अभी कुछ वर्ष पहले जब कन्नड़ अभिनेता राजकुमार का वीरअप्पन ने अपहरण कर लिया था तो उनके किसी भक्त ने हिम्मत न दिखाई? अरे जंगल में जा कर भिड़ जाते वीरअप्पन से। अब मर गए तो बंद पड़ी दुकानों को जला रहे हैं, ऐसी तो थोथि आस्थाएं हैं हमारी।
ऐसे बहुत से पात्र हमें मिल जाएंगे जिन्हे हमने भगवान बना कर पूजा और समय की धूल में भुला दिया। इनमें से कुछ का जिक्र मैंने अपने पिछले ब्लाग में किया है। मगर यहाँ मैं एक काल्पनिक पात्र के बारे में लिखना चाहता हूं। कुछ साल पहले स्टार प्लस पर एक सीरियल शुरू हुआ ”क्यूंकि सास भी कभी बहू थी", सीरियल का एक पात्र मिहिर मर गया, घरों में महिलाएं बिलख बिलख कर रोईं। समाचार पत्रों में भी मिहिर के मरने का समाचार छपा। आस्था देखिए कि आज भी इस सीरियल को नियमित देखा जाता है।
गणेषजी के दूध पीने का किस्सा तो सब को मालूम ही है।
दिल्ली में एक अफवाह फ़ैली कि एक बंदर सा दिखने वाला इंसान रात में छुप कर हमला करता है। सच मानिए न कोई घायल हुआ और न ही कोई यह कहने के लिए सामने आया कि हाँ मैने उसे देखा है, मगर पूरी पूरी कालोनियों के लोग रात रात भर जागकर पहरा देने लगे। अपने न्यूज़ चैनलों वाले भी सारी सारी रात कैमरा ले कर ढूंढते रहे उस बंदर को।
अंधी आस्थाएँ हैं हमारी, कोई तर्क मत पूछना।