी इक शै
ते ज्यूंदी जागदी आवाज
"मैं कालेयां कोहां तो आई हां,
पाहरों आंदी आख तों इस बदन नूं चुरांदी बड़ी मांदी
पता है मैनूं कि तेरा दिल आबाद है
पर किथे सुन्जी सखनी कोई थां, मेरे लई?

"सुन्ज सखन बड़ी है, पर तूं....?
तूं जलावतन हैं, नहीं कोइ थां नहीं तेरे लई
मैं ठीक कैंदी हां कि कोइ थां नहीं तेरे लई
ए मेरे मस्तक, मेरे आका दा हुक्म है"

ते फेर जीकण सारा हनेरा ही कांब जांदा है
ओ पिछां नूं परती पर जाण तो पहलां
ओ उरां होई ते मेरी होंद नूं ओस इक वार छोहिया
होली जही...
ऐंज जिवें कोई वतन दी मिट्टी नूं छूंदा है.....

तेरियां यादां
बहोत देर होई
जलावतन होईयां...


("अमृता प्रीतम-चुनी हुई कवितायें" से साभार)

आप इस पंजाबी कविता को अमृता जी की आवाज में यहां सुन सकते हैं।


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“बिरह” का सुलतान - शिव कुमार बटालवी
अमृता प्रीतम की कुछ कवितायें


आम आदमी के साथ....?

आज के समाचरपत्रों में मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई से सितंबर) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) यानी आर्थिक विकास के आंकड़े छपे हैं। आइये इसके पीछे छिपे सामाजिक संदेश को समझने की कोशिश करते हैं। इस दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) यानी आर्थिक विकास की बढ़ोतरी दर ९.२ फीसदी रही है। पहली तिमाही में यह ८.९ फीसदी थी। इस साल की पहली छमाही में औसत बढ़ोतरी दर ९.१ फीसदी रही है। यह पिछले १५ साल में पहली छमाही में हासिल सबसे अधिक बढ़ोतरी दर है। यदि यह बढ़ोतरी ८% भी होती रही तो अगले ११ सालों में देश में प्रति व्यक्ति आय दोगुनि हो जायेगी (और वह भी मुद्रास्फीति के प्रभाव को हटाने के बाद)।
अब कुछ चौंकाने वाली बातें, इस तिमाही में कृषि विकास दर रही केवल १.७% और जीडीपी में कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी घट कर रह गई है मात्र १७.२% । जी हां, हमारी अर्थव्यवस्था में कृषि का सहयोग अब मात्र १७.२% ही रह गया है जो कि १९९०-९१ के मुकाबले आधे से भी कम है। अब कोई यह नहीं कह सकता कि हम एक कृषि प्रधान देश हैं। जीडीपी को उद्योग, कृषि तथा सेवा के तीन क्षेत्रों में बांट कर देखा जाता है। उल्लेखनीय है कि १९८८-८९ में कृषि की विकास दर १५.४% थी। आपको यह भी जानकर हैरानी होगी कि इस १७.२% की हिस्सेदारी पर हमारी ६०% आबादी निर्भर करती है। जिस असमान विकास की बात हमारे कुछ चिट्ठाकार बंधू करते रहे हैं उसका सबूत हैं वित्त मंत्री जी के यह आंकड़े।

लगता है अब 'आम आदमी' की परिभाषा ही बदल रही है !