चुनने को है क्या?

आज जब एक पुराना कागज ढूंढ रहा था तो एक पुरानी कापी पर नजर पड़ी। इस कापी में मैंने 1987-91के जमाने में अपना लिखा (जिसमें अधिकतर संपादक के नाम पत्र हुआ करते थे) जहां कहीं भी छपा की कटिंग्स चिपका रखीं थीं। इसी कापी से एक लेख जो कि 9 मई 1991 को दिल्ली के टाईम्स आफ इंडिया ग्रुप के सांध्य दैनिक 'सांध्य टाईम्स ' में छपा था यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। हांलांकि लेख उस समय के राजनैतिक हालात पर है मगर आज भी प्रासंगिक है तथा लेख में जो प्रश्न मैंने उठाये हैं कुछ कुछ वैसे ही प्रश्न आज मंतव्य पर पंकज भाई ने भी उठाये हैं।

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अभी दाएं हाथ की अनामिका से निशान भी न छूटा था, दिवारों से पोस्टर भी न फटे थे, नारे भी न मिटे थे, वो अखबारों की सुर्खियां, टीवी का थोड़े से अर्से का ग्लासनोस्त जहन से पूरी तरह हट भी न पाया था कि चुनाव फिर आ गये। और अभी भी यही लगता है कि कोई दल शायद ही बहुमत प्राप्त कर सके और छह माह बाद फिर चुनाव करवाने पड़ें। अब समझ में आ रहा है कि पहुंचे हुए फिल्मकार राजकपूर ने अपनी फिल्म मेरा नाम जोकर में दो इंटरवल क्यों रखे थे? अभी तो पहला भाग ही समाप्त हुआ है, आगे तो और भी जल्दी जल्दी इंटरवल आयेंगे। चुनाव आयोग को चाहिये कि एक साथ कई मत पत्रों पर मत डलवा लें, पहला इस समय आप कौन सा दल चुनना चाहते है, दुसरा छह माह बाद कौन सा पसंद करेंगे, तीसरा एक वर्ष बाद ले किये और ऎसे ही आगे के लिये। इससे सबको बहुत आसानी हो जायेगी। एक सुझाव यह भी हो सकता है कि हर मुहल्ले में एक स्थायी मतदान केंद्र बना दिया जाये जैसे दूध का डिपो होता है, रोज सुबह सुबह आप गये, अपना मत दे आये, सरकार रहे या आज का दिन और काम कर ले यह रोज का रोज निर्धारित होता रहेगा। इससे हमारे लोकतंत्र की जड़ें और गहरी होंगी। आखिर हंग हो या भंग हो चुनाव तो होना ही चाहिये। नहीं? चाहे चुनने को कुछ हो या न हो।

आजकल दिल्ली में सब्जियों की बहुत कमी है। कल सब्जी लेने गया तो केवल गली सड़ी सब्जियां ही थीं। बिना खरीदे लौट आया और खिचड़ी पका ली। आज सुबह से ही सोच रहा हूं कि जाकर गली सड़ी सब्जियों में से कुछ चुन लाऊं या आज फिर खिचड़ी पका ली जाये? कल तो खिचड़ी जल गई थी। एक बार बाजार का रुख भी किया तो एक दीवार पर लिखे नारे पर नजर पड़ी - "चुनिये उन्हे जो सरकार चला सकें" गर्व से सीना फैल गया, थोड़ी चिंता भी हुई बड़ी जिम्मेदारी का काम है। सोचते सोचते लौट आया। पिछली बार कांग्रेस का नारा था यह। लोगों को लगा राजीव से सरकार नहीं चल रही उतार दिया।

पिछले चुनावों का एक नारा रोहतक की दीवारों से अभी मिटा नहीं है -'तख्त बदल दो ताज बदल दो, बेईमानों का राज बदल दो' नारा ताऊ ने लिखवाया था और जनता बेताब है बेइमानों का राज बदलने को। चुनावों का नतीजा कुछ भी हो, हरियाणा में बेईमानों का राज जरूर बदल जायेगा। मगर सवाल वही है कि चुनें क्या?

भाजपा का कहना है कि सबको परखा, हमको परखो। कैसा दुख है। हाय हम न इस्तेमाल हुए। हम न परखे गये। जैसे बूढ़े पिता के मरने के बाद निखट्टू बेटा सबसे ज्यादा आंसू बहाता है । हाय मुझको सेवा का मौका न मिला। जैसे दिल्ली की सड़कों पर कोई पठान मजमा लगा कर सभी परेशानियों के लिये एक ही तेल बेचता है उसी तरह देश की सभी समस्याओं के लिये इनके पास भी एक ही 'राम' बाण नुस्खा है -'मंदिर वहीं बनायेंगे।'

वी पी सिंह मंडल लिये घूम रहे हैं। 'जब पेट की आग ऊपर तक पहुंचती है तो कन्याकुमारी का दिल भी रोयेगा।' 'दाता और पाता का नहीं भ्राता का नाता जोड़ेंगे', जन्मदिन की छुट्टी देंगे', 'मैं इक लिफाफा हूं।'

जैसे कोई कवि सड़क पर मजमा लगाये और उसके साथी भीड़ में मिल कर लोगों की जेब काट लें। छीः।

राजीव गांधी स्थिरता का नाश्पती लाये हैं। बचपन में एक सर्कस देखा था। एक जोकर एक मेज पर एक प्लास्टिक की तश्तरी नचाता, पर गिरने नहीं देता। देर तक नचाता रहता पर कोई तश्तरी न गिरती, देखा कितनी स्थिर। राजीव ने खूब सर्कस दिखाया मेरा नाम जोकर !!उफ्फ सॉरी मेरा भारत महान।

एक नये तरह का पोस्टर लगा देखा फिल्मी पोस्टरों के बीच। ज्योति बने ज्वाला, सौ दिन सास के, चालिस साल बनाम चार महीने। गौर से देखा तो प्रधान मंत्री श्री चंद्रशेखर का चित्र था। लिखा था फैसला आपका। चालिस साल में कांग्रेस जितना नुकसान न कर पाई हमने चार माह में कर दिखाया। आगे फैसला आपका।

मैं फिर सब्जी कॊ दुकान पर खड़ा हूं सामने कुछ गली सड़ी भिंडियां पड़ी हैं, चुनिये । यही कुछ है चुनने को।


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12 comments:

समीर लाल November 11, 2006 at 4:23 AM

वाह, जगदीश भाई, तेवर तो तब भी वही बुलंदी वाले थे. अच्छा लिखा है.

अनूप शुक्ला November 11, 2006 at 12:43 PM

ऐसे ही और भी खोजिये न कुछ पुरानी कतरनें.

अनुराग श्रीवास्तव November 11, 2006 at 2:40 PM

यह लेख पढ़ कर एक अजब सी चुभती हुयी सी गुदगुदी हुयी. हास्यास्पद पीड़ा. शायद इसलिये कि यह हमारे उस राजनीतिक वातावरण का 'आईने' में बना हुआ बिम्ब है, जिसके ऊपर ना तो हंसना आता है ना रोना.

यूं ही आईना दिखाते रहिये.

संजय बेंगाणी November 11, 2006 at 3:42 PM

वाह!
समय के सच का अच्छा बयान, वो भी व्यंग्य शैली में. बहुत अच्छा लिखा है/था.
देखिये शायद कुछ और उमदा चिजे कहीं धूल खा रही हो तो झाड़ पोंछ कर परोस दो. हम आंखे गड़ाए बैठे हैं.

सागर चन्द नाहर November 11, 2006 at 5:24 PM

में भी यही कहूँ कि डायरी के बाकी के पन्ने भी...........

ratna November 11, 2006 at 7:09 PM

आईना हमारी पहचान हमसे करवाता है
सच और झूठ के फरक को उभार दिखाता है।

मनीष November 12, 2006 at 1:23 AM

बढ़िया कटाक्ष था ये उस वक्त के राजनैतिक हालात पर !

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