विकास के यह रंग

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दिल्ली स्थित इस मॉल से कूद कर पिछले दिनों एक युवक ने आत्महत्या कर ली। कल जब यहां से गुजरा तो एक और युवक को छत के पास (काले घेरे में)खड़े पाया । घ्यान से देखा तो युवक सफाई कर रहा था।

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गुड़गांव स्थित नाव के आकार सा चांदी के रंग का यह भवन मुझे हमेशा से बहुत ही आकर्षित करता है। मगर गुड़गांव के इन भवनों के आसपास टूटी सड़कें, बिखरा कूड़ा और आवारा जानवर आराम से घूमते मिल जायेंगे। आज इस सुअर से बहुत मनुहार किया कि एक बार सिर ऊपर करके अच्छा सा पोज़ दे दे, मगर उसे केवल कूड़े में ही मजा आ रहा था, मेरे ब्लाग के लिये पोज़ देने में उसे जरा भी रुचि नहीं थी।


"बिरह" का सुलतान - शिव कुमार बटालवी

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बिरह का सुलतान - शिव कुमार बटालवी (ਸ਼ਿਵ ਕੁਮਾਰ ਬਟਾਲਵੀ)शिव कुमार बटालवी पंजाबी के ऐसे आधुनिक कवि हैं जिनके गीतों में पंजाब के लोकगीतों का आनंद भी हैं।
शिव का जन्म 23 जुलाई 1936 को शकरगढ़, पंजाब (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। बंटवारे के बाद उनका परिवार बटाला में आ गया। ढेरों गीत और कवितायें लिखने वाले शिव कुमार बटालवी को 1965 में अपने काव्य नाटक "लूणा " के लिये साहित्य अकादमी अवार्ड मिला। शिव के गीतों में प्यार है, दर्द है, सब से बड़ी बात है कि उन्होंने पंजाबी को अपने गीतों से समृद्ध किया। उन्हे बिरह का सुल्तान कहा जाता है। पंजाबी अपने इस कवि से बहुत प्यार करते हैं। पंजाब में कवितायें लोक गीत बन जाती है और कवि पढ़े चाहे जायें या नहीं मगर सुने बहुत जाते हैं। जैसे वारिस शाह की 'हीर' गायी और सुनी जाती है। शिव के गीत भी पंजाब में बहुत लोकप्रिय है, इस का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उनके गीतों को लगभग सभी पंजाबी गायकों ने तो गाया ही, महेन्द्र कपूर और नुसरत फतह अली खान साहब ने भी गाया। जगजीत सिंह तथा चित्रा सिंह द्वारा गाये शिव के गीतों की एलबम मेरी सबसे प्रिय एलबम है। (आप इनके गाये शिव के गीतों को सुनने के लिये इन लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं)


असां ते जोबण रुते मरना
टुर जाणा असां भरे भराये,


एह मेरा गीत किसे ना गाणा
एह मेरा गीत मैं आपे गा के
भलके ही मर जाणा.


तथा

यारणया रब करके मैंणूं
पैण बिरहों दे कीड़े वे,
नैंना दे दो संदले बूहे
जाण सदा लई भीड़े वे.


लिखने वाले शिव का देहान्त मात्र 36 वर्ष की उम्र में मई 7,1973 को हो गया।

शिव कुमार बटालवी के कुछ गीत यहां दे रहा हूं, मुझ में इतनी क्षमता नहीं कि इनका हिंदी अनुवाद कर सकूं(कुछ शब्दों के अर्थ अंत में देने की कोशिश की है), मगर देवनागरी में टाईप किया है उन लोगों के लिये जो पंजाबी को समझ सकते हैं मगर गुरमुखी में पढ़ नहीं सकते।

मैं इक शिकरा यार बनाया.

माये नी माये
मैं इक शिकरा यार बनाया.
ओदे सिर ते कलगी
ओदे पैरीं झांजर
ते ओ चोग चुगेंदा आया.


इक ओदे रूप दी धुप तिखेरी
दुजा महकां दा तिरहाया
तीजा ओदा रंग गुलाबी
किसे गोरी मां दा जाया.


इश्के दा इक पलंग नवारी,
असां चानन्नियां विच डाया
तन दी चादर हो गई मैली
उस पैर जां पलंगे पाया.


दुखण मेरे नैनां दे कोये
विच हाड़ हंजुआं दा आईया
सारी रात गई विच सोचां
उस ए कि जुल्म कमाया.


सुबह सवेरे लै नी वटणा
असां मल मल ओस नव्हाया
देही दे विचों निकलण चींगां
ते साडा हाथ गया कुम्हलाया.


चूरी कुट्टां तां ओ खांदा नाही
ओन्हुं दिल दा मांस खवाया
इक उडारी ऐसी मारी
ओ मुड़ वतनी ना आया.


ओ माये नीं
मैं इक शिकरा यार बनाया
ओदे सिर ते कलगी
ओदे पैरीं झांजर
ते ओ चोग चुगेंदा आया.


उधारा गीत

सांनूं प्रभ जी,
इक अद गीत उधारा होर देयो.
साडी बुझदी जांदी आग्ग,
अंगारा होर देयो.


मैं निक्की उम्रे
सारा दर्द हंडा बैठा,
साडी जोबन रुत लई,
दर्द कुंआरा होर देयो.


उम्रां दे सरवर

उम्रां दे सरवर
साहां दे पाणी
गीता वे चुंज भरीं.


भलके ना रहने
पीड़ा दे चानन
हावां दे हंस सरीं
गीता वे चुंज भरीं.


गीता वे उम्रां दे सरवर छलिये
पल्छिन भर सुक जांदे
साहवां दे पानी पी लै वे अड़िया
अनचाहियां फिट जांदे
भलके न सानूं दईं वे उलमड़ा
भलके न रोस करीं
गीता वे चुंज भरीं.


हावां दे हंस
सुनींदे वे लोभी
दिल मरदा तां गांदे
इह बिरहों रुत हंजू चुकदे
चुकदे ते उड जांदे
ऐसे उडदे मार उडारी
मुड़ ना आण घरीं
गीता वे चुंज भरीं.


गीता वे चुंज भरें तां मैं तेरी
सोने चुंज मढ़ावां
मैं चंदरी तेरी बरदी थींवां
नाल थीए परछांवां
हाड़ाई वे ना तूं तिरहाया
मेरे वांग मरीं
गीता वे चुंज भरीं.


माये नी माये

माये नी माये
मेरे गीतां दे नैणा विच
बिरहों दी रड़क पवे
अद्दी अद्दी राती उठ
रोण मोये मितरां नूं
माये सानूं नींद न पवे.


भें भें सुगंधियां च
बणा फेहे चानन्नी दे
तांवी साडी पीड़ न सवे
कोसे कोसे साहां दी में
करां जे टकोर माये
सगों साहणु खाण नूं पवे.


आपे नि मैं बालड़ी
मैं हाले आप मत्तां जोगी
मात्त केड़ा एस नूं दवे
आख सूं नि माये इहनूं
रोवे बुल चिथ के नी
जग किते सुन न लवे.


आख माय्रे अद्दी अद्दी
रातीं मोये मित्रां दे
उच्ची उच्ची नां ना लवे
मते साडे मोयां पिछे
जग ए सड़िकरा नी
गीतां नुं वी चंदरा कवे.


की पुछदे ओ हाल

की पुछदे ओ हाल फकीरां दा
साडा नदियों विछड़े नीरां दा
साडा हंज दी जूने आयां दा
साडा दिल जलयां दिल्गीरां दा.


साणूं लखां दा तन लभ गया
पर इक दा मन वी न मिलया
क्या लिखया किसे मुकद्दर सी
हथां दियां चार लकीरां दा.


तकदीर तां अपनी सौंकण सी
तदबीरां साथों ना होईयां
ना झंग छुटिया, न काण पाटे
झुंड लांघ गिया इंज हीरां दा.


मेरे गीत वी लोक सुणींदे ने
नाले काफिर आख सदींदे ने
मैं दर्द नूं काबा कह बैठा
रब नां रख बैठा पीड़ां दा.


शिकरा = बाज
तिखेरी = तीखी
तिरहाया = सराबोर
अड़िया = दोस्त
जाया = जन्मा
हाड़ हंजुआं दा = आंसुंओं की बाढ़
चींगां = चिंगारियां
चूरी = घी और रोटी से बनने वाला
हंडा = व्यतीत, खर्च
सरवर = सरोवर
साहां = सांसें
चुंज = चोंच
भलके = सुबह सुबह
हावां = आहें
उलमड़ा = उलाहना
हंजू = आंसू
घरीं = घर
चंदरी = तुच्छ
बरदी थींवा = नौकर बन जाऊं
नाल थीए परछांवां = परछाई बन जाऊं
तिरहाया = प्यासा
वांग = तरह
भें भें = भिगो भिगो कर
बणा फेहे = बांधूं फाहे


चानन्नी = चांदनी

तांवी = तो भी
कोसे कोसे साहां = गर्म सांसे
बालड़ी = बालिका
मत्तां = समझदारी
रोवे बुल चिथ के = होंठ दबा कर रोये
सड़िकरा = जलन करने वाला
हंज = आंसू
सौंकण = सौतन


ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ.

ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ
ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ
ਓਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਕਲਗੀ
ਓਦੇ ਪੈਰੀਂ ਝਾਂਜਰ
ਤੇ ਓ ਚੋਗ ਚੁਗੇਂਦਾ ਆਯਾ.
ਇਕ ਓਦੇ ਰੂਪ ਦੀ ਧੁਪ ਤਿਖੇਰੀ
ਦੁਜਾ ਮਹਕਾਂ ਦਾ ਤਿਰਹਾਯਾ
ਤੀਜਾ ਓਦਾ ਰਂਗ ਗੁਲਾਬੀ
ਕਿਸੇ ਗੋਰੀ ਮਾਂ ਦਾ ਜਾਯਾ.
ਇਸ਼੍ਕੇ ਦਾ ਇਕ ਪਲਂਗ ਨਵਾਰੀ,
ਅਸਾਂ ਚਾਨੰਨਿਯਾਂ ਵਿਚ ਡਾਯਾ
ਤਨ ਦੀ ਚਾਦਰ ਹੋ ਗਈ ਮੈਲੀ
ਉਸ ਪੈਰ ਜਾਂ ਪਲਂਗੇ ਪਾਯਾ.
ਦੁਖਣ ਮੇਰੇ ਨੈਨਾਂ ਦੇ ਕੋਯੇ
ਵਿਚ ਹਾਡ਼੍ਅ ਹਂਜੁਆਂ ਦਾ ਆਈਯਾ
ਸਾਰੀ ਰਾਤ ਗਈ ਵਿਚ ਸੋਚਾਂ
ਉਸ ਏ ਕਿ ਜੁਲ੍ਮ ਕਮਾਯਾ.
ਸੁਬਹ ਸਵੇਰੇ ਲੈ ਨੀ ਵਟਣਾ
ਅਸਾਂ ਮਲ ਮਲ ਓਸ ਨਵ੍ਹਾਯਾ
ਦੇਹੀ ਦੇ ਵਿਚੋਂ ਨਿਕਲਣ ਚੀਂਗਾਂ
ਤੇ ਸਾਡਾ ਹਾਥ ਗਯਾ ਕੁਮ੍ਹਲਾਯਾ.
ਚੂਰੀ ਕੁੱਟਾਂ ਤਾਂ ਓ ਖਾਂਦਾ ਨਾਹੀ
ਓਨ੍ਹੁਂ ਦਿਲ ਦਾ ਮਾਂਸ ਖਵਾਯਾ
ਇਕ ਉਡਾਰੀ ਐਸੀ ਮਾਰੀ
ਓ ਮੁਡ਼੍ਅ ਵਤਨੀ ਨਾ ਆਯਾ.
ਓ ਮਾਯੇ ਨੀਂ
ਮੈਂ ਇਕ ਸ਼ਿਕਰਾ ਯਾਰ ਬਨਾਯਾ
ਓਦੇ ਸਿਰ ਤੇ ਕਲਗੀ
ਓਦੇ ਪੈਰੀਂ ਝਾਂਜਰ
ਤੇ ਓ ਚੋਗ ਚੁਗੇਂਦਾ ਆਯਾ.



ਉਧਾਰਾ ਗੀਤ


ਸਾਂਨੂਂ ਪ੍ਰਭ ਜੀ,
ਇਕ ਅਦ ਗੀਤ ਅਧਾਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.
ਸਾਡੀ ਬੁਝਦੀ ਜਾਂਦੀ ਆੱਗ,
ਅਂਗਾਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.
ਮੈਂ ਨਿੱਕੀ ਉਮ੍ਰੇ
ਸਾਰਾ ਦਰ੍ਦ ਹਂਡਾ ਬੈਠਾ,
ਸਾਡੀ ਜੋਬਨ ਰੁਤ ਲਈ,
ਦਰ੍ਦ ਕੁਂਆਰਾ ਹੋਰ ਦੇਯੋ.


ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ

ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ
ਸਾਹਾਂ ਦੇ ਪਾਣੀ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਭਲਕੇ ਨਾ ਰਹਨੇ
ਪੀਡ਼੍ਆ ਦੇ ਚਾਨਨ
ਹਾਵਾਂ ਦੇ ਹਂਸ ਸਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਗੀਤਾ ਵੇ ਉਮ੍ਰਾਂ ਦੇ ਸਰਵਰ ਛਲਿਯੇ
ਪਲ੍ਛਿਨ ਭਰ ਸੁਕ ਜਾਂਦੇ
ਸਾਹਵਾਂ ਦੇ ਪਾਨੀ ਪੀ ਲੈ ਵੇ ਅਡ਼੍ਇਯਾ
ਅਨਚਾਹਿਯਾਂ ਫਿਟ ਜਾਂਦੇ
ਭਲਕੇ ਨ ਸਾਨੂਂ ਦਈਂ ਵੇ ਉਲਮਡਾ
ਭਲਕੇ ਨ ਰੋਸ ਕਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਹਾਵਾਂ ਦੇ ਹਂਸ
ਸੁਨੀਂਦੇ ਵੇ ਲੋਭੀ
ਦਿਲ ਮਰਦਾ ਤਾਂ ਗਾਂਦੇ
ਇਹ ਬਿਰਹੋਂ ਰੁਤ ਹਂਜੂ ਚੁਕਦੇ
ਚੁਕਦੇ ਤੇ ਉਡ ਜਾਂਦੇ
ਐਸੇ ਉਡਦੇ ਮਾਰ ਉਡਾਰੀ
ਮੁਡ਼੍ਅ ਨਾ ਆਣ ਘਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੇਂ ਤਾਂ ਮੈਂ ਤੇਰੀ
ਸੋਨੇ ਚੁਂਜ ਮਢ਼੍ਆਵਾਂ
ਮੈਂ ਚਂਦਰੀ ਤੇਰੀ ਬਰਦੀ ਥੀਂਵਾਂ
ਨਾਲ ਥੀਏ ਪਰਛਾਂਵਾਂ
ਹਾਡ਼੍ਆਈ ਵੇ ਨਾ ਤੂਂ ਤਿਰਹਾਯਾ
ਮੇਰੇ ਵਾਂਗ ਮਰੀਂ
ਗੀਤਾ ਵੇ ਚੁਂਜ ਭਰੀਂ.


ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ

ਮਾਯੇ ਨੀ ਮਾਯੇ
ਮੇਰੇ ਗੀਤਾਂ ਦੇ ਨੈਣਾ ਵਿਚ
ਬਿਰਹੋਂ ਦੀ ਰਡ਼੍ਅਕ ਪਵੇ
ਅੱਦੀ ਅੱਦੀ ਰਾਤੀ ਉਠ
ਰੋਣ ਮੋਯੇ ਮਿਤਰਾਂ ਨੂਂ
ਮਾਯੇ ਸਾਨੂਂ ਨੀਂਦ ਨ ਪਵੇ.
ਭੇਂ ਭੇਂ ਸੁਗਂਧਿਯਾਂ ਚ
ਬਣਾ ਫੇਹੇ ਚਾਨੰਨੀ ਦੇ
ਤਾਂਵੀ ਸਾਡੀ ਪੀਡ਼੍ਅ ਨ ਸਵੇ
ਕੋਸੇ ਕੋਸੇ ਸਾਹਾਂ ਦੀ ਮੇਂ
ਕਰਾਂ ਜੇ ਟਕੋਰ ਮਾਯੇ
ਸਗੋਂ ਸਾਹਣੁ ਖਾਣ ਨੂਂ ਪਵੇ.
ਆਪੇ ਨਿ ਮੈਂ ਬਾਲਡ਼੍ਈ
ਮੈਂ ਹਾਲੇ ਆਪ ਮੱਤਾਂ ਜੋਗੀ
ਮਾੱਤ ਕੇਡ਼੍ਆ ਏਸ ਨੂਂ ਦਵੇ
ਆਖ ਸੂਂ ਨਿ ਮਾਯੇ ਇਹਨੂਂ
ਰੋਵੇ ਬੁਲ ਚਿਥ ਕੇ ਨੀ
ਜਗ ਕਿਤੇ ਸੁਨ ਨ ਲਵੇ.
ਆਖ ਮਾਯ੍ਰੇ ਅੱਦੀ ਅੱਦੀ
ਰਾਤੀਂ ਮੋਯੇ ਮਿਤ੍ਰਾਂ ਦੇ
ਉੱਚੀ ਉੱਚੀ ਨਾਂ ਨਾ ਲਵੇ
ਮਤੇ ਸਾਡੇ ਮੋਯਾਂ ਪਿਛੇ
ਜਗ ਏ ਸਡ਼੍ਇਕਰਾ ਨੀ
ਗੀਤਾਂ ਨੁਂ ਵੀ ਚਂਦਰਾ ਕਵੇ.


ਕੀ ਪੁਛਦੇ ਓ ਹਾਲ

ਕੀ ਪੁਛਦੇ ਓ ਹਾਲ ਫਕੀਰਾਂ ਦਾ
ਸਾਡਾ ਨਦਿਯੋਂ ਵਿਛਡ਼੍ਏ ਨੀਰਾਂ ਦਾ
ਸਾਡਾ ਹਂਜ ਦੀ ਜੂਨੇ ਆਯਾਂ ਦਾ
ਸਾਡਾ ਦਿਲ ਜਲਯਾਂ ਦਿਲ੍ਗੀਰਾਂ ਦਾ.
ਸਾਣੂਂ ਲਖਾਂ ਦਾ ਤਨ ਲਭ ਗਯਾ
ਪਰ ਇਕ ਦਾ ਮਨ ਵੀ ਨ ਮਿਲਯਾ
ਕ੍ਯਾ ਲਿਖਯਾ ਕਿਸੇ ਮੁਕੱਦਰ ਸੀ
ਹਥਾਂ ਦਿਯਾਂ ਚਾਰ ਲਕੀਰਾਂ ਦਾ.
ਤਕਦੀਰ ਤਾਂ ਅਪਨੀ ਸੌਂਕਣ ਸੀ
ਤਦਬੀਰਾਂ ਸਾਥੋਂ ਨਾ ਹੋਈਯਾਂ
ਨਾ ਝਂਗ ਛੁਟਿਯਾ, ਨ ਕਾਣ ਪਾਟੇ
ਝੁਂਡ ਲਾਂਘ ਗਿਯਾ ਇਂਜ ਹੀਰਾਂ ਦਾ.
ਮੇਰੇ ਗੀਤ ਵੀ ਲੋਕ ਸੁਣੀਂਦੇ ਨੇ
ਨਾਲੇ ਕਾਫਿਰ ਆਖ ਸਦੀਂਦੇ ਨੇ
ਮੈਂ ਦਰ੍ਦ ਨੂਂ ਕਾਬਾ ਕਹ ਬੈਠਾ
ਰਬ ਨਾਂ ਰਖ ਬੈਠਾ ਪੀਡਾਂ ਦਾ.


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अमृता प्रीतम की एक कविता


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ये है एनडीटीवी और आप देख रहे हैं..........?

आपको याद होगा जब एनडीटीवी ने अपनी साईट पर ब्लाग शुरू किये थे तो हमने अपनी ब्लाग बनाने की कोशिश की थी मगर हर पोस्ट वहां जांचने के बाद ही प्रकाशित की जाती थी।
आज जब अचानक वहां पहुंचे तो देख कर हैरान रह गये कि वहां क्या चल रहा है ! बहुत ही भद्दी, अशलील और नफरत फैलाने वाली टिप्पणियां देख मैं दंग ही रह गया। पता चला कि वहां टिप्पणियों पर किसी का नियंत्रण नहीं है, न तो एनडीटीवी का और न जिसका ब्लाग है उसका, तो चल रहा है खुल्ला खेल फर्रुखाबादी....!!

मुझे एक बात समझ नहीं आती कि जब हम अपना नाम छुपा सकने के लिये आजाद होते हैं तो इतने घटिया क्यों बन जाते हैं। हमारा असली रूप क्या है? वो जो हमारी पहचान के साथ एक सभ्य रूप है या वो जहां हम अनजाने हैं और अपनी असली वाली पर आ जाते हैं?


निवेश के लिये पसन्दीदा शब्द है - यूलिप

मेरे दूसरे चिट्ठे पूंजीबाजार पर नई पोस्ट का लिंक यहां दे रहा हूं क्योंकि किसी कारण से पूंजीबाजार नारद पर नहीं आ रहा है।
निवेश के लिये पसन्दीदा शब्द है - यूलिप


"पता नहीं सरकिट....... !"

"हैलो सरकिट,"
"अरे मुन्नाभाई कैसे हो, अब तो तुम्हे बहुत टाईम हो गया चिट्ठा गिरी करते। क्या समाचार हैं चिट्ठा जगत के? "
"अरे कुछ मत पूछ सरकिट, इदर पानी और कोक को लेकर लफड़ा हो गया।"
"अरे क्या मुन्ना भाई ! पानी और कोक? अरे दारू पीने का और मस्त रहने का। क्या?"
"चुप्प ! दारू का नाम नहीं लेने का ! ये जगदीश भाटिया का ब्लाग है, अभी आ गया तो भोत पिटायी करेगा तेरी। वो तो क्या हुआ कि संजय भाई की एक टिप्पणी से अपने नीरज भाई की भावना को चोट लग गई।"
"भाई ये भावना जी कहां रहतीं है? "
"अरे रास्कल ! भावना बोले तो विचार ! फीलिंग ! नीरज भाई बोला कि गरीब के वास्ते साफ पानी, एजुकेशन और मेडिकल सर्विस के लिये सरकार को ज्यादा बजट देना चहिये।"
"तो भाई इसके लिये सरकार के पास और पैसा किदर से आयेंगा?"
"जब टाटा, बिड़ला और अंबानी और इनके जैसी हजारों कम्पनियां ज्यादा मुनाफा कमा कर ज्यादा टेक्स देंगी।"
"वो कैसे होगा भाई? "
"जब अधिक से अधिक लोग कोक पेप्सी पीयेंगे, रिलाईंस के मोबाईल खरीदेंगे। नये नये मॉल और एसईज़ेड बनेंगे। पता है सरकिट, इस बार मैं लाईब्रेरी में चाईना की इकोनॉमी स्टडी कर रहा था। वहां का एक एसईजेड ही इतना एक्सपोर्ट कर देता है जितना अक्खा इंडिया भी नहीं करता। और वहां खाली पड़ी बंजर जमीनों पर नये नये कई एसईजेड बन गये हैं जिनके आसपास कई नये शहर बस गये हैं और यह सब हुआ सिर्फ पिछले सात आठ सालों में। उनके एक बैंक की टर्नओवर हमारी अक्खी कंट्री की बैंकिंग ईंडस्ट्री से पांच गुना ज्यादी है। अपनी सरकार को भी कुछ ऐसाइच करना चाहिये।"
"इससे सबको साफ पानी मिल जायेंगा भाई?"
"यह तो मुझे पता नहीं मगर इतना जानता हूं कि सरकार अकेली किस किस को नौकरी देगी और किस किस की गरीबी दूर करेगी? रिलायंस के रिटेल आउटलेट्स अगर लोगों को नौकरी देते हैं तो क्यों न खुलें?"
"पर भाई हमारा कोई अपना सामाजिक इकोनॉमिक मॉडल भी तो होगा जो चाईना से अलग हो?"
"हां, हमारा है समाजवादी पूंजीवाद और उनका है पूंजीवादी समाजवाद !"
"है ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! इसमें क्या फर्क है भाई?"
"पता नहीं सरकिट.......!"

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कुछ और पुरानी कतरनें

जैसा कि पिछली पोस्ट में आप सब ने इच्छा जताई है कुछ और पुरानी कतरनें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। इससे यह कतरने यहां सुरक्षित भी हो जायेंगी। सब कुछ तब के राजनैतिक माहौल पर लिखा गया था इसलिये लेखों के संदर्भ भी बताने की कोशिश की है। निम्न लेख जनसत्ता में 2 जून 1988 को छपा था। ध्यान रहे कि उस समय परिवहन मंत्री थे राजेश पायलट और प्रधान मंत्री राजीव गांधी भी पायलट रह चुके थे। बोफोर्स का शोर था और रामजेठमलानी राजीव गांधी से बोफोर्स पर सवाल पूछा करते मगर राजीव कोई जवाब न देते।

डीटीसी की हड़ताल का कोई और नतीजा बेशक न निकला हो, डीटीसी बसों से कंडक्टर की सीटें जरूर निकाल दी गई हैं। वही सीटें जिन पर बैठ कर कंडक्टर खुद को प्रधान मंत्री से कम नहीं समझते थे।
हालत यह थी कि बस स्टाप पर खड़े यात्री जेठमलानी की तरह कितने ही सवाल क्यों न करें मगर मजाल है जो उन्हें जवाब मिल जाये। बस पर कभी रूट नम्बर और गंतव्य स्थान सरकारी नीतियों की तरह स्पष्ट नहीं होता। इसलिये जैसे देश का पता नहीं चलता कि वह कहां जा रहा है उसी प्रकार बस का भी पता नहीं चलता कि वह कहां जा रही है।
मगर साहब अब तो आशियाने ही उजड़ गये। चलती बस में कंडक्टर को अपने पारंपरिक स्थान पर न देख कर ऎसा लगता है जैसे बिना सरकार के देश चल रहा हो और प्रधान मंत्री विदेशयात्रा पर गया हो। अब कंडक्टरों को पता चल गया होगा कि इस देश में किसी पायलट से पंगा ले कर नहीं रहा जा सकता। हमें तो डर है कि कहीं एक हड़ताल और हो गई तो बसों से ड्राइवर की सीट भी जाती रहेगी।


उस जमाने में एक गीत टीवी पर बहुत बजा करता - "मिले सुर मेरा तुम्हारा।" इसी की एक पैरोडी छपी 2 दिसंबर 1988 को जनसत्ता में:-

बोफोर्स से सौदा हो हमारा
तो घूस बने हमारा
धूस की नदिया
हर दिशा से
बह के 'लोटस' में मिले
डालरों का रूप लेकर
बरसें हलके हलके।


निम्न क्षणिकाएं छपीं 24 जनवरी 1991 को जनसत्ता में। खाड़ी में इरान इराक युद्ध चल रहा था। कच्चे तेल की कमी थी। यहां प्रधान मंत्री थे चंद्रशेखर जो कि दाढ़ी रखते थे और अपने चालीस सांसदों की सरकार को किसी तरह थामे चल रहे थे। । दूरदर्शन पर शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित धारावाहिक आता था 'चरित्रहीन।'

(१)
दूरदर्शन ने क्या गजब ढाया है
'चरित्रहीन' के स्थान पर
प्रधानमंत्री को
दिखाया है।
(२)

उनकी सरकार फिसल नहीं रही
जमी है,
तेल की कमी है।


(३)

वे दाढ़ी से त्रस्त हैं डोल गये
खाड़ी के संकट को
दाढी़ का संकट बोल गये।



चुनने को है क्या?

आज जब एक पुराना कागज ढूंढ रहा था तो एक पुरानी कापी पर नजर पड़ी। इस कापी में मैंने 1987-91के जमाने में अपना लिखा (जिसमें अधिकतर संपादक के नाम पत्र हुआ करते थे) जहां कहीं भी छपा की कटिंग्स चिपका रखीं थीं। इसी कापी से एक लेख जो कि 9 मई 1991 को दिल्ली के टाईम्स आफ इंडिया ग्रुप के सांध्य दैनिक 'सांध्य टाईम्स ' में छपा था यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। हांलांकि लेख उस समय के राजनैतिक हालात पर है मगर आज भी प्रासंगिक है तथा लेख में जो प्रश्न मैंने उठाये हैं कुछ कुछ वैसे ही प्रश्न आज मंतव्य पर पंकज भाई ने भी उठाये हैं।

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अभी दाएं हाथ की अनामिका से निशान भी न छूटा था, दिवारों से पोस्टर भी न फटे थे, नारे भी न मिटे थे, वो अखबारों की सुर्खियां, टीवी का थोड़े से अर्से का ग्लासनोस्त जहन से पूरी तरह हट भी न पाया था कि चुनाव फिर आ गये। और अभी भी यही लगता है कि कोई दल शायद ही बहुमत प्राप्त कर सके और छह माह बाद फिर चुनाव करवाने पड़ें। अब समझ में आ रहा है कि पहुंचे हुए फिल्मकार राजकपूर ने अपनी फिल्म मेरा नाम जोकर में दो इंटरवल क्यों रखे थे? अभी तो पहला भाग ही समाप्त हुआ है, आगे तो और भी जल्दी जल्दी इंटरवल आयेंगे। चुनाव आयोग को चाहिये कि एक साथ कई मत पत्रों पर मत डलवा लें, पहला इस समय आप कौन सा दल चुनना चाहते है, दुसरा छह माह बाद कौन सा पसंद करेंगे, तीसरा एक वर्ष बाद ले किये और ऎसे ही आगे के लिये। इससे सबको बहुत आसानी हो जायेगी। एक सुझाव यह भी हो सकता है कि हर मुहल्ले में एक स्थायी मतदान केंद्र बना दिया जाये जैसे दूध का डिपो होता है, रोज सुबह सुबह आप गये, अपना मत दे आये, सरकार रहे या आज का दिन और काम कर ले यह रोज का रोज निर्धारित होता रहेगा। इससे हमारे लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होंगी। आखिर हंग हो या भंग हो चुनाव तो होना ही चाहिये। नहीं? चाहे चुनने को कुछ हो या न हो।

आजकल दिल्ली में सब्जियों की बहुत कमी है। कल सब्जी लेने गया तो केवल गली सड़ी सब्जियां ही थीं। बिना खरीदे लौट आया और खिचड़ी पका ली। आज सुबह से ही सोच रहा हूं कि जाकर गली सड़ी सब्जियों में से कुछ चुन लाऊं या आज फिर खिचड़ी पका ली जाये? कल तो खिचड़ी जल गई थी। एक बार बाजार का रुख भी किया तो एक दीवार पर लिखे नारे पर नजर पड़ी - "चुनिये उन्हे जो सरकार चला सकें" गर्व से सीना फैल गया, थोड़ी चिंता भी हुई बड़ी जिम्मेदारी का काम है। सोचते सोचते लौट आया। पिछली बार कांग्रेस का नारा था यह। लोगों को लगा राजीव से सरकार नहीं चल रही उतार दिया।

पिछले चुनावों का एक नारा रोहतक की दीवारों से अभी मिटा नहीं है -'तख्त बदल दो ताज बदल दो, बेईमानों का राज बदल दो' नारा ताऊ ने लिखवाया था और जनता बेताब है बेइमानों का राज बदलने को। चुनावों का नतीजा कुछ भी हो, हरियाणा में बेईमानों का राज जरूर बदल जायेगा। मगर सवाल वही है कि चुनें क्या?

भाजपा का कहना है कि सबको परखा, हमको परखो। कैसा दुख है। हाय हम न इस्तेमाल हुए। हम न परखे गये। जैसे बूढ़े पिता के मरने के बाद निखट्टू बेटा सबसे ज्यादा आंसू बहाता है । हाय मुझको सेवा का मौका न मिला। जैसे दिल्ली की सड़कों पर कोई पठान मजमा लगा कर सभी परेशानियों के लिये एक ही तेल बेचता है उसी तरह देश की सभी समस्याओं के लिये इनके पास भी एक ही 'राम' बाण नुस्खा है -'मंदिर वहीं बनायेंगे।'

वी पी सिंह मंडल लिये घूम रहे हैं। 'जब पेट की आग ऊपर तक पहुंचती है तो कन्याकुमारी का दिल भी रोयेगा।' 'दाता और पाता का नहीं भ्राता का नाता जोड़ेंगे', जन्मदिन की छुट्टी देंगे', 'मैं इक लिफाफा हूं।'

जैसे कोई कवि सड़क पर मजमा लगाये और उसके साथी भीड़ में मिल कर लोगों की जेब काट लें। छीः।

राजीव गांधी स्थिरता का नाश्पती लाये हैं। बचपन में एक सर्कस देखा था। एक जोकर एक मेज पर एक प्लास्टिक की तश्तरी नचाता, पर गिरने नहीं देता। देर तक नचाता रहता पर कोई तश्तरी न गिरती, देखा कितनी स्थिर। राजीव ने खूब सर्कस दिखाया मेरा नाम जोकर !!उफ्फ सॉरी मेरा भारत महान।

एक नये तरह का पोस्टर लगा देखा फिल्मी पोस्टरों के बीच। ज्योति बने ज्वाला, सौ दिन सास के, चालिस साल बनाम चार महीने। गौर से देखा तो प्रधान मंत्री श्री चंद्रशेखर का चित्र था। लिखा था फैसला आपका। चालिस साल में कांग्रेस जितना नुकसान न कर पाई हमने चार माह में कर दिखाया। आगे फैसला आपका।

मैं फिर सब्जी कॊ दुकान पर खड़ा हूं सामने कुछ गली सड़ी भिंडियां पड़ी हैं, चुनिये । यही कुछ है चुनने को।


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मूषकर जी का इंटरव्यू


मूषकर जी का इंटरव्यू

नमस्कार, स्वागत है आपका हमारे इस कार्यक्रम में। हमारे आज के मेहमान हैं हमारे और आपके पड़ोसी मूषकर जी। वैसे तो हम यहां इनसे इंटरव्यू की पैरोडी पेश कर रहे हैं मगर हो सकता है कि यह आपको असली जैसी लगे, क्योंकि अकसर इनके द्वारा दिये गये असली इंटरव्यू पैरोडी जैसे लगते हैं।

सवाल: मूषकर जी, आपसे सबसे पहला सवाल है कि आपके पड़ोसी हमेशा इलजाम लगाते हैं कि आप उनके घरों में चूहे छोड़ देते हैं और ये चूहे वहां धमाचौकड़ी मचा कर आपके घर वापिस आ कर छुप जाते हैं।

जवाब: देखिये मुझे यह कहना पड़ेगा कि यह गलत इलजाम है। कोई भी इस तरह के इलजाम को पब्लिकली एक्सेप्ट नहीं करेगा। मैंने अपनी बुक में भी यह क्लीयर कर दिया है कि कोई भी ऎसा प्रूफ नहीं दे पाया जिसे हम मान लें। बल्कि हम तो हमारी सोसायटी के सेक्रेटरी खुश साहब को मदद कर रहे हैं चुहे पकड़ने में। कुछ चुहे खुश साहब के घर जाकर धमाचौकड़ी मचा कर हमारे पड़ोस में छुप गये थे। खुश सहब ने तो यह मुहावरा भी पलट दिया कि "खोदा पहाड़ निकली चुहिया।" खुश साहब ने सारे पहाड़ खोद लिये कोई मरा चुहा भी नहीं निकला हें हें हें.....।

सवाल: मगर हमने सुना है कि ये चूहे भी आप ही के घर के किसी उत्तरी कमरे में......

जवाब: ऒय़ॆ फिट्टे मूं ! नेक्स्ट कोश्चन?

सवाल : लोग अकसर अपनी जीवनी रिटायर्ड होने के बाद लिखते हैं मगर आपने अपने कार्यकाल में ही.....?

जवाब: ओये ! तो क्या तुम चाहते हो कि मैं अपनी जीवनी मरने के बाद लिखता?

सवाल : सुना है कि पिछले दिनों जब आप खुश साहब से मिलने गये थे तो आपको आपके घर से ही निकालने की तै्यारी हो रही थी जब घंटों आपके घर की बिजली नहीं जली थी?

जवाब: ओये ! जब तुम्हारे घर में घंटों बिजली जाती है तो कोई कुछ नहीं कहता! बस एक आधा ब्लागर एक दो पोस्ट लिख देता है, हमारे यहां जब बिजली चली जाती है तो तुम कहानियां बनाने लगते हो।

सवाल: आपने अपनी किताब में जो कुछ लिखा बाद मैं कई चीजों पर आपने माना कि गलती से लिख दिया?

जवाब: हम हर बात हर किसी को उसकी शक्ल देख कर बोलते हैं, अब किताब में तो ऎसा हो नहीं सकता। अब लगता है कि अमेंडमेंटस की एक किताब अलग से लिखनी पड़ेगी। मैं तो पहले ही कह रहा था कि किताब पेंसिल से लिख लेते हैं और किताब के साथ साथ पढ़ने वालों को मिटाने वाला रबड़ भी दे देंगे। जितना सूटेबल हो पढ़ लो वरना मिटा दो।

सवाल: आपने अपनी किताब में लिखा है कि आप कालेज में ही बम बनाना सीख गये थे?

जवाब: बम लिखा गया? अरे वो पटाका था जो आप लोग दिवाली पर चलाते हैं। मैंने क्या किया कि उसमें एक बीड़ी बांध दी और बन गया टाईम बम। (गुनगुनाने लगते हैं) बीड़ी जलाई ले जिगर से.....

सवाल: अरे आप हिंदी गाना? आपके यहां तो हिंदी फिल्में बैन हैं?

जवाब: भई पाइरेटिड डीवीडी तो बैन नहीं हैं। मुझे यह फिलम अच्छी लगी, खास कर लंगड़ा त्यागी। बंदा कुछ कुछ मेरे जैसा ही था। (कुछ रुक कर)........एंबीशियस।

सवाल: फिर तो आपने लगे रहो मुन्ना भाई भी देखी होगी

जवाब: फिट्टे मूं! ये भी कोई फिलम है? अपने यहां तो बदाम गिरी या अखरोट गिरी होती है। बई ये गांधीगिरी अपने को समज नहीं आती।

उद्घोषक : जिस दिन आप जैसे लोगों को गांधीगिरी की समझ आ जायेगी उस दिन शायद इस दुनिया में स्वर्ग ही उतर आयेगा........नमस्कार।


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